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Black Magic Best Story Hindi 2022: लालच ब्लैक मैजिक कहानी

Black Magic Best Story Hindi 2022 | ब्लैक मैजिक बेस्ट स्टोरी हिंदी २०२२ अंश: एंड्रयू का मन भारी हो रहा था। क्योंकि उसके अंकल का स्वास्थ्य लगभग पूरी तरह ठीक हो चूका था और उसकी करोड़ों की सम्पत्ति उसे अपने से दूर खिसकती लग रही थी। अब उसके दिल-दिमाग पर अंकल की करोड़ों की सम्पदा पूरी तरह छा गयी थी। वह उसे किसी भी तरह से पाने का इच्छुक हो चुका था।


...दोस्तों इस Best Black Magic Story Hindi को लास्ट तक जरुर पढ़ें क्यूंकि यह एक बहुत इंट्रेस्टिंग स्टोरी है | अइ होप की आपको यह Black Magic Ki Kahani जुरूर पसंद आएगा...


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Lalach-Best Black Magic Story In Hindi 

Black Magic Best Story Hindi 2022: Lalach
ब्लैक मैजिक बेस्ट स्टोरी हिंदी २०२२:  लालच

"ड़ा प्यारा कुत्ता है आपका...।" बहुद देर से बोरियत महसूस करते मार्शल ने सामने वाली बर्थ पर पसरे व्यक्ति से कहा।


"थैंक्स! लेकिन प्लीज इसे कुत्ता कहकर न बुलाएं। इसका नाम पाब्लो है। यह है ही इतना क्यूट कि देखते ही हर किसी को पसंद आ जाता है।" उस कुत्ते के मालिक ने प्यार से अपने पाब्लो पर हाथ फेरते हुए कहा।


"ओह सॉरी! पाब्लो ही कहेंगे।"


चलो इसी बहाने बात तो शुरू हुई! न्यूयार्क से चली ट्रेन के प्रथम श्रेणी कोच में इस समय पांच व्यक्ति यात्रा कर रहे थे। एक की आयु काफी ज्यादा थी और वह साइड वाली बर्थ पर बैठी ट्रेन रवाना होने के समय से ही कुछ परेशान सी दिख रही थी। ऐसा लग रहा था कि शायद वह पहली बार ट्रेन की यात्रा कर रही थी। वह शुरू से ही भीतर ही भीतर कुछ फुसफुसा रही थी। ट्रेन जब भी स्पीड पकड़ी तो वह अपने सीने पर क्रॉस का चिन्ह बनाते हुए दोनों हाथ पसार कर ऊपर देखकर मानो प्रभु से खैर मांग रही थी।


एक युवक ट्रेन में सवार होने से अब तक किसी पुस्तक में खोया था और देखने से कोई कॉलेज जाने वाला लड़का लग रहा था। एक प्रौढ़ उम्र के शख्स कोच की खिड़की में से झांककर बाहर के दृश्यों का आनन्द ले रहे थे। यह सिर पर हैट धरे हुए होठों में दबी कीमती सिगरेट के कश भी लगा रहे थे।


ट्रेन अब और तेज गति में आ गयी थी और वृद्धा की प्रार्थना भी तेज हो गई


उधर कुत्ते की प्रशंसा करने वाले ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा-“मैं एंड्रयू हूं, मैक्सिको जा रहा हूं। आप भी शायद... ।"


"मैं बर्टन हूं, मुझे भी मैक्सिको ही जाना है।” सामने की बर्थवाला कुत्ते के मालिक ने मुसकराकर बोला-“आप वहीं रहते हैं?" 


“जी नहीं। वहां पर मेरे चाचा रहते हैं। मैं उन्हीं के पास जा रहा हूं।" एंड्रयू ने कहा।


"किसी विशेष काम से या सिर्फ घुमने जा रहें?" बर्टन ने मुस्कराकर पूछा।


"बात यह है कि चाचा जी काफी बीमार हैं। उन्होंने फोन पर बताया था, अब उन्हीं की देखभाल को जा रहा हूं।" 


"ओह...!" "क्या आप वहीं के रहने वाले हैं?" 


"नहीं जैन्टलमैन! मैं तो पुलिस विभाग में इन्स्पेक्टर के पद पर कार्यरत हूं। मेरा यहां से ट्रांसफर हुआ है। अब नयी पोस्टिंग पर जा रहा हूं।" बर्टन ने बताया। 

“भाई वाह, बहुत अच्छे! कहां पर?" एंड्रयू ने पूछा। 

"साइलेंट जोन में।"

"वैरी गुड! मैं भी वहीं जा रहा हूं। चाचा जी का निवास स्थान वहीं पर तो है।" एंड्रयू ने बताया।

"फिर तो मिलना होता रहेगा...।" बर्टन ने प्रसन्नता दिखाते हुए बोला।


इसके बाद दोनों विभिन्न विषयों पर बातचीत करते रहे। कुछ देर बाद उनके वार्तालाप से औपचारिकता भी दूर होती चली गयी। बीच के अनेक रेलवे स्टेशन पार करती हुई ट्रेन मैक्सिको पहुंच गयी। ट्रेन रुकने पर दोनों साथ ही स्टेशन से निकले और एक ही टैक्सी में मंजिल की ओर चल पड़े।


बर्टन तो पुलिस स्टेशन पर पहुंचकर रस्मी बातों के बाद एंड्रयू के चाचा को देखने आने की बात कहकर उतर गया। उसने टैक्सी वाले को भाड़ा देना चाहा तो एंड्रयू ने अपनापन व्यक्त करते हुए उसे रोक दिया और टैक्सी आगे चल पड़ी। कुछ ही समय पश्चात बताये पते पर टैक्सी रुकी।


वह एक शानदार बंगला था, जहां टैक्सी से एंड्रयू उतरा था।


टैक्सी वाले का किराया अदा करके वह बंगले के गेट पर पहुंचा। आगे बढ़कर गेट पर लगा बेल का स्विच दबाया। अन्दर दूर कहीं घंटी की मधुर ध्वनि गूंज पड़ी। कुछ देर में एक चौकीदार ने आकर गेट खोला। वह उसे अपना सामान थमाता हुआ अन्दर की तरफ चला गया।


कुछ पलों में ही वह चाचा जी के बेडरूम में खड़ा था। चाचाजी बेड पर निढाल पड़े हुए थे। आकर्षक रूप से सज्जित था यह शयन-कक्ष। इसमें डबल बैड के कम्बल में लपेटे शायद चाचा जी ही लेटे थे।


एंड्रयू ने धीरे से उस सोये शख्स के ऊपर पड़ा कम्बल एक कोने से पकड़कर हटाया, तो थे तो उसके चाचा ही। लेकिन एक नजर में वह उन्हें पहचान नहीं पाया। क्योंकि पहले सुडोल गठीला शारीर के साथ एक शानदार पर्सनेलिटी था चाचा जी का और उसके के स्थान पर, अब आंखों के नीचे काली झाईं, होठों पर खुश्की व पपड़ी और एकदम कमजोर हो चुका शरीर... । कुल मिलाकर वास्तव में वह काफी बीमार लग रहे थे।


एंड्रयू अभी उन पर दृष्टि फिरा ही रहा था कि करवट बदलकर चाचा उठ बैठे। थोड़ा आंखों को मल कर नींद से बाहर आये और प्रसन्नता व प्यार भरे स्वर में बोले"अरे एंड्रयू! आ गये बेटा... ।"


"हां, चाचाजी। आ गया।" बैड पर बैठता हुआ एंड्रयू बोला-“आपकी तबियत बताइए कैसी है? खबर मिलते ही मैं घर से तुरन्त रवाना होकर आ गया...।" बैठे-ही-बैठे अंकल ने हाथ बढ़ाकर एंड्रयू का हाथ थाम लिया। अचानक उनकी आंखों में पानी भर आया।


"अरे अंकल! अब तो मैं आ गया हूं। भला रोने की क्या बात है? डाक्टर ने क्या बोला है? अभी फोन करता हूं। नम्बर बताइए...।" उन्हें समझाता हुआ एंड्रयू बोला।


अंकल ने हाथ पकड़कर उसे अपने बगल में बिठाते हुए कहा-“अरे बेटे। तुम आ गये हो तो अब मैं जल्दी ही स्वस्थ हो जाऊंगा। वैसे डाक्टर ने दवा दिया है और मैं समय पर दवाएं ले ही रहा..।'' 


"तो दवा लेने के बाद पहले से अच्छा लग रहा न?" एंड्रयू ने पूछा।


"असर क्या पड़ना है भला? यह तो मेरा अकेलापन है, जो मुझे भीतर-ही-भीतर खोखला कर रहा है...।" उदासी भरे स्वर में वह बोले- ''यदि तुम मेरे ही बेटे होते तो क्या यहीं पर नहीं रहते?"


"अच्छा अंकल, एक बात बताइए? क्या आप एक दिन मुझे अपने पैरों पर खड़ा होते नहीं देखना चाहते थे...।" प्यार भरे उलाहने के साथ वह कह रहा था।


वास्तक में एंड्रयू अंकल के ही साथ रहता आया था। क्योंकि अंकल के सिवा अन्य और उसका भी कोई न था।


अंकल ने ही एंड्रयू का विवाह लीजा के साथ कराया था। एंड्रयू और लीजा एक-दूसरे से प्यार करते थे। शादी के बाद प्रसन्नता भरे पलों के साथ जीवन अपनी गति से बढ़ रहा था। किन्तु एक दिन दोनों मियां-बीवी की खुशी उस समय उड़न-छ हो गयी, जब बातों ही बातों में अंकल ने किसी समाजसेवी संस्था को अपनी समस्त सम्पत्ति दान कर देने का निश्चय सुनाया। वह दोनों धक्क हो गये थे। एंड्रयू को चिन्ता ने घेर लिया कि आज या कल अंकल दुनिया छोड़ गये तो यह घर उन्हें छोड़ना ही पड़ेगा। फिर क्यों यहां रहकर वक्त बर्बाद करके कुछ नहीं मिलेगा। और फिर ऐसे उसने अपने पैरों पर खड़ा होने का निश्चय किया।


इस निश्चय के साथ ही उसने मैक्सिको को छोड़ दिया और न्यूयार्क में अपने एक परिचित के पास रहकर काम-धंधे का प्रयास किया। फिर एक अच्छे स्थान पर जनरल स्टोर शुरू कर पत्नी को भी वहीं बुला लिया। अब उनका एक प्यारा सा बेटा भी था। जीवन की गाड़ी पटरी पर ठीक-ठाक चलने लगी थी। वह तो अंकल के बीमार होने की खबर सुनकर आया था।


अंकल की आवाज गूंजी-“बच्चे और बहू को नहीं लाये?"


“अगर उन्हें भी ले आता तो दुकान को कौन देखता भला,.. ?"


"एंड्रयू! मेरी आखिरी सांसें जाने कब थम जायें। इसलिए मैं चाहता हूं कि अपना सब कुछ मरने से पहले तुम्हारे नाम कर दूं...और तुम्हें मैंने इसीलिए बुलाया भी है।"

“ऐसी बात क्यों कर रहे हैं आप?" अचानक मिली प्रसन्नता को छिपाता हुआ एंड्रयू बोला।


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"देखो बेटे! इस दुनिया में तुम्हारे सिवा मेरा अपना कोई नहीं है। शायद मेरी औलाद होती तो उसे भी तुम से ज्यादा प्यार नहीं कर सकता था। अब तुम बेटे के बाप बन गये हो...तो फिर से हमारी पीढ़ी आगे चली है। अब मैं सब तुम्हें सौंपकर निश्चित होना चाहता हूं... । बहू को भी बुला लो...।" 


"लेकिन आप तो किसी समाज-सेवी संस्था...।"


"अरे, छोड़ो समाज सेवा!" वह बात तो मैंने मजाक में बोला था- “मेरी सम्पत्ति है, मैं किसी को भी दूं! मैं पहले भी मजाक ही कर रहा था। लगता है कि तुमने सच मान लिया था...।"



एंड्रयू का दिल बल्लियों सा उछलने लगा। उसे खुशी से नाचने का मन होने लगा। लेकिन उसने अपने मन को काबू किया और नार्मल व्यवहार करते रहा। आखिर अंकल की जायदाद कोई छोटी-मोटी न थी। करोड़ों का मामला था। यहां तो जो सम्पत्ति थी, वह थी ही। वहां न्यूयार्क में भी अथाह सम्पत्ति थी। किराये से ही प्रत्येक माह अच्छी मोटी कमाई थी। अब इस सारी जायदाद का वह अकेला वारिस बनने वाला था। पिछले कई बरस पहले वह जिस सम्पत्ति से वंचित होने से दुखी हो रहा था, आज वह सब उसकी मुट्ठी में आने जा रही है। फिर भला यह खुशी संभालना क्या कोई मजाक बात थी? 


रात का खाना खा कर फ्री होकर उसने लीजा को फोन मिलाया"हल्लो डार्लिंग।" खुशी उसके स्वर से छलकी पड़ रही थी। 

"क्या बात है डियर, बड़े चहक रहे हो...।" लीजा ने पूछा।

"अरे जानेमन, दुनिया का खजाना हमारा होने वाला है..." 

"क्या मतलब?"

“मतलब यह है कि अपनी सारी जायदाद अंकल हमारे नाम लिख रहे हैं। उनके बाद उनकी सम्पत्ति मेरी होगी...।" एंड्रयू से खुशी संभल न रही थी। 

“और वह समाज-सेवी संस्था...।"

“अरे, कुछ नहीं। वह शायद हमें आजमाना चाहते थे।"

“अच्छा-अच्छा! इतने ऊंचे भी मत उड़ो कि गिरते हुए सम्भल भी न सको।" लीजा ने उसे चेताया।

"क्या मतलब?"

“एंड्रयू अंकल की जायदाद तुम्हें उनके न होने की दशा में ही तो मिलेगी?" उधर से लीजा समझाने वाले भाव में बोली-“अभी अंकल जिन्दा हैं...और अभी भी भरोसा नहीं है कि कब उनका मन बदल जाये। फिर ऐसे बे-भरोसे वृद्ध का क्या पता, कब फिर बदल जाये?"


"देखो, ऐसा नहीं है। विश्वास करो कि अंकल ने अपनी इच्छा से ही यह सब कहा है। स्टोर को अभी रेमंड को संभालने दो और तुम यहाँ जल्दी से आ जाओ। समय मिलने पर मैं वहां जाऊंगा और उसे बेच दूंगा।"


"थोड़ी समझदारी रखो एंड्रयू। स्टोर बेचने या मुझे वहां बुलाने की अभी मत सोचो। अभी तुम अकेले ही वहां पर रुको। कुछ दिन तक रहकर अंकल को परख लो। यदि विश्वास हो तो बताना। फिर इस तरफ सोचेंगे। क्या जाने उनका मन बदल गया तो वापस आकर हमारा व्यवस्थित होना बड़ा कठिन होगा।"


"अच्छा..,जैसा ठीक समझो।" उदासीनता से उसने फोन रख दिया।


एंड्रयू को मैक्सिको आये 3 महीने से ज्यादा हो चुका था। उसकी देखभाल के कारण अंकल भी स्वस्थ होने लगे थे। अब कोई चांस नहीं लग रहा था कि वह जल्दी दुनिया छोड़ कर जायेंगे। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे, क्या न करे? पत्नी के फोन भी आते रहते थे। वह लीजा से शादी के बाद पहली बार इतने समय दूर रहा। उसे उसकी बार-बार कमी खल रही थी। वह अब इस पर सोच-सोचकर परेशान था कि वह अकेली बेटे, घर और स्टोर को किस प्रकार सम्भाल रही होगी?



वह इसी प्रकार के ख्यालों में खोया था कि चौकीदार एक कार्ड लेकर आया और उसे थमा दिया।


विजिटिंग कार्ड देखकर वह प्रसन्न हो उठा-“ओह इन्सपेक्टर बर्टन! अरे, उन्हें ड्राइंग रूम में लेकर आओ... । मैं भी आता हूं।"


अपने को व्यवस्थित कर शर्ट पहनते हुए वह जल्दी से ड्राइंग रूम का दरवाजा


- खोलकर अंदर पहुंचा और बैठे हुए बर्टन को गले से लगाते हुए. बोला"भई, आपने तो वादाखिलाफी की है। तुमने शीघ्र आने को कहा था और महीनों से ज्यादा कर दिये...।" एंड्रयू ने मुसकराते हुए उसके कुत्ते पर भी निगाह डाली, जो मजे से सोफे पर बैठा उसे देखकर पूछ हिलाने लगा । शायद वह कुछ घंटे की मुलाकात उसे याद थी।


“अगर मुझे समय नहीं मिला था तो तुम भी तो आ सकते थे! मैं तो आकर कामकाज में फंस गया, लेकिन तुम्हारे साथ तो ऐसा न था...।" वह मुसकराकर बोला। 


"बर्टन! तुम्हारा पाब्लो मुझे बहुत अच्छा लगा।" 

“ठीक है, तो तुम रख लो।" " "नहीं-नहीं, ऐसा भी नहीं।"

"क्या कह रहे हो?

"अरे, पसन्द है तो रख लो..."

"मेरा लगा था कि तुम वापस चले गये होगे। अच्छा ये बताओ, कि अंकल का तबियत अब कैसा है?

“अब तो काफी अच्छे हैं।"

"कब तक रहोगे?"


"ऐसा है कि मैं बचपन से उन्हीं के पास रहा हूं। हम दोनों का अपना कहने को और कोई भी नहीं है। उनके ज्यादा बीमार होने का पता लगने पर मैं आया तो मुझे पता चला की उन्होंने अपने भतीजे को सारी जायदाद सौंपने की तैयारी कर ली है। यह कार्य वह मरने से पहले स्वयं कर जाना चाहते हैं।" एंड्रयू के स्वर में शोखी झलक रही थी।


“भाई...फिर तो तुम्हारे मजे हैं।" मस्त अंदाज में बर्टन बोला।


"अरे भाई, उनका विचार कब बदल जाये, कुछ पता नहीं है।" कुछ गम्भीर होते हुए एंड्रयू ने जवाब दिया।


"तो क्या यहां पर रहकर तुम उनकी मौत का इंतजार कर रहे हो?" बर्टन ने विशेष अंदाज में पूछा।


“उहूं! ऐसा नहीं है। वहां पत्नी और बच्चा अकेले हैं। मैं एक-दो दिन में वापस जाने वाला हूं।"


काफी देर की गपशप के बाद बर्टन उठ खड़ा हुआ, उसने एंड्रयू से जाने की इजाजत मांगी।


“ऐसी भी क्या जल्दी है दोस्त? अभी कुछ समय तो और बैठते...।" एंड्रयू ने उसे रोकने का प्रयास किया।


"ओह, नो फ्रेंड! आफिस टाइम हो रहा है।" बर्टन बोला, फिर कहने लगा-"पाब्लो को छोड़े जा रहा हूं। वापसी में मेरे पास छोड़ते जाना।"


अपने कुत्ते को छोड़ इंस्पैक्टर बर्टन चला गया और यह कुत्ता सचमुच एंड्रयू के मन बहलाव का अच्छा साधन बन गया। जल्दी ही दोनों एक-दूसरे के साथ हिल-मिल गये। पाब्लो हर समय हर स्थान पर एंड्रयू के साथ ही रहता था। लॉन में टहलना, स्वीमिंगपूल में नहाना अथवा शाम के समय अंकल की गाड़ी में शहर की लांग ड्राइव पर जाना हो, हर समय वह एंड्रयू के साथ ही होता था। बाहर जाने के नाम पर तो वह तुरन्त कार में जा घुसता था।  


एंड्रयू पाब्लो के साथ तीन दिन तक मन बहलाव करता रहा। लेकिन फिर उसका मन भर गया। क्योंकि अंकल का स्वास्थ्य लगभग पूरी तरह ठीक हो चूका था और उसकी करोड़ों की सम्पत्ति उसे अपने से दूर खिसकती लग रही थी। कारण था, आजकल अंकल का उसके प्रति कुछ उपेक्षात्मक रुख। वह उससे कुछ ठीक व्यव्हार नहीं कर रहे थे। 


अब उसके दिल-दिमाग पर अंकल की करोड़ों की सम्पदा पूरी तरह छा गयी थी। वह उसे किसी भी साधन से पाने का इच्छुक हो चुका था। उसने विचार किया कि यदि डाक्टर उसके साथ मिल जाये तो काम बन सकता है। वह कोई जहरीला इंजेक्शन लगा दे तो अंकल लम्बे हो जायेंगे। लेकिन नौकर व चौकीदार सबको पता है कि उनका स्वास्थ्य निरंतर सुधर रहा है। अगर ऐसे में उन्हें कुछ हुआ तो संदेह का कारण बन जायेगा और वह फंसे बिना न रहेगा। यह निश्चित था कि अंकल के मरने पर उनका शव परीक्षण अवश्य होगा और जहर की सच्चाई सामने आ जायेगी। जिसके बाद मौत की सजा निश्चित है।


उसने स्लो प्वायजन का विचार बनाया। इसमें भी रसोइये की मदद लेनी पड़ती। इसलिए यह प्लान भी खतरनाक था। क्योंकि रसोइया उसका भेद कभी भी खोल सकता था।


वह किसी ऐसी योजना के लिए दिमाग दौड़ा रहा था जिससे उसका आसानी से सम्भव हो। खूब दिमाग लड़ाकर देखा। लेकिन कोई भी सरल योजना काम नहीं कर रही थी।


नाश्ता करने के पश्चात वह लॉन में ईजी चेयर पर बैठा इसी संबंध में विचारमग्न था कि चौकीदार ने उसे समाचार-पत्र लाकर थमा दिया। वह बेमन से समाचार-पत्र के पन्ने उलट-पलट करने लगा। तभी एक खास विज्ञापन पर उसकी दृष्टि ठहर गयी। 


उसमें छपा था "हर समस्या का समाधान करते हैं फादर बाथम।" इसके साथ ही विज्ञापन में फादर बाथम का पता भी छपा था।


यह विज्ञापन पढ़कर एंड्रयू को लगा कि शायद उसकी समस्या का समाधान मिल गया है। वह पास बैठे पाब्लो पर प्यार से हाथ फेरने लगा।


उसने सोच लिया कि वह फादर बाथम से आज ही सम्पर्क करेगा। निश्चय करके उसने फादर का पता अच्छी तरह दिमाग में बिठा लिया।


लगभग बारह बजे अपने एक दोस्त से मिलने जाने की बात कह कर अंकल के पास से वह चल दिया। पाब्लो भी उसके साथ ही था। कार निकाल कर एंड्रयू फादर बाथम के पते की तरफ रवाना हो गया।



अपनी आखिरी सांसें गिनता एक पुराना मकान। जिस पर नया पेंट कर दिया गया कुछ ऐसा ठिकाना था फादर का? यह उनका कार्यालय था।


इसी कार्यालय के ऊपर एक टांगे गये बोर्ड पर 'फायर बाथम' लिखा था। कार्यालय के बाहरी दरवाजे पर अपनी-अपनी समस्या लेकर आने वालों की बड़ी कतार थी। कार से निकलकर एंड्रयू भी उसी कतार में शामिल हो गया। पाब्लो को वह कार में ही बंद कर आया था। वह परेशान जरूर था कि जाने कब नम्बर आयेगा?


लम्बी प्रतीक्षा के बाद एंड्रयू का नम्बर शाम को करीब चार घंटे की प्रतीक्षा के बाद आया। वह दरवाजे के अंदर प्रविष्ट हुआ। अन्दर एक रहस्यमय सा कमरा था, जिसमें धूप लोबान महक रहा था। धुएं ने कमरे को अजीब सा बना रखा था। एंड्रयू ने पूरे कमरे को गौर से देखा। दरवाजे के बाहर मौजूद एक आदमी, जो शायद फादर का शिष्य नुमा गेटकीपर था, कतार में खड़े लोगों को एक-एक कर अन्दर भेज रहा था। अन्दर कमरे के बीच में आंखें बंद किये एक बूढ़ा चमकदार चेहरे वाला आदमी पालथी मारकर ध्यान लगाने वाली मुद्रा में बैठा था। उसके सामने रखी हांडी से धूप-लोबान का धुआं उठ रहा था, जिससे कमरा भरा था। और उसकी महक अंदर से बाहर तक फैली थी। बल्कि कमरे में धुएं के कारण अंधेरा हो रखा था।


चुपचाप एंड्रयू गेटकीपर के इशारे पर उस बूढ़े के सामने जा बैठा। जूते उससे बाहर ही उतरवा लिए गये थे। वह वातावरण को निरख-परखकर समझने का प्रयास कर रहा था।


“बोलो, क्या परेशानी है?" आंख बंद किये बूढ़ा, जो फायद बाथम ही था, उससे पूछ रहा था।


"फादर! पहले तो यह बतायें, कि क्या मैंने ठीक सुना है कि आपके यहां राज पर्दे में ही रहता है?" आगे को झुक एंड्रयू ने धीरे से अपनी तसल्ली करनी चाही।


“पर्देदारी रहेगी। बेफिक्र होकर बोलो।"


"फादर! मेरी समस्या यह है कि मेरे एक अंकल हैं। वह काफी वृद्ध हैं। वह मुझ पर बोझ हो चुके हैं। बिलकुल बेकार भी हैं।"


"तुम्हारी इच्छा क्या है?


"मेरी इच्छा है कि ऐसा उपाय बतायें जिससे मेरे अंकल से किसी प्रकार पीछा छूट सके। लेकिन यह काम एकदम नहीं हो। बल्कि किसी तरह वह सख्त बीमार हों और धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़े...तथा इस काम में पन्द्रह-बीस दिन तो लग ही जाएँ या उससे ज्यादा भी हो तो कोई दिक्कत नहीं है।"


एंड्रयू ने अपनी इच्छा बता दी। लेकिन उसने अपनी परेशानी में अंकल की जायदाद का कोई जिक्र नहीं किया था।


फादर बाथम ने शांति के साथ एंड्रयू की बात सुनी और धूप-लोबान वाली हांडी में हाथ डाला। जब उनका हाथ बाहर आया तो उसमें हाथ के अंगूठे जैसा कुछ दबा था। फादर ने उसे एंड्रयू के हाथ में थमा दिया। उसने देखा कि यह पत्थर का पुतला किसी चमगादड़ की भांति था।


फादर बाथम ने उसे निर्देश दिया- “यह चमगादड़ अपने अंकल के बिस्तर के नीचे रख दो। फिर इसका कमाल नजर आयेगा...।" फिर उसने एंड्रयू को वहां से जाने का संकेत किया।


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एंड्रयू किसी न किसी बहाने अंकल के कमरे के चक्कर लगा रहा था। पाब्लो भी उसके पीछे-पीछे था।


एंड्रयू इस फिराक में था कि अंकल का ध्यान बंटे और वह उस चमगादड़ के पुतले को उनके बिस्तर के नीचे रख दे। किन्तु अंकल थे कि हिलने का नाम नहीं ले रहे थे। वह बैड पर टिके अपने ऊपर कम्बल से पैरों को ढके कोई पुस्तक पढ़ रहे थे। यहां तक कि यह जान कर भी की एंड्रयू वहां है वे उसे ऐसे इग्नोर कर रहे थे जैसे वहां कोई हो ही न।


लम्बी प्रतीक्षा के बाद भी अंकल वहां से टस से मस न हुए। एंड्रयू मन ही मन में उसे बुरा-भला कहता हुआ आखिर उठकर वहां से बाहर निकल गया।


अब उसे प्रतीक्षा थी रात की। जिस समय खाना खाने के लिए अंकल डायनिंग हाल में जायेंगे। जबकि खाने का समय अभी दो घंटे बाद था।


आखिर रात भी आ ही पहुंची। रसोइया खाना परोसने की सूचना देकर चला गया।


उस समय एंड्रयू बरामदे में बैठा टी.वी. पर फिल्म देख रहा था। उसी समय अंकल खाना खाने के लिए डायनिंग टेबल की ओर बढ़ते दिखाई दिये। वह भी उठकर चुपचाप पाब्लो के साथ उसी तरफ चल पड़ा, किन्तु जैसे ही अंकल अन्दर आने वाले थे, उनसे पहले ही वह दूसरे दरवाजे से डायनिंग हॉल से बाहर निकल गया।


वहां से एंड्रयू बहुत फुर्ती से लम्बी दुरी तय करता हुआ अंकल के शयन कक्ष में पहुंच गया। पाब्लो भी उसके पीछे-पीछे था। जल्दी से उसने वहां का दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया और लगभग दौड़ते हुए जाकर बेड के कोने से गद्दा उठाया और पत्थर का चमगादड़ उसके नीचे दबा दिया। फिर बैडशीट को सही करके अपने हाथ इस प्रकार झाड़े मानो कोई परिश्रम भरा बड़ा काम किया हो। यह काम निपटाकर वह दरवाजा खोलकर बाहर आया और पाब्लो के साथ डायनिंग हॉल में जा पहुंचा।


अगले दिन सवेरे नाश्ते की टेबल पर अंकल नहीं थे। एंड्रयू ने इस बारे में पूछताछ की तो खानसामा बोला


"उनका स्वास्थ्य सही नहीं है, इसलिए शयन कक्ष में ही उन्होंने चाय मंगवाई है..."


एंड्रयू मन-ही-मन में प्रसन्न हो उठा।


नाश्ता करके वह अंकल के पास गया तो देखा कि वह कम्बल ओढ़े पड़े हैं तथा उनका बदन बहुत तेज बुखार से तप रहा है। मन-ही-मन उसने फादर बाथम के करिश्मे की प्रशंसा की तथा अपनी खुशी को छिपाने का प्रयास करता हुआ बोला"क्या बात है अंकल?"


"रात से तबीयत ज्यादा खराब है, बुखार बहुत तेज है, जरा फोन करके डॉक्टर को बुलाओ।" अंकल के स्वर में बेचैनी थी।


"अभी बुलाता हूं...।" एंड्रयू फोन की तरफ बढ़ा।



डॉक्टर, अंकल को देखा और दवाई देकर चला गया । उसके कुछ ही देर बाद गेटकीपर ने बर्टन के आने की खबर दी। एड्यू उस समय अंकल की देखभाल करने का दिखावा कर रहा था। उसने बर्टन को वहीं बुला लाने के लिए कहा और सोचने लगा कि बर्टन इतना सुबह-सुबह क्यूँ आया होगा ?


"हैलो बर्टन, एंड्रयू बर्टन को रूम के अन्दर आते ही बोला।


बर्टन, एंड्रयू और अंकल से हाथ मिलाकर वहीं सोफे पसर गया। अंकल को उन दोनों की बातों में कोई रुचि न थी, इसलिए उन्होंने करवट बदल ली। “इधर ही पास से गुजर रहा था...तुमसे मिलने की सोचकर चला आया। अंकल अब कैसे हैं। बर्टन ने पूछा।


“रात फिर तबीयत बिगड़ गई डॉक्टर ने दवाई दिया है..“प्रभु अंकल को शीघ्र स्वस्थ करे।" 

बर्टन बोला-“अरे हाँ, तुम तो एक-दो दिन में वापस जाने के लिए कह रहे थे क्या हुआ जा रहे की नहीं ??

“अंकल के कारण नहीं जा सका। तुम कैसे हो?" 

“बढ़िया हूं,  पाब्लो कहां है?" 

"शायद बाहर निकल गया है। आ जायेगा।


दोनों आपसी बातों में लगे थे। उसी समय बाहर पाब्लो के बहुत जोर-जोर से भौंकने की आवाज आने लगी।


“अरे, क्या बात है, पाब्लो इतना भौक क्यूँ रहा? चौक कर बर्टन बोला।


"जाने क्या बात है? अब से पहले तो यह ऐसे कभी नहीं भौका... ” एंड्रयू यह कहते हुए बाहर निकला।


एंड्रयू के बाहर निकलते ही बर्टन फुर्ती से उठा और जल्दी से अंकल के सिरहाने की साइड से गद्दा उठाकर उसके नीचे से चमगादड़ का पुतला निकालकर अपनी जेब में डाल लिया। अंकल ने सिर से पांव तक कंबल ओढ़ा हुआ था और अपना मुहं दीवार की तरफ कर रखा था। बर्टन अपनी जगह आकर इस प्रकार बैठ चुका था है जैसे कि वह सोफे से उठा ही न हो। ।


पाब्लो केभौकने का आवाज आना बंद हो गया था, जिसके कुछ देर बाद ही एंड्रयू भी वहां बाहर से आ पहुंचा। 

"क्या बात थी?

"ऐसा लगता है कि शायद कोई बिल्ली आई थी. पाब्लो उसे ही देखकर भौक रहा होगा। आओ, अब बाहर चलकर बैठते हैं। कहीं ऐसा ना हो कि हमारे कारण अंकल को कोई परेशानी हो... दोनों वहां से बाहर आ बैठे। .


दोपहर बाद अंकल आश्चर्यजनक रूप से स्वस्थ नजर आ रहे थे और चाय के समय उन्हें दुरुस्त देखकर एंड्रयू आश्चर्य में पड़ गया। ।


"कैसे हैं अंकल?” बेचैन एंड्रयू ने सवाल किया


"हमारा डॉक्टर वास्तव में जीनियस है, अब मैं एकदम सामान्य हूँ।" अंकल ने जवाब में बताया।


एंड्रयू हैरत में था कि आखिर यह चमत्कार कैसे हुआ? अंकल इतनी जल्दी स्वस्थ कैसे हुए? फादर बाथम ने जो कुछ बताया था, वह नहीं हो पाया। फादर बाथम ने कहा था कि दिन-पर-दिन अंकल की तबीयत खराब होती चली जाएगी, लेकिन हो उसके विपरीत रहा था। फिर मन को समझाया कि संभव है दवाओं के प्रभाव से तबीयत संभल गई हो तथा वह असर समाप्त होने पर दोबारा बीमार हो सकते हैं। उसने सोचा कि एक-दो दिन और प्रतीक्षा कर देख लेता हूं।


तीन दिन की प्रतीक्षा व्यर्थ गई, क्योंकि अंकल का स्वास्थ्य दिनोदिन सुधरता ही जा रहा था। एंड्रयू परेशान था कि ऐसा क्यों हुआ? अवसर पाकर एंड्रयू अंकल के शयन कक्ष में प्रविष्ट हुआ और गद्दा हटाकर ढूंढना प्रारंभ किया तो वहां से चमगादड़ का पुतला गायब था। एंड्रयू को झटका सा लगा। परेशानी में उसने पूरा बैड खंगाल डाला, किन्तु चमगादड़ जब वहां था ही नहीं तो मिलता कैसे?


'चमगादड़ बेड से कहां जा सकता है? आखिर उसे कौन ले गया?' एंड्रयू मन ही मन विचार कर रहा था। गद्दा चादर ठीक करते हुए उसके मन में आया कि शायद नौकरों ने गद्दा या चादर ठीक करते हुए पुतला हटा दिया होगा। चाहकर भी वह इस संबंध में नौकरों से सफाई नहीं मांग सकता था।

दूसरे दिन एंड्रयू ने पुनः फादर बाथम के दरबार में हाजिरी लगाई और सारा वृतांत उससे कह सुनाया।


फादर बाथम ने अनुमान जताया कि हो सकता है बिस्तर को साफ करने के दौरान किसी ने हमारा वह पुतला हटा दिया होगा...।" फादर ने दूसरा पुतला देते हुए समझाया कि इस बार ध्यान रखे।


एंड्रयू ने फादर को चढ़ावा चढ़ाकर धन्यवाद दिया और फिर चल दिया। वापस लौटकर वह अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। अंकल नहाने के लिए जब बाथरूम में घुसे तो वह जल्दी से उनके शयनकक्ष में चला गया। पाब्लो भी पीछे-पीछे था। एंड्रयू ने बहुत फुर्ती के साथ अंकल के तकिये की डोरी खोली और चमगादड़ को उसके अन्दर डाल दिया तथा डोरी खींच कर बन्द कर दी। इस प्रकार चमगादड़ अब तकिये के फोम के मध्य था। इस काम को निपटाकर चारों तरफ निगाह डालता हुआ एंड्रयू बाहर आ गया।


कुछ ही घंटे हुए होंगे कि अंकल की तबीयत फिर बिगड़ गई। एंड्रयू चमगादड़ का चमत्कार देखने के लिए उत्सुक था। वह उनके कमरे में पहुंचा तो अंकल पस्त नजर आ रहे थे।


" "कैसे हैं आप...।


अंकल कराहते हुए बोले- “मैंने शायद नहाकर गलत किया है...जिससे मेरी तबीयत फिर से बिगड़ गई है।" 

"प्लीज, पेन किलर ले लें।"


"जब दो पेन किलर लेने के बाद भी आराम नहीं मिला तो मैंने डॉक्टर को फोन कर दिया...वह आते ही होंगे।" 

करीब दस मिनट बीते होंगे कि अपना मेडिकल बैग उठाये डॉक्टर ने अन्दर प्रवेश किया। उसने अंकल को दवाइयां तो दी ही, स्वयं भी करीब दो घंटे उनके पास बैठा रहा और फिर एंड्रयू को उनका सर दबाने की हिदायत देता हुआ चला गया।


वहीं बैठकर एंड्रयू अंकल का सर दबाने लगा। सर दबाते हुए आधा घंटा ही हुआ होगा कि बर्टन वहां आ पहुंचा और सोफे पर बैठ गया।


औपचारिक अभिवादन के पश्चात बर्टन ने पूछा, आज अंकल कैसे हैं?


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आंखें बन्द करके लेटे हुए अंकल के चेहरे की ओर देखते हुए एंड्रयू ने उत्तर दिया-“दो दिन तो बिल्कुल सामान्य रहे, लेकिन आज वह फिर से बीमार हैं।' अंकल धीरे-धीरे कराह रहे थे। उसी समय बाहर से पाब्लो के कराहने जैसी आवाज आने लगी।


एंड्रयू डॉगी की कराह सुनकर बाहर की तरफ लपकता हुआ बोला- "लगता है शायद पाब्लो ने फिर से बिल्ली देखा होगा...।"


बर्टन ने उससे कहा-“जाकर देखो यार। वरना वह भौंकने लगेगा तो अंकल को परेशानी होगी। वह सिरदर्द से पहले ही त्रस्त हैं।"


समझने वाले अन्दाज में सिर हिलाता हुआ एंड्रयू बाहर निकल गया और बर्टन उठकर अंकल के पास जा पहुंचा।


“अब कैसे हैं अंकल?"


"दर्द से सिर फटने को हो रहा है...बुखार तो तेज है ही।" आंखें खोलते हुए भी अंकल को कष्ट हो रहा था।


“यदि आपकी आज्ञा हो तो सिर के नीचे से. तकिया हटा दूं? ऐसे में प्रायः डॉक्टर...।" अंकल का कोई जवाब हो, उससे पहले ही बर्टन ने सिर के नीचे से तकिया हटा दिया। गद्दे पर सिर रखते हुए अंकल ने आंखें बन्द कर लीं।


तकिये की डोरी खोलकर पत्थर का चमगादड़ निकालकर जेब में रखते हुए बर्टन ने फिर अंकल से पूछा "कुछ फर्क पड़ा?"

अंकल ने सर हिलाकर ना किया।


"ठीक है तो तकिया लगा लें। मैंने तो देखा है कि इस तरकीब से अधिकांश व्यक्तियों का सिरदर्द मिट जाता है।" कहने के साथ ही बर्टन ने तकिया फिर से अंकल के सिर के नीचे लगा दिया तथा तेजी से वहां से हटकर सोफे पर जा बैठा। एंड्रयू भी तभी पाब्लो के साथ कमरे में आ गया।


“यह बिना कारण भी भौंकता है, बहुत बद्तमीज है, ले आया हूं इसे।" कहते हुए एंड्रयू सोफे पर जा बैठा।


सुबह होने पर एंड्रयू के आश्चर्य की सीमा ना रही, जब उसने देखा कि अंकल भले चंगे नजर आ रहे हैं। निश्चय ही तकिये का कवर बदला गया होगा और कवर बदलने वाले ने चमगादड़ का पुतला निकाल लिया होगा। लेकिन आखिर रात को ही तकिये का कवर बदलने की नौबत कैसे आ गई? यही विचारता हुआ असलियत जानने के लिए वह अंकल के कमरे में जा पहुंचा।


एंड्रयू ने देखा कि तकिये का कवर बदला नहीं गया था, बल्कि वही पुराना कवर था और अंकल आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे थे।


“अब कैसा महसूस हो रहा है अंकल ?"


"प्रभु की कृपा से अच्छा फील कर रहा...।" अंकल ने संक्षेप में एंड्रयू की बात का जवाब दिया और फिर से अखबार में खो गये।


मन ही मन परेशान एंड्रयू कुछ देर तो वहीं खड़ा रहा, लेकिन फिर थके-थके पांव वापस अपने कमरे में पहुंचा और हाथों से सिर पकड़कर सोफे पर बैठ गया। वह सोच रहा था कि तकिये का कवर वही है तो हो सकता है कि इसे झाड़ा गया हो और चमगादड़ निकलकर गिर गया हो। लेकिन तकिये की डोरी मैंने इतनी कसकर बांधी थी कि चमगादड़ निकल नहीं सकता था। अतः एक बार तकिया खोलकर देख तो लूँ! यह भी तो सम्भव है कि चमगादड़ तकिये में ही हो और किसी कारण अपना असर खो बैठा हो।


अवसर पाकर वह अंकल के शयनकक्ष में चला गया और तकिये की डोरी खोली तो उसे झटका लगा। क्योंकि तकिये के भीतर से चमगादड़ गायब हो चुका था। ठीक से देखभाल कर उसने तकिये की डोरी फिर बन्द करके तकिया यथा स्थान रख दिया तथा सीधे फादर बाथम के दरबार में जाकर हाजिर हो गया।


उसने सारी बात विस्तार से फादर को बताई और परेशान अंदाज में बोला कि मैंने चमगादड़ तकिये में इस प्रकार छिपाया था कि सोने वाले को भी पता नहीं लगना चाहिए था, फिर भी वह गायब हो गया।


"शायद किसी कारण वहां तुम्हारे अंकल का हाथ पड़ गया हो और तकिये में कुछ होने का पता लगने पर उन्होंने चमगादड़ को निकाल दिया हो...।" 


“जैसा आप कह रहे हैं, वैसा भी हो सकता है, लेकिन अब मैं क्या करूं?" उदासी भरे स्वर में एंड्रयू ने पूछा।


तब फादर ने हांडी में हाथ डालकर कपड़े से बनाया हुआ एक पुतला निकाला और एंड्रयू को पकड़ा दिया। इसके बाद फिर हांडी में हाथ डालकर सुइयों का गुच्छा निकाला और वह भी उसे पकड़ाते हुए बोले- “मैं आज तुम्हें यह नई चीज दे रहा हूं, जिसे तुम बैड की साइड वाली दराज में रखकर उसकी चाबी अपने पास रख लेना। इस गुच्छे में पन्द्रह सुई हैं और तुम्हें प्रतिदिन एक सुई इस पुतले में चुभानी है। तब पन्द्रह दिन बीतने पर ना सुई बचेगी और ना तुम्हारे अंकल ।"


दोनों चीजें लेकर एंड्रयू ने अपने ओवरकोट की भीतरी जेब में रख ली तथा फादर को चढ़ावा चढ़ाकर बाहर आ गया और गाड़ी में बैठकर घर वापस आ गया।


अगले दिन शाम की चाय पीने के लिए अंकल लॉन में आये तो एंड्रयू जल्दी से उनके सोने के कमरे में जा पहुंचा तथा कुछ देर के प्रयास के बाद उसे चाबियों का वह गुच्छा मिल गया, जिसमें सारे घर की चाबियां थीं। खूटी पर लटकी हुई अंकल की शर्ट की जेब से यह गुच्छा मिला था।


गुच्छे में से ढूंढ कर एंड्रयू ने दराज की चाबी निकाल ली तथा गुच्छा अंकल की शर्ट की जेब में वापस पहुंचा दिया। उसने चाबी से दराज खोली और गुड्ढे को जेब से निकाल कर एक सुई उसमें चुभा दी। इसके बाद गुड्डे को दराज में डालकर दराज का ताला लगा दिया तथा चाबी उसने अपनी जेब में रख ली और लॉन में वापस आ गया। 


अंकल चुपचाप बैठे चाय पी रहे थे। इन सब कारगुजारियों के दौरान पाब्लो एंड्रयू के साथ साथ ही था।


रात आते आते अंकल फिर से लुढ़कते नजर आने लगे। एंड्रयू ने उनके पास जाकर पूछा, ''अंकल क्या बात है, क्या सिरदर्द फिर शुरू हो गया?"


\''तुम डॉक्टर को फौरन फोन करो, .. ।" दर्द से कराहते हुए अंकल बोले..."आज तो सारे शरीर में दर्द है... । शायद बीमारी मुझे लेकर ही जायेगी...।"


एंडयू ने डॉक्टर को फोन कर दिया।


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डॉक्टर ने आते ही अंकल को चेक करके एक इंजेक्शन लगाया और दवाइया दी। लेकिन अंकल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। थककर डॉक्टर ने उन्हें सुलाने के लिए नींद का इजेक्शन लगा दिया और वह जब सो गये तो एंड्रयू से बोला "अब आप निश्चित होकर सोइए, अब सारी रात ये आराम से सोयेंगे। सुबह, आकर मैं इन्हें फिर से देखूगा।" यह कहकर डॉक्टर चला गया।


रात को किसी समय अजीब सी आवाज से एंड्रयू की नींद खुल गई।


लेटे-लेटे ही उसने चारों तरफ देखने का प्रयास किया तो उसने महसूस किया, टेलीफोन स्टैंड के पास से कुछ विचित्र से आवाजें आ रही हैं। अंधेरे में उसने गौर किया तो वह सन्न रह गया, क्योंकि कुत्ता पाब्लो पिछले पैरों के सहारे इंसान की भांति खड़ा हुआ था और टेलीफोन का रिसीवर उठाये जाने किस भाषा में धीरे-धीरे बोल रहा था।


पाब्लो की इस हरकत से एंड्रयू आश्चर्य में डूब कर रह गया और सोचने लगा कि पाब्लो क्या कर रहा है? फिर उसने सोचा कि यह सब सपना तो नहीं है? तब धीरे से उसने अपनी आंखें मलकर देखा तो पाया कि कुत्ता वाकई टेलीफोन से किसी को कुछ संदेश दे रहा था। थोड़ी देर बाद पाब्लो ने धीरे से रिसीवर क्रेडिल पर टिका दिया और एंड्रयू की तरफ देखा, जिसने फौरन आंखें मींचकर सोये होने का नाटक किया। आश्चर्य और डर से उसके दिल की धड़कनें बहुत तेजी से चलने लगीं। हर धड़कन सीने में हथौड़े सी बजती प्रतीत हो रही थी। कुछ समय पश्चात उसने धीरे से आंखें खोली तो पाया कि पाब्लो सोफे पर पसरा हुआ था।


एंड्रयू का दिमाग चक्करा गया कि आखिर यह माजरा क्या है? क्या एक कुत्ता फोन भी कर सकता है? और किसी को कोई संदेश भी भेज सकता है? उसे पूरा विश्वास हो गया कि यह कुत्ता नहीं, बल्कि कोई खतरनाक बला है।


अब एंड्रयू के विचार दूसरी ओर घूम गया। 'इस वक्त यह मेरे खिलाफ दूसरी ओर मौजूद किसी आदमी को कोई संदेश दे रहा था। यह कर क्या रहा था? आखिर रात के इस पहर में यह किससे बात कर रहा था? ये आखिर क्या बातें कर रहा था?' यकायक जैसे उसके दिमाग में कोई प्रकाश किरण चमक उठी-ओह माई गॉड! यह तो हर पल मेरे साथ साये की तरह चिपका रहता है। फादर बाथम के पास जाता तो यह मेरे साथ होता है। अंकल के कमरे में चमगादड़ रखने जाता था तो यह साथ होता था। अब पुतले को सुई चुभाकर रखा है, तब भी यह मेरे साथ था।


कहीं यह टेलीफोन पर दूसरी ओर मौजूद व्यक्ति को वही सब तो नहीं बता रहा था?' विचार करते-करते उसका सिर फटने को हो आया। उसने निश्चय कर लिया कि दिन निकलते ही वह बर्टन को बतायेगा। लेकिन शायद वह उसका मजाक उड़ायेगा कि भला कुत्ता भी किसी को फोन कर सकता है। आखिर मैं क्या करूं? वैसे इस मामले में फादर बाथम से तो बात की ही जा सकता है। यह निश्चय कर एंड्रयू सो गया।


प्रातःकाल काफी देर से एंड्रयू की नींद खुली। जगाने पर उसका दिमाग फिर चकराने लगा कि आखिर यह डॉगी क्या बला है और फोन पर किससे बात कर रहा था?


एंड्रयू नाश्ता करके अंकल के कमरे में पहुंचा। पीछे-पीछे डॉगी भी था। अंकल भी जाग चुके थे। डॉक्टर भी चेकअप के लिए आ चुका था। दर्द से अंकल कराह रहे थे। डॉक्टर वापस चला गया और एंड्रयू अंकल के पास बैठ गया। इसके कुछ ही देर बाद इंसपेक्टर बर्टन भी वहां आ पहुंचा और कमरे में प्रवेश करता हुआ अंकल के स्वास्थ्य के बारे में पूछने लगा।


बर्टन से हाथ मिलाकर उन्हें सोफे पर बैठाते हुए एंड्रयू ने जवाब दिया...।"


"ब्रदर, रात से फिर वही हालत है


 “माई डियर फ्रैंड, शहर में तो अच्छे-अच्छे डॉक्टर हैं, तुम अंकल को किसी और डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते...।"


एंड्रयू ने जवाब दिया कि अंकल को इसी डॉक्टर की दवाई सूट करती है। और अंकल को भी इस पर पूरा विश्वास है।


दवाई खाकर अंकल दीवार की तरफ मुंह कर लेटे हुए थे। तभी बाहर की ओर से डॉगी के जोर से भौंकने की आवाज सुनकर एंड्रयू झल्ला गया। "देखो तो जरा...क्या बात है?" बर्टन ने कहा।


“यार, यह ऐसे ही भौंकता रहता है। थोड़ी देर में आप ही शांत हो जायेगा।" उपेक्षा के साथ एंड्रयू ने कहा और फिर बर्टन से बातों में लग गया। किन्तु पाब्लो के गुर्राने और भौंकने की आवाजें और ज्यादा हो गयीं और उसकी गरज से पूरा बंगला गूंजने लगा। जिससे परेशान होकर अंकल ने धीमी और कमजोर आवाज में एंड्रयू को पुकार कर कहा "देखो तो...आखिर यह कुत्ता इतना क्यों भौंक रहा है?" कहते हुए अंकल ने फिर से आंखें मूंद लीं। "


एंड्रयू को उठना ही पड़ा। वह रात से लवली से भय अनुभव कर रहा था। इसलिए वह उसका सामना करने से भी बच रहा था। जैसे ही एंड्रयू कमरे से बाहर गया, बर्टन ने एकदम उठते हुए अपनी जेब से मास्टर चाबी निकाली तथा बेड की दराज का ताला खोल डाला। दराज खुलने के साथ ही बर्टन को कपड़े का बना हुआ वह पुतला दिखाई पड़ा जिसमें सुई चुभाई गई थी। उसने हाथ बढ़ाकर वह पुतला निकाला और अपने कोट की भीतरी जेब में डालकर सोफे पर आ बैठा।


अब पाब्लो ने भी भौंकना बंद कर दिया था, जिसके कुछ ही समय बाद एंड्रयू कमरे में वापस आ गया।


बर्टन ने मुस्कुरा कर पूछा-"क्या बात थी?"


"भाई, तुम इसे वापस ले जाओ। वरना यह मुझे पागल कर देगा...।" भड़कते से एंड्रयू ने जवाब दिया।


"अरे, मेरे प्यारे डॉगी से घबरा गये?"


"दोस्त, इस कुत्ते को अपने ही पास रखो तो मेरी भलाई है!" झल्लाये एंड्रयू ने जवाब दिया। एक बार को तो उसने सोचा कि रात वाली घटना के विषय में बर्टन को बता दे, लेकिन ना जाने क्या सोच के वह चुप्पी साध गया।


"ठीक है, ले जाऊंगा। लेकिन दो-तीन दिन मुझे जरूरी काम है, जरा उन्हें निपटा लूँ।” कहकर बर्टन खड़ा हो गया और विदाई के लिए एंड्रयू से हाथ मिलाकर बोला, "अब मुझे आज्ञा दो।"


एंड्रयू ने बर्टन के जाने के पश्चात अंकल पर निगाह डाली। डॉक्टर ने शायद उन्हें नींद की कोई दवा दी थी, जिसके कारण वह सो चुके थे।


एंड्रयू ने विचार बनाया कि पुतले में दूसरी सुई भी चुभा दूं। सही अवसर है, अंकल भी घोड़े बेचकर सोये हैं। दबे पांव वह बैड के निकट आया और जेब से दराज की चाबी निकालकर ताला खोला तो उसकी हैरानी की सीमा ना रही, क्योंकि दराज में कुछ नहीं था। वह पूरी तरह खाली पड़ी थी।


काटो तो खून नहीं! एंड्रयू पर मानो तो आसमान गिर पड़ा हो। आखिर हो क्या रहा है? वह सोच-सोच कर मरा जा रहा था। दराज की चाबी मेरी जेब में है, तो यह दराज किस प्रकार खोली गयी? यदि दराज को खोला नहीं गया, तब पुतला कहां चला गया? वह मानो पत्थर बन गया हो।


उसने तुरन्त दराज बन्द की और उसी वक्त बाहर आ गया तथा बिना देर किये फादर बाथम के पास जाने को निकल पड़ा। आज उसने कुत्ते को साथ नहीं लाया। 

फादर बाथम के यहां वह पंक्ति में जाकर खड़ा हो गया और बारी आने पर-जो भी हो रहा था-सब उन्हें कह सुनाया। कुत्ते का कारनामा भी और पुतले के गायब होने के बारे में भी सब कुछ विस्तार से बता दिया। यह सब सुनकर फादर के माथे में भी बल पड़ गये। उन्होंने एंड्रयू से पूछा-

"अंकल के कमरे के अन्दर तुम्हारे और घरेलू नौकरों के अलावा भी अन्य कोई और जाता हो तो बताओ...।'


"अंकल का हालचाल जानने के लिए अब कोई नहीं आता है। पहले उनके कुछ यार-दोस्त आ भी जाते थे। एक मेरा नया दोस्त बर्टन है। वह अवश्य आ जाता है। पाब्लो कुत्ता, जो मेरे पास है, वह भी उसी का है।"


“अच्छा तो...बर्टन कब और कितनी बार आया है?"


"उसका आना तो होता ही रहता है। कई बार डाक्टर गया और वह आया है... ।'' "उसके रहते हुए तुमने अंकल का कमरा छोड़ा है?"


"हाँ! ऐसा कई बार हुआ है।" कहते ही एंड्रयू किसी विचार से एकदम चौंक कर उछल पड़ा। वह करीब-करीब चिल्लाकर बोला-"अभी एक विशेष बात मेरे ध्यान आयी है। जिस पर मैंने कभी नहीं सोचा...।" लगता था कि जैसे एंडयू सब कुछ समझ गया। 


उसने फादर को बताया "फादर, बर्टन जब भी आता है, तो कुत्ता बाहर चला जाता है, और वह अचानक जोर-जोर से भौंकने लगता है। तब उसे चुप कराने मैं बाहर निकलता हूं और बाहर चुप कराने के दौरान, बर्टन ही अंकल के शयनकक्ष में अकेला होता है। इसके बाद वह वापस चला जाता है...और तुरन्त अंकल का स्वास्थ्य सुधरने लगता है। और आपका दिया वस्तु भी गायब हो जाता है।"


"यह बात है... ।” फादर मानो सब कुछ जान गये। गर्दन मटकाते हुए उन्होंने कहा- “बर्टन और यह कुत्ता रूपी बालक एक-दूसरे के पूरक हैं। तुम मुझसे जो भी ले जाते हो, तुम्हारे साथ आकर वह देख लेता है और तुमसे निरन्तर चिपके रहकर वह उसके रखने का स्थान भी देख लेता है। फिर रात में फोन से बर्टन को सब कुछ बता देता है। अगले दिन बर्टन आकर बैठता है। बाहर कुत्ता इतना बवाल करता है कि उसे सम्भालने के लिए तुम अंकल के कमरे से बाहर चले जाते हो और उसी दौरान बर्टन अपनी कार- गुजारी दिखा देता है।"


चिंतातुर स्वर में एंड्रयू ने पूछा- “मैं तो समझ नहीं पा रहा हूं फादर...कि बर्टन यह सब क्यों कर रहा है? इससे कैसे निपटें?"


“सब भूलकर पहले तो इस कुत्ते से निबटा जाये...।' फादर बाथम बोले और इसके बाद धुआं फैलाने वाली हांडी में हाथ डाला। हाथ बाहर आया तो उसमें एक सलीब थी। सलीम एक डोरी में बंधी थी। फादर ने उस सलीब पर कुछ समय मंत्र पढ़कर फूंका और एंड्रयू को सलीब थमा दी।


उन्होंने कहा-“अब जो काम तुम्हें करना है, कठिन है, लेकिन किसी भी तरह यह करना ही होगा। यह सलीब तुम्हें कुत्ते की गर्दन में डाल देनी है। जबकि इस सलीब को वह कभी सहज ही नहीं पहनेगा। उसे सलीब पहनाने के लिए पूरी तरह चतुराई से काम लेना होगा। -


कुत्ता यदि इसे पहन लेगा तो वह पागल हो जायेगा और फिर वह मर भी जायेगा। उसके पश्चात तुम्हारे अंकल के संबंध में विचार किया जायेगा।"


फादर का धन्यवाद कर एंड्रयू वहां से घर के लिये वापस हो गया। जब वह बंगले पर पहुंचा तो दोपहर बीतने को हो रही थी। आंगन में बैठा डॉगी मानो उसी की प्रतीक्षा कर रहा था और देखते ही पूंछ हिलाता उसकी तरफ बढ़ा।


उसे बांधने के लिए एंड्रयू बाजार से एक जंजीर खरीद कर लाया था। जिसे समेटकर उसने मुट्ठी में छिपाया हुआ था। जैसे ही कुत्ता उसके पास आया तो झपट कर उसने उसे दबोच लिया और जब तक वह कोई हरकत कर पाता, वह वो जंजीर उसके गले में डालकर तेजी से बांध दिया। अब एक सिरा उसकी गर्दन में था और दूसरा एंड्रयू के हाथ में। अब उसकी जंजीर पकड़कर एंड्रयू अपने शयनकक्ष में पहुंचा और उसे वहां पड़े सोफे के पाये में बांधकर स्वयं अंकल के कमरे में पहुंचा। वह इस समय सोये हुये थे।


बाहर आकर एंड्रयू ने नौकर से अंकल के विषय में जानकारी ली तो उसने कहा-"साहब ने खाना खाया था। फिर दवा लेकर सो गये।"


अंकल की तरफ से तसल्ली होने पर एंड्रयू अपने सोने के कमरे में चला गया। वहां पाब्लो खामोशी के साथ सोफे पर पसरा हुआ था। उसे चैन से बैठा पाकर एंड्रयू ने कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया। फिर आगे बढ़कर उसने फादर बाथम द्वारा दिया गया सलीब निकाला और कुत्ते की तरफ हाथ बढ़ाया। किन्तु सलीब को देखते ही सोफे पर पसरा पाब्लो एकदम उठ गया और वह भयानक रूप से गुराने लगा।


किन्तु उसके गुराने की परवाह न करके एंड्रयू ने फुर्ती के साथ उसके गले में सलीब डालकर डोरी कसकर बांध दी। पाब्लो के बाल इतने लम्बे थे कि डोरी और सलीब उसमें चुप गया।


इस काम से फ्री होकर एंड्रयू बैड पर अधलेटा होकर बैठ गया। उसे कुत्ते पर क्रॉस की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी। गले में क्रास बंधे ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा ही हुआ होगा कि पाब्लो के भाव परिवर्तित होने लगे। वह गुस्से में उछल-कूद करने लगा। भौंक-भौंक कर वह जंजीर तोड़ने का प्रयास करने लगा। चुप-चाप बैठ एंड्रयू बस उसे ही देख रहा था।


फादर बाथम के कहने के अनुसार पाब्लो पर पागलपन सवार हो चुका था। उसकी आंखें सुर्ख होकर अंगारे बरसा रही थीं। जुबान सामान्य से बहुत अधिक बाहर निकल आयी थी और उसकी दशा भी बिगड़ने लगी थी। वह बार-बार भयानक ढंग से गुर्रा रहा था और भौंक रहा था। वह कभी सोफे पर उतर-चढ़ रहा था और कभी एंड्रयू पर हमला करने का प्रयास कर रहा था।


उसी समय किसी ने दरवाजा खटखटाया तो एंड्रयू ने भीतर आने को कह दिया। दरवाजा धकेलता हुआ खानसामा भीतर घुसा और उसने पाब्लो के इस प्रकार शोर मचाने के बारे में पूछा।


एंड्रयू ने रुखाई से जवाब दिया-“कोई बात नहीं है। तुम जाओ और देखो...किसी को भी इधर आने से मना कर देना...।"


खानसामा उसकी बात सुनकर लवली की हरकतों को देखता हुआ वापस चला गया। वह अंकल की ओर से निश्चित था। क्योंकि उसे नौकर ने बता दिया था कि वह खाना खाकर दवाई लेकर सोये हैं।


वास्तव में डॉगी अब पूरी तरह पागलों वाली हरकतों पर उतर आया था। गुर्राहटें तेज होते-होते वह भौंकने में बदल गयीं। अभी उसकी इस हालत को एक घंटा भी नहीं हुआ था कि एक तेज झटके से दरवाजा खुला और परेशानी की हालत में बर्टन भीतर घुस आया। उसकी आंखें लाल हो रखी थीं। पसीने से नहाया लग रहा था वह और उसकी सांसें फूली हुई थीं।


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अंदर घुसते ही वह बौखलाये अंदाज में चिल्लाया- "मेरे पाब्लो को क्या हो गया है? और तुमने इसे बांध क्यों रखा है?' कहकर वह फुर्ती से आगे बढ़ा और डॉगी के गले में बंधी जंजीर खोल डाली तथा उसके शरीर पर प्यार से हाथ फेरने लगा। उसके आते ही एंड्रयू उठकर खड़ा हो गया। 


वह घबराकर बोला-“क्या कर रहे हो बर्टन? मत खोलो इसे। इसके पास भी मत जाओ। यह पागल हो चुका है।"


एंड्रयू के कहने के बावजूद भी बर्टन जल्दी-जल्दी डॉगी के शरीर को मानो टटोल रहा था। वह काट खाने वाले अंदाज में बोला-“कल तक यह बिलकुल सामान्य था। आज भला क्या हो सकता है?"


भयानक खूनी नजरों से बर्टन एंड्रयू को घूर रहा था और जब तक उसे कोई प्रत्युत्तर मिलता, अचानक उसका हाथ कुत्ते के गले में बंधी डोरी पर पड़ गया। इसके साथ ही उसकी क्रोध भरी आंखों में हैरत जाग उठी। एंड्रयू को भयानक ढंग से घूरते बर्टन ने वह डोरी झटके से तोड़ डाली। टूटी डोरी के साथ बंधी सलीब भी उसके हाथ में  लटकने लगा।


यह देखकर मानो बर्टन के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। गुस्से में कांपता हुआ वह एंड्रयू को घूरने लगा। क्रोध से वह दांत पीस रहा था। उसी समय पाब्लो भयानक गुर्राहट के साथ उछला और उसने एंड्रयू पर आक्रमण कर दिया।


जब तक एंड्रयू संभलता, डॉगी उस पर हावी हो चुका था। उसने बुरी तरह उसे जगह-जगह से फाड़ डाला। बचने के विफल प्रयास में वह धरती पर गिर गया और जल बिन मछली की भांति तड़पता हुआ कराहने लगा। कुछ दूर खड़ा बर्टन उसकी दुर्दशा देखकर प्रसन्न हो रहा था...और एंड्रयू की ओर अंगुली कर कोई मंत्र पढ़ने लगा।


पाब्लो एक ताकतवर कुत्ता था। उसने एंड्रयू के हाल बिगाड़ कर रख दिये। उसे जगह-जगह से घायल करने के साथ ही उसके कपड़ों को फाड़कर चीर-चीर कर डाला। यहां तक कि उसकी हालत इतनी पस्त हो गयी कि वह हिल-डुल भी नहीं पा रहा था। तब डॉगी ने उसके जख्मों का खून चाटना प्रारम्भ कर दिया। खून चाटता हुआ वह उसके चारों ओर घूम रहा था। यह क्रम लगभग दस मिनट चला।


एंड्रयू फर्श पर पड़ा था और उसके मुंह से कराहट निकल रही थी अभी पाब्लो को जख्म चाटते दस मिनट पूरे हुए ही थे कि चमत्कार होने लगा। यदि कोई साधारण इन्सान देख लेता तो शायद बेहोश ही हो जाता। क्योंकि डॉगी ने कमरे के फर्श पर एक दो करवट ली और सीधा हुआ तो वह कुत्ता के रूप में नहीं, बल्कि एंड्रयू बन गया था और उधर एंड्रयू का रूप भी बदलना प्रारम्भ हो चुका था। कुछ देर पश्चात एंड्रयू डॉगी बन चूका था, और वो भी घायल डॉगी का रूप में। एंड्रयू की आत्मा डॉगी के शरीर में जा पहुंची थी। वह बेबस पंछी की तरह फर्श पर पड़ा फड़फड़ा रहा था। ।


एंड्रयू का स्वरूप ले चुका डॉगी मुसकराता हुआ खड़ा था। अपने को सामान्य रूप में देख सन्तुष्टि अनुभव करता वह बर्टन की तरफ बाहें उठाकर आगे बढ़ा। जवाब में बर्टन भी बाहें फैलाकर बेताबी से उसकी ओर को लपका। दोनों एक-दूसरे से इस प्रकार लिपट चुके थे मानो बरसों से बिछुड़े दो परिजन आज मिले हों। 


"शाबास बेटा शाबास!" नकली एंड्रयू को गले लगाता हुआ बर्टन बोला-“तुमने इतने दिन परेशानी झेली और मंजिल के इतने पास आने में मदद की। जिसके फलस्वरूप यह करोड़ों की सम्पत्ति अब हमारी होने वाली है। कोई अनुमान भी नहीं कर सकेगा कि एंड्रयू के स्थान पर कोई भी हो सकता है...।"


"वाकई आप ग्रेट हैं डैड।" कुत्ता रूपी एंड्रयू कह रहा था। लेकिन फिर वह मुंह बनाकर गुस्सा दिखाता हुआ बोला- "लेकिन आपने बहुत समय लगा दिया...जिससे मुझे इतने समय कुत्ता बनकर रहना पड़ा...।"


"असलियत यह है माई सन कि मेरा इरादा केवल इतना था कि तुम असली एंड्रयू के साथ ज्यादा से ज्यादा रहकर उसकी प्रत्येक आदत सहज रूप से सीख सको। उससे चिपक कर तुम उसके खाने-पीने, रहन-सहन, बोल-चाल और उठने-बैठने आदि को सही प्रकार से अपने मन-मस्तिष्क में बिठा लो। क्योंकि अब तुम्हें एंड्रयू ही बनकर रहना है..."


बर्टन ने खुलकर अट्टहास करते हुए कहा-“अब अंकल का मरना निश्चित रूप से तय है...तथा उसकी सम्पत्ति के स्वामी तुम बन जाओगे।"


"लेकिन डैडी! यह सब आपने कैसे जान लिया था?"


"बेटा, जब यह मेरे साथ ट्रेन में सफर कर रहा था तो इसके विषय में मैंने जान लिया था कि यह करोड़ों की सम्पदा का हकदार बनने वाला है। बस...इसके साथ सारी योजना तैयार कर मछली फंसाने के लिए जाल तैयार कर लिया था।


ही मैंने


इसके पश्चात तुम्हें स्टेशन आने के लिए फोन करने के बाद मैंने उसी कम्पार्टमेंट में, जिसमें यह सफर कर रहा था, इसी के सामने वाली बर्थ रिजर्व करा ली थी। और फिर बातों का सिलसिला चल निकला था। उसी समय बातें करते समय इससे ऐसी दोस्ती कि वह हमें हमारे लक्ष्य तक ले आयी।"


“आखिर हमारे द्वारा सीखी गयी ब्लैक मैजिक की विद्या किस दिन काम आती डैड? यह इस रूप में कैसे आता?" नीचे घायल पड़े डॉगी रूपी एंड्रयू की ओर इशारा कर नकली एंड्रयू जोर से हंसता हुआ बोला।


"इस एक दांव ने तो हमारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी का भविष्य रोशन कर दिया है बेटे।" "लेकिन डैड...इसकी बीवी और बच्चा भी तो हैं...।" नकली एंड्रयू अर्थात डॉगी ने पूछा।


"इसके बीवी और बच्चा? हूं...बेटे, उन्हें तो बचाकर रखो। फिर इसकी पत्नी बहुत खूबसूरत भी तो है...अरे करोड़ों की सम्पदा और शानदार पत्नी...समझो कि ऐश दर ऐश...और अभी इस पाब्लो को भी तो अपने हिसाब से ढालना है।" डॉगी यानि एंड्रयू की तरफ इशारा कर बर्टन बोला।


इस बात पर बाप-बेटे ने एक साथ ठहाका लगाया।


"लेकिन डैड...मुझे एक बात का डर सता रहा है?" "कैसा डर?"


"मैं तो एंड्रयू के रूप में रहूंगा, अतः किसी दिन आप के मन में अपने बेटे के असली रूप में रहने की चाहत जाग उठी तो क्या होगा?"


"अरे. बेटे, भला यह क्या बात हुई?"


"डैड, मैं कहीं तक सच ही डर रहा हूं। लेकिन मैं रिस्क लेने के मूड में बिल्कुल नहीं हूं...।" अचानक नकली एंड्रयू का अंदाज बदल गया। चौंक कर बर्टन ने उसके चेहरे के नये भाव पढ़ने का प्रयास करते हुए कहा-


"क...क...क्या मतलब है तुम्हारा?"


“मतलब साफ है डैड... । न तो मैं अपना कोई राजदार चाहता हूं और न कोई खतरा लेना चाहता हूं...।" डॉगी एंड्रयू का चेहरा शैतान की चमक देने लगा।


अचानक कोई अनजानी आशंका भांपकर बर्टन का चेहरा भय से जर्द पड़ गया। लेकिन जब तक वह कुछ सोच पाता कि बेटा उस पर झपट पड़ा और उसकी गर्दन पकड़कर बाप के सीने पर झूल गया।


बर्टन ने बचने का प्रयास तो किया, लेकिन यह सब कुछ इतना अप्रत्याशित था की अतः वह सम्भल नहीं पाया और केवल दो मिनट में ही उसकी गर्दन एक तरफ झूल गयी। नकली एंड्रयू के चेहरे भयानक वहशत नाच रही थी। उसने बाप के मुर्दा शरीर को बैड पर पटक दिया। अब उसके होंठों पर सन्तुष्टि भरी मुस्कराहट थी।


"बाप बड़ा न भैया, सब से बड़ा रुपया!" कहकर नकली एंड्रयू मुसकराया और फिर बड़बड़ाने लगा-"न राजदार चाहिए और न साझीदार। भले ही वह बाप क्यों न हो।"


अपने अंकल की जायदाद हथियाने के लिए उनकी जान लेते-लेते अपनी जान फंसा बैठा एंड्रयू अब कुत्ते के रूप में घायल धरती पर पड़ा था और पछता रहा था कि उसने ऐसा करने का दंड सही पाया है। जब उसने बेटे के हाथ बाप को लुढ़कते देखा तो उसके दिल को बड़ा सुकून मिला।


अब डॉगी एंड्रयू का लक्ष्य बाप की लाश को ठिकाने लगाना और अंकल को जल्दी ऊपर रवाना करना भर था। लेकिन बड़ी फुर्सत में, एक मासूम मुस्कराहट के साथ वह शांत मस्तिष्क के साथ भविष्य की योजना तैयार कर रहा था।


फर्श पर पड़ा एंड्रयू डॉगी के रूप में जख्मों के दर्द से बिलबिलाकर आंसू बहा रहा था।


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