Funny Hindi Horror Story 2021: भुतहा महल | Bhutaha Mahal

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Funny Hindi Horror Comedy Bhutaha Mahal


Funny Hindi Horror Story 2021: Bhutaha Mahal
फनी हिंदी हॉरर स्टोरी 2021:  भुतहा महल

कंट्रोल महल। यही नाम था उस बरसों से वीरान पड़े उस प्रेत भवन का। इसका इतिहास भी बड़ा पुराना था। तीन सौ साल पुराना भवन था। यहां जो भी इसमें बसने के इरादे से आया, वही पछताया।


अब मिस्टर केबिन का इरादा हुआ इस भुतहा भवन को खरीदने का। जिस पर उनके यार-दोस्त व नाते-रिश्तेदार कोई खुश नहीं हुआ। बल्कि सबने उसे समझाने का प्रयास किया।


केबिन कुछ समझने या किसी की बात मानने को तैयार न था। वह ठान चुका था कि यह भुतहा महल वह खरीद कर ही मानेगा। भूत-प्रेत जैसा कोई अस्तित्व नहीं होता। इसलिए कंट्रोल महल की खरीदारी में कोई अनहोनी बात नहीं।


इस महल का स्वामी मि० कंट्रोल एक भले और दयालु व्यक्ति थे। वह किसी को जानबूझकर यह महल देकर संकट में डालने के इच्छुक बिल्कुल नहीं थे। उन्होंने केबिन को भी समझाने का प्रयास किया और यहां तक स्पष्ट बताया कि हमने खुद भी एक बार इस महल में रहने का फैसला किया था। हमने यहां रहना प्रारम्भ कर दिया। लेकिन हमारी मुसीबतों के द्वार खुल गये। एक बार मेरी दादी जब रसोईघर में काम कर रही थी तो अचानक लोहे के शिकंजों जैसे हाथों ने उन्हें कंधों से पकड़कर झिंझोड़ डाला था। वह बेहोश हो गयी थीं। बेहोश होते समय उन्होंने वहां एक कंकाल को देखा था...।


एक दिन मिस्टर थामस, जो किंग्ज कालेज आफ कैम्ब्रिज के डायरेक्टर थे, चाय पर आये थे। सब के साथ टेबिल पर बैठ कर जैसे ही उन्होंने चाय का प्याला मुंह की ओर बढ़ाया तो वही हाथ उनकी ओर झपटे और उनकी नाक ऐसी सख्ती से खिंच दी कि उनका दिमाग क्षतिग्रस्त हो गया।


इसके बाद मानो हमारा चैन और नींद हराम हो गयी। एक भी रात ऐसा बिता हो जब हम आराम की नींद ले सके हो। भवन के कमरों व बरामदों में पैशाचिक स्वर गूंजने लगे। हमारे चारों तरफ भयानक शक्लें नजर आने लगीं।


इस सबके बावजूद केबिन अपने निश्चय पर अडिग रहे। अन्ततः मि० कन्ट्रोल ने उसे कंट्रोल महल सौंप दिया। लेकिन एक बात भी साफ-साफ कर दी कि आप भले ही भूत-प्रेत का अस्तित्व न मानें, लेकिन मैंने जो भी बताया था, स्वयं भुगता हुआ था। याद रखिए, यह भूत नहीं, यह तो खतरनाक आफत है। जहां टूटे, वहां तबाही मचा देती है। यह सब आपके साथ भी अवश्य होगा और आप उस वक्त ऐसे फंस चुके होंगे कि चाहकर भी निकल नहीं पायेंगे। आपको भागने की राह भी नहीं मिलेगी।


केबिन अपने बीवी-बच्चों के साथ स्काट रेलवे स्टेशन पर पहुंचा। ट्रेन उन्हें उतारकर आगले स्टेशन के लिए रवाना हो गयी। यहां से वह सबके साथ कंट्रोल महल के लिए एक जीप में बैठकर चल पड़े। वहां ठंडी हवा चल रही थी, मौसम बड़ा दिलनशीं था। वृक्षों पर परिन्दे शोर कर रहे थे। डूबते सूरज की नारंगी किरणें दूर से ही कंट्रोल महल की दीवारों पर बरस कर उसकी खूबसूरती दर्शा रही थीं।


लेकिन जैसे ही महल के द्वार पर आकर जीप रुकी तो हवाओं ने अचानक तूफानी रूप धारण कर लिया। ऐसा आभास होने लगा कि कुदरत को केबिन का निर्णय पसन्द नहीं आया था। उसी समय सुर्ख रंगत के साथ आंधी जोर पकड़ गयी, जैसे आसमान से रक्त बरस पड़ा हो। आसमान में बड़े-बड़े चमगादड़ उड़ते नजर आने लगे।


जीप की आवाज सुनकर महल की बूढी नौकरानी बाहर निकली और इन सब का स्वागत किया। उसने बिल्कुल सफेद कपड़े पहन रखे थे और काले रंग का एप्रन बांधा हुआ था। उसे इसी महल में चालीस साल बीत गये थे। वह नववधु के रूप में यहां आयी थी। उस समय वह बाइस वर्ष की और अट्ठाइस साल का उसका पति था।


जब वह दोनों महल आये थे तो उनकी शादी को दो महीने ही हुए थे। लेकिन यहां नौकरी पर आने के तीसरे ही दिन रात में अजीब से हाथों ने उसके पति का गला दबाकर उसकी जान ले ली थी। इस प्रकार वह नवयौवना शादी के दो माह में ही विधवा बन गयी थी। इस घटना के बाद सबने उसे महल छोड़ने का सुझाव दिया था। लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी और यहीं पर आज तक अपने पति की याद में जीवन बिताती आयी है।


केबिन ने जब इस महल को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी तो उसके स्वामी मि० कंट्रोल ने स्पष्ट कर दिया था कि वह बूढ़ी नौकरानी सदा इसी भवन में रहेगी। उसे महल से बाहर करने का प्रयास न किया जाये।


बूढ़ी के साथ केबिन परिवार इस कुख्यात महल के भीतर प्रविष्ट हुआ तथा दूर तक फैला बरामदा पार कर एक बड़े हाल में दाखिल हो गया। इस हाल की दीवारें काले रंग की थीं। जिन्हें तारकोल से पोता गया था।


इस हाल का वातावरण कुछ विचित्र सा था। बल्कि एक अन्जाना भय मन में भरने लगा। खौफ को जज्ब करने के लिए केबिन की पुत्री ने तो कुछ पल के लिए आंखें ही बंद कर लीं। हॉल से होते हुए यह सब लोग लाइब्रेरी रूम में आ गये। यहां पर जाने कितना पुराना एक बड़ा आइना टंगा था। इस आदमकद आइने पर मकड़ियों ने जाले बना डाले थे और यह इतना फीका पड़ चुका था कि बिल्कुल वहीं खड़े होने पर भी शक्ल ठीक से नहीं दिख पा रही थी।


लाइब्रेरी रूम के बीच में रखी एक मेज पर चाय की केतली व कुछ प्याले रखे थे। केतली से गर्म चाय की भाप उठ रही थी। मेज के इर्द-गिर्द रखीं कुर्सियां भी अपनी रंगत गंवा चुकी थीं। सफर से सब थक चुके थे। अतः कुर्सियों पर बैठ गये। केबिन ने केतली उठाकर प्यालों में चाय डालनी शुरू की, तभी उनकी निगाह आतिशदान पर पड़ी तो वह चौंक गये। क्योंकि वहां पर एक बड़ा सा खून का धब्बा दिख रहा था। यह काफी पुराना होते हुए भी फीका नहीं पड़ा था और ताजा ही दिख रहा था। उन्होंने नौकरानी को इस पर टोका।


वह बोली-“यह धब्बा तो यहां पर सैंकड़ों साल से है। यह आज तक किसी के मिटाने से भी नहीं हट सका।"


केबिन कुछ परेशान सा दिखा। हैरान भाव से बोला-“भला क्यों नहीं मिटा? मैं तो खैर खून का धब्बा बिल्कुल नहीं देख सकता..."


“सन् 1575 में इस महल के स्वामी सेमन डी कंट्रोल ने यहीं अपनी पत्नी लेडी एलनेजर की हत्या की थी। यह धब्बा तभी से यहां है। काफी कोशिश के बाद भी साफ नहीं किया जा सका है। उस हत्या के बाद सेमन नौ साल तक यहां रहे थे। फिर एक दिन वह ऐसे गायब हुए कि उनका कुछ पता न चला। लोगों का अनुमान है कि एलनेजर की आत्मा ने उनकी जान ले ली थी और वह भूत बन गये तथा उसी समय से महल में भटक रहे हैं। अपना हो या पराया, उन्हें किसी का भी यहां पर रहना नहीं सुहाता है।


यह खून का धब्बा सब के आश्चर्य का केन्द्र है। इसे देखने के लिए यहां पर्यटक भी आते रहते हैं। हजारों लोगों के इसे मिटाने के प्रयास विफल ही रहे।


"लेकिन मैं इसे हटा सकता हूं। मेरे पास ऐसे कैमिकल हैं, जो इसे एकदम मिटाकर गायब कर देंगे।" केबिन के बेटे ने जोश के साथ यकीन दिलाया और अपने सामान में से एक शीशी निकालकर उसमें भरे कैमिकल को धब्बे पर डालने लगा।


किसी अनजानी आफत से आशंकित बुढ़िया का डर से चेहरा फक्क पड़ गया। उसने खुशामद करते हुए उस युवक को समझाने और रोकने का प्रयास किया। लेकिन वह नहीं माना और एक छोटे ब्रश से उस स्थान पर कैमिकल रगड़ने लगा। कुछ मिनट में वह धब्बा साफ हो भी गया।


"देखा मिट गया न! मैं पहले ही कहता था कि यह सब वहम..." खुशी से उछलकर अपनी सफलता बयान करता केबिन का बेटा रोलैंड अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि वह जोर से उछला और धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही जोरदार आवाज के साथ बिजली सी कड़की। भयानक आवाज के साथ बहुत तेज रोशनी से कुछ पलों के लिए कमरा नहा उठा और रोलैंड के साथ केबिन, मिसेज केबिन और उनकी बेटी कालरा भी उछलकर नीचे जा पड़े थे।


बूढ़ी नौकरानी भय के मारे चिल्लाती हुई वहां से बाहर भाग निकली। केबिन सम्भल कर उठा और सबको सम्भालने की कोशिश की। फिर बाहर जाकर देखा तो नौकरानी बेहोश औंधे मुंह पड़ी थी। भयानक आंधी के साथ घटाघोप अंधेरा हो चुका था और झमाझम बारिश शुरू हो चकी थी।


बूढ़ी औरत को उठाकर अन्दर लाने के बाद केबिन पानी के छींटों से उसे होश में लाने में सफल हुआ। और समझाने का प्रयास किया-“आत्मा वगैरह कुछ नहीं होती है। डरो मत। यह तो मात्र संयोग समझो कि खून के धब्बे को मिटाते ही तूफान आ गया। कुछ देर में शांत हो जायेगा। डरो मत... ।"

 बुढ़िया गुस्से से चिल्लाई-“क्या जरूरत थी वह धब्बा मिटाने की? संयोग की बात करते हो? जब तुम आये तो सब ठीकठाक था...और फिर एकदम यह सब बस संयोग ही है?" कहती हुई वह उठी और पैर पटकती हुई सी अपने कमरे में चली गयी। 


पूरी रात ऐसे ही आंधी-बारिश के बीच गुजरी। सुबह शांति होने पर बुढ़िया नाश्ता बनाकर लायी और टेबल पर लगा दिया। सब नाश्ते की मेज पर आ बैठे। लेकिन उसी समय केबिन की नजर धब्बे वाले स्थान पर गयी तो वह हड़बड़ा गया। क्योंकि वहां अब पहले से भी बड़े आकार का ताजा खून का धब्बा बन गया था। रोलैंड की निगाहें भी उस स्थान पर जमकर रह गयीं।


केबिन के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें उभरीं। किन्तु वह आश्वस्त दिखने की कोशिश करने लगा। वह शांत बैठा रहा। कालरा ताज्जुब में डूब कर धब्बे को देख रही थी। रोलैंड एकदम उठा और उसने ब्रश व कैमिकल से फिर उस धब्बे को साफ कर डाला। बूढ़ी नौकरानी फिर किसी अज्ञात भय के कारण कांपने लगी।


अब की बार न तूफान आया, न बारिश और न बिजली ही कड़की। सघन चुप्पी व्याप्त थी। रोलैंड प्रसन्नता के साथ कूद पड़ा और अहं भरे अंदाज में नारा लगाया-“तीन सौ साल से लोगों को परेशान करने वाला यह निशान आज साफ हो गया है! इसे मैंने मिटा दिया है।" कालरा भी अपने भाई के सुर में सुर मिलाकर उसकी प्रशंसा में बोलने ही वाली थी कि वह कुर्सी से इस प्रकार गिर पड़ी, जैसे किसी ने उठा कर पटक दिया हो। उसका माथा धरती में लगा और फूट कर खून बहना प्रारम्भ हो गया।


जल्दी से उठकर केबिन ने बेटी को सम्भाला और उसका खून पौंछने को रूमाल निकाला ही था कि पत्थर जैसे दिखने वाले दो हाथ हवा में लहराने लगे। यह किसी कंकाल के हाथ थे, जो इस प्रकार उधर बढ़े मानो केबिन का गला दबाना चाहते हों।


तभी साहस करके रोलैंड ने एक कुर्सी उठाकर कंकाल के हाथों पर दे मारी। जिससे कुर्सी टकराते ही हाथों से हड्डियों के खड़खड़ की आवाज हुई और झटका खाये हाथ एक भयानक हंसी के साथ गायब हो गये। यदि रोलैंड जरा भी देर कर देता तो केबिन का गला दब गया होता।


केबिन ने तुरन्त सबको वहां से बाहर निकाल दिया और कमरे में ताला लगा दिया। इसके बाद दिन भर सब सामान्य बना रहा। रात होने पर खा-पीकर सब सो गये। लेकिन एक बजते ही जो कुछ हुआ, उससे लगभग सब की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। क्योंकि एक भयानक आवाज से पहले तो सब जाग गये। अचानक बरामदे में मानो असंख्य घंटियां घनघनाने लगी और फिर उनकी आवाज ऐसे तेज होती चली गयी मानो भारी घंटे कानफोड़ शोर कर रहे हों।


केबिन बहुत साहसी था। फिर भी उसके दिल की धड़कनें असामान्य गति से चलने लगीं। हर धड़कन जैसे सीना फाड़ने को तैयार हो गयी। उसने एकदम उठकर दरवाजे की झिरी से बाहर का जायजा लेना चाहा, किन्तु विफल रहा। अचानक केबिन को पत्नी, कालरा और रोलैंड का ख्याल आया। उसने एकदम दरवाजा खोल डाला। लेकिन सामने उसे जो दिखा, उससे वह हक्का-बक्का रह गया। क्योंकि वहां एक कमजोर सा दिखने वाला कंकाल खड़ा था। उसकी खाली खोपड़ी और गायब नाक भयानक दिख रही थीं और अंगारे सी जलती आंखें मानो उसे भस्म कर डालने को उतावली थीं।


तभी कंकाल के दोनों हाथ उठे तो उसे नाश्ते के समय दिखे दो पत्थर जैसे हाथ ध्यान आ गये, जो उसका गला दबाना चाहते थे। केबिन को लगा कि उसका शरीर बेजान होता जा रहा है। उसी समय लार्ड कंट्रोल के सामने महल खरीदते समय बोले गये अपने विश्वास भरे शब्द केबिन को याद आ गये। उसने कहा था- "भूत-प्रेत सब मन का वहम है। ना मैं इन पर यकीन करता हूं और न इनसे डरता हूं।' उसने हौसला कायम रखते हुए सामने खड़े कंकाल से कहा- "तुम्हारी आयु बहुत ज्यादा हो गयी है। बुढ़ापे में इन्सान हो अथवा भूत, सभी की ताकत घटती है। अगर मैंने सही जाना है तुम तो वैसे भी तीन सौ साल के बूढ़े हो। महल खरीदते समय जब मुझे तुम्हारे बारे में बताया गया, मैं तभी जान गया था कि तुम बूढ़े और कमजोर होगे, वही बात देख भी रहा हूं। मैंने तुम्हारी सेहत के लिए एक दवाई मंगवाई थी। वह किसी को भी सुदृढ़ और शक्तिशाली बना देती है। लो, तुम भी इसकी मालिश करके मजबूत हो जाओ। मैं तुम्हें यह दवा गिफ्ट कर रहा हूं। यहां कोई भी कमजोर होकर रहे, मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"


यह कहते हुए केबिन ने कैंडल स्टैंड के पास रखी एक बॉटल उठाकर बाहर फर्श पर दे दी। भूत की अंगारे बरसाती आंखें उसकी निडरता पर क्रोध से और दहक उठीं। वह केबिन और रोलैंड के दुस्साहस पर आश्चर्यचकित था। केबिन ने मुसकराकर उसे देखा और दरवाजा बंद करता बोला-'यह दवा काफी प्रभावशाली है...और कहोगे तो लंदन से आ जायेगी।"


“अजीब आदमी है!" भूत परेशान हो उठा। आज तक ऐसा बर्ताव करने वाला दूसरा कोई नहीं आया था। तीन सौ साल में यह पहला मौका था। गुस्से से कसमसा उठा कंकाल व आंखें मानो अंगारे उगलने को तैयार थीं। क्रोध से पागल कंकाल ने शीशी उठाकर नीचे पटक दी। अंदर केबिन मजे में लिहाफ ओढ़े लेटा था।


कंकाल के हाथ बड़े खतरनाक अन्दाज में दरवाजे की ओर बढ़े। शायद उस का इरादा एक झटके में दरवाजा उखाड़ फेंकने का था। और फिर वह केबिन की गर्दन फाड़ कर उसका खून पीना चाहता था। किन्तु यह क्या? कंकाल जहां का तहां चिपक कर रह गया। उसके हाथ भी उठे के उठे रह गये। शायद किसी अनजानी शक्ति ने उसके इरादों को ब्रेक लगा दिया।


वह गुस्से में किसी भेड़िये की तरह गुर्रा रहा था। जब आगे नहीं बढ़ पाया तो वह पीछे हट गया। बदले की आग में सुलगता वह जैसे मजबूर हो गया हो। वह एकदम बंदर की तरह उछला और छत पर जा पहुंचा। वह जोरों से हाहाकार करने लगा। उसकी चीत्कार से सारा महल गूंज रहा था। बूढ़ी नौकरानी लेटी प्रभु को याद कर रही थी। वह बहुत डर गयी थी। केबिन का परिवार आश्चर्यचकित था और मन में शंकित भी कि अब जाने क्या होगा?


अपमान से जला-फुका कंकाल महल की छत पर खड़ा जैसे कोई निश्चय कर रहा था। अभी तक वह महल में आने वाले सौ के लगभग इन्सानों को मौत के घाट उतार चुका था। आज तक यहां उसने किसी को भी बसने नहीं दिया था। लेकिन यहां के नये मालिक उससे भयभीत होने के स्थान पर उसका उपहास कर रहे थे।


क्रोध की अग्नि में फुका जा रहा वह कंकाल, बेचैनी से तरह-तरह के पोज बना रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे कौन उसके इरादों से रोक रहा है। वरना वह तो इस सारे महल को खाक कर डालता। वह सोच में डूबा हुआ था कि आखिर इस शख्स की मददगार शक्ति कौन है?


केबिन प्रातः दरवाजा खोलकर बाहर निकला तो उनींदी सी नौकरानी उनकी प्रतीक्षा में थी। आंखें बेनूर और चेहरा फक पड़ रहा था। उसने आदेश दिया कि नौकरानी टेबल पर नाश्ता लगा दे। यह देखकर उसका दिमाग चकरा गया कि वह खून का धब्बा आज भी अपनी जगह है। बल्कि पहले से ज्यादा चमकदार भी है।


नाश्ते की टेबल पर वे सब रात की बात पर आपस में चर्चा कर रहे थे। केबिन व लारेंस परस्पर बात करते हुए खिलखिला रहे थे और कंकाल की मजाक भी उड़ा रहे थे। मिसेज केबिन भी कभी-कभी उनके वार्तालाप में हां हूं कर रही थी। इसी प्रकार एक सप्ताह और बीत गया। वह प्रतिदिन खून के धब्बे को साफ करते थे। किंतु प्रातः ताला खोलते तो खून का धब्बा फिर वहीं पर मिलता था।


वह सामान्य हो चले थे कि रविवार रात को एक विचित्र वारदात ने सबको हिलाकर रख दिया। मोमबत्ती के प्रकाश में केबिन बाईबिल पढ़ रहा था। रात के ग्यारह बजे का समय था। तभी हाल एक भयंकर धमाके से हिल सा गया। यह किसी भारी चीज के टूट कर गिरने से होने वाली आवाज थी। विस्फोट जैसी आवाज सुनकर रोलैंड, मिसेज केबिन और कालरा भी वहां दौड़े आये। सब हाल में जा पहुंचे। वहां पर एक भयानक और हैरतअंगेज दृश्य दिखाई दिया।


वहा फर्श पर हैंगर से फौजी वर्दी और पुराना फौजी हैलमेट नीचे गिरे पड़े थे। बिलकुल सामने कुर्सी पर हड्डी का ढांचा वही कंकाल विराजमान था। वह बैठा हुआ इस प्रकार कसमसा रहा था, जैसे वह चाहकर भी कुछ न कर पाने के कारण परेशान हो। गुस्साये कंकाल को कुर्सी पर बैठे देखकर केबिन और उसके परिजन अनायास ही जहां के तहां रुक गये। किंतु गुस्से से भभकते कंकाल के मुंह से अचानक झुलसाने वाली भाप सी निकलनी प्रारम्भ हुई तो केबिन ने भी रिवाल्वर जेब से निकाल लिया और उस पर तान दिया। उसी समय फिर एक विस्फोट सा हुआ और भयानक बिजली की चमक से कमरा रोशनी से भर उठा। उसके बाद फिर सब तरफ अंधेरा फैल गया। कंकाल एक झटके से भड़क कर उठा और गायब हो गया।


केबिन ने आश्चर्य से रिवाल्वर की तरफ देखा। उसने फायर तो किया ही नहीं था। फिर यह आवाज कैसी थी? उसने सोचा। लगता है कि वह तेज रोशनी और विस्फोट की आवाज भूत के क्रोध को दर्शा रहे थे। लेकिन पूरे परिवार के सभी सदस्यों को एक बात जरूर सोचने पर विवश कर रही थी कि उनसे पहले यह भूत जाने कितनों की जान ले चुका था। लेकिन उन सबके आगे बेबस सा नजर आता था। आखिर क्यों?


उधर भूत भी नहीं समझ पा रहा था कि यह क्या हो रहा है? इनमें से कोई भी मुझ से डर नहीं रहा है बल्कि मेरा सामना करते हैं और समय-समय पर मजाक उड़ाते हैं, वह अलग। यदि मैं इन्हें नुकसान पहुंचाने की सोचता हूं तो जाने कौन सी वह शक्ति है जो मेरे पांव रोक लेती है। इनके सामने मेरी सारी ताकत कमजोर पड़ जाती है


इस महल के दक्षिणी हिस्से में जहां ऊंचे पेड़ों का घना झुरमुट था, जिसके बीच एक छिपा कमरा था। इस तरफ शायद भूले से भी किसी का ध्यान नहीं गया होगा। इसी में भूत ने अपना ठिकाना बनाया हुआ था। वैसे बूढ़ी नौकरानी को इस बात का पता था। किन्तु महल के नये मालिकों के हौसले और भूत की बेचैनी देखते हुए उसने केबिन परिवार को उसका ठिकाना नहीं बताया था। वह समझ चुकी थी कि पता लगने पर यह परिवार ऐसा था जो भूत को उसके कमरे में भी जाकर छेड़ने से शायद न चूकता। इससे हो सकता था कि भूत और भड़क जाता। जिससे सब की जान खतरे में आ सकती थी।


एक दिन मिसेज केबिन जान ही गयीं कि भूत किस कमरे में रहता है। वह अगले दिन प्रातः ही उठीं और एक शीशी हाथ में लेकर बाग पार करती हुई वहीं जा पहुंची। भूत इस समय आराम कर रहा था। वैसे भी दिन में ऐसी शक्तियों की ताकत घट जाती है। इसलिए वह किसी के सामने आने से परहेज करती हैं।


खूबसूरत गुलाबी परिधान में सजी मिसेज केबिन के चेहरे पर इस समय एक दृढ़ निश्चय झलक रहा था। उन्होंने आगे बढ़ कर धीरे से कमरे का दरवाजा खोल दिया। भूत ने जैसे ही मिसेज केबिन को सामने पाया तो वह इस बात पर मानो विश्वास न कर पाया। उसे आश्चर्य हुआ। वह अभी कुछ कहने की वाला था कि तभी मिसेज केबिन ने हाथ में पकड़ी शीशी दरवाजे के अन्दर रखते हुए कहा-“मुझे लगता है कि आप बीमार हैं...मैं कतई भी यह स्थिति सहन नहीं कर सकूँगी कि इस महल में निवास करने वाला कोई भी प्राणी बीमार हो और दवा भी न ले सके। इस दवा का प्रभाव बहुत असरकारी है। आप यह दवा पीकर देखें और फिर अनुभव करें कि आप कैसे चाक-चौबंद नजर आते हैं...।"


इसके बाद किसी उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना मिसेज केबिन ने उस कमरे का दरवाजा पहले की तरह ही बंद कर दिया और धीरे-धीरे चलती हुई महल में वापस पहुंच गयी।


भूत झुंझलाकर उठा और शीशी को लेकर उसने बाहर उछाल दिया। वह चाह कर भी इस परिवार का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा था। यह परिवार था कि उससे डरने का तो सवाल ही नहीं, बल्कि उस पर अहसान चढ़ाने पर तुला था। यह सरासर उसका अपमान ही हो रहा था। उसे लगने लगा था कि वह दुनियां का सबसे कमजोर वजूद है। लेकिन कुछ सोच कर उसने हार न मानने का निर्णय लिया। वह इस महल को वीरान ही रखेगा। इस इच्छा की पूर्ति के लिए वह महल के नये स्वामी परिवार को मिटा देगा।


शाम का समय हो रहा था। अपनी सोच को क्रियान्वित करने के लिए कंकाल चला तो बाहर तेज बारिश हो रही थी। उसके शरीर पर जगह-जगह चमचमाते खंजर लटके थे। सिर पर हैट की भांति दरियाई घोड़े का सिर रखा हुआ था। जिससे वह बहुत भयानक दिखाई दे रहा था।


हवाओं के तेज झकोरों के साथ पड़ती बारिश का पानी से धरती पर पानी बह रहा था। वातावरण में सांय सांय से बहुत भयावनापन अनुभव हो रहा था। 

भूत ने निश्चय किया कि रक्त का निशान हर दिन रोलैंड ही मिटाता है। वही मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है। अतः जैसे ही सब लोग सोने जायेंगे, मैं हमला करके रोलैंड को मार डालूंगा और बारिश के शोर में किसी को पता भी न चलेगा।


रोलैंड के मरने से जब ये लोग दुखी होकर चिल्लायेंगे-रोयेंगे तो कुछ दिन उसका आनन्द लूंगा। फिर एक दिन केबिन और उसकी पत्नी का नम्बर आयेगा। मिसेज केबिन को दबोचकर उसके सीने पर बैठकर एक हाथ से उसका गला दबाऊंगा और दूसरे से केबिन के गले में खंजर घोंपकर उसे मार डालूंगा। रही कालरा तो उसे मैं कुछ नहीं कहूंगा। क्योंकि न उसने मुझे छेड़ने का प्रयास किया और न मेरा उपहास उड़ाया। उसके लिए तो यही पर्याप्त होगा कि या तो वह यहां से स्वयं चली जायेगी अथवा उसे जबरन यहां से निकाल दिया जायेगा।


आधी रात में बारिश और भी तेज हो चुकी थी। वृक्षों के झुरमुट के बीच से गुजरती हवाओं की सरसराहट से वातावरण और भी भयावना बनता जा रहा था। हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा पसरा था। लेकिन सब तरफ से बेपरवाह केबिन और उसका परिवार सोये पड़े थे।


उन सबको सपनों में भी गुमान न था कि उनसे बदला लेने के लिए कंकाल ने आज क्या करने का निर्णय लिया है। आज वह और दिनों से कहीं अधिक भयानक लग रहा था। उसकी चमकती आंखों से अंगारे बरस रहे थे। एक बजे के लगभग उसने अपना ठिकाना छोड़ दिया और उन सबके शयनकक्ष के बरामदे में आ पहुंचा।


पहले तो यह किसी न किसी प्रकार की भयानक आवाज अथवा धुंघरुओं की छमाछम के साथ महल में चहल कदमी करता था। लेकिन आज वह बहुत सावधानी के साथ खामोशी से उड़ता हुआ भ्रमण कर वहां का जायजा ले रहा था। उसे भय था कि इनमें से यदि कोई जाग गया तो उनकी मदद कर रही अज्ञात शै उसको दबोच लेगी और उसका प्लान विफल हो जायेगा।


सावधानी से वह रोलैंड के कमरे के बाहर पहुंचा और जलती आंखें दरवाजे पर डाली तो वह सन्न रह गया। क्योंकि वहां उससे भी विशाल और भयावना कंकाल खड़ा उसे घूर रहा था। वह तो आंखों से ही अंगारे दिखाता था, किन्तु यह नया भूत जाने कैसा था कि आंख और मुंह से भी भयानक लपटें दिख रही थीं। वैसे तो यह मात्र हड्डियों का ढांचा ही दिख रहा था, लेकिन वैसे उससे ज्यादा बड़ा था।


इस नये भूत से सामना होते ही पहले तो उसने स्वयं को छुपाना चाहा, लेकिन फिर सोचा कि कहीं वह उस पर आक्रमण न कर दे, इस भय से वह रुका। लेकिन फिर उलटे पांव अपने ठिकाने पर चला आया। वह चला तो आया, किन्तु यह बात उसकी समझ से परे थी की तीन सौ साल में यह पहला अवसर है. जब यहां उसके अलावा भी काई भूत जाने कहां से आ गया है और अघोषित रूप से उनके साथ युद्ध भी छेड़े हुए है। 

असमजस की दशा में उसकी सारी रात ऐसे ही बीत गयी। आखिर उसने तय कर लिया किया वह इस नए भूत से  सामना होने पर बात करेगा और उसे अपना मित्र बनाने का प्रयास करेगा फिर उसकी सहायता में महल के नए मालिक को भगा देगा या मौत के घाट उतार देगा। 


प्रातः की हल्की रोशनी फैलने लगी थी। बारिश भी धीमी हो गयी थी। कंकाल सावधानी से उठा और अपने ठिकाने से उसने उड़ना प्रारंभ किया। यहां का चप्पा-चप्पा उसका पहचाना हुआ था। वह तैरता हुआ सा अपने को छुपाये महल के कोने-कोने में उस नये भूत को ढूंढने लगा। पता नहीं कि वह नया भूत कहां पर रहता है? तभी उसने देखा कि नया भूत बरामदे में ही है। लेकिन उसकी यह क्या हालत हो रही थी? रात तो उसकी आंखों और मुंह से आग निकल रही थी, और इस समय वह बिलकुल निर्जीव सा था। हाथ बेजान लटके थे। आंख या मुंह में चमक भी न थी। वह मुर्दा सा दीवार के सहारे खड़ा हुआ था।


डरता-डरता कंकाल उसके पास गया। उसने छूकर देखा तो नये भूत का सिर एक तरफ लुढ़क गया। उसके गले में एक दफ्ती टंगी थी-उस पर लिखा था "महल में सब फर्जी है, धोखा है, मैं केबिन का भूत हूं।"


यह शरारत केबिन की थी। नया भूत उसी की कल्पना का नतीजा थी। उसने एक पुतला बनाकर उसके मुंह और आंखों के स्थान पर मोमबत्तियां रख दी थीं। इसे बनाने में केबिन ने घर के बेकार सामान का सावधानी से प्रयोग किया था। उसकी बदमाशी से भूत जल-भुन गया।


भूत को अन्दाज हो गया कि यह परिवार निडर तो है ही, बुद्धिमान भी है। ऐसे लोगों को डराना या किसी प्रकार की क्षति पहुंचाना संभव नहीं है।


भारी मन के साथ कंकाल वापस अपने ठिकाने पर जा पहुंचा। वह अपने को हताश व टूटा हुआ मान रहा था। अपना वजूद उसे बड़ा कमजोर लगा। उसने निर्णय कर लिया कि फिलहाल वह इस परिवार से दूरी ही बनाये रखेगा। शांत रहेगा।


उस दिन के बाद एक हफ्ते तक वह उसी कमरे में बंद रहा। वह खून का धब्बा लगाने के लिए लाइब्रेरी कक्ष में भी नहीं गया। प्रत्येक रात्रि वह महल में घूमने जाता। बरामदे में भी पहुंचता। लेकिन बिना कोई आवाज या अन्य हरकत प्रदर्शित किये। अपना शरीर दिखने न देने के लिए उसने एक काला चोंगा भी पहन लिया था। जिससे यदि कोई आस-पास आ भी जाये तो वह दिख न सके।


एक माह हो चुका था। उसकी हर कोशिश बेकार गयी। केबिन और रोलैंड उससे भय तो क्या खाते, उल्टे उन्होंने हर बार उसे हारने पर मजबूर किया था। इसलिए उसने अब खामोशी धारण कर ली थी।


कर उसके सामने अतीत साकार सा होने लगा। फिर वह सोने लगा। महल में केबिन के दो नये मेहमान आये हुए थे। उनकी बातचीत से कंकाल को पता लगा कि किसी ने उन्हें उसे ही यहां से भगाने के लिए भेजा है। बरसों पहले भी ऐसे ही दो लोग उसे भगाने यहां आये थे, लेकिन एक तो उसे देखते ही पागल हो गया था और दूसरा उसके सामने पड़ते ही यहां से ऐसा भागा था कि उसका पता ही नहीं चला। जबकि पागल ने इसी इलाके में भटककर जान गंवा दी थी।


भूत ने इन नये मेहमानों की खबर लेने का भी फैसला किया और अपने को और ज्यादा भयानक बनाकर एक हाथ में खंजर और दूसरे हाथ में एक बड़ी मोमबत्ती सम्भाले वह आधी रात को उनके कमरे में जा पहुंचा। अभी वह उन दोनों को डराने के लिए कुछ सोच ही रहा था कि हॉल के पूरब का दरवाजा खुला, जहां से रोलैंड अन्दर घुसा। उसे देखते ही भूत का मनोबल जवाब दे गया और वह छत में बने रोशनदान से भाग निकला।


इसके बाद उसने ऐसी चुप्पी साधी कि पूरे एक साल तक महल में किसी ने उसको नहीं देखा। एक दिन कालरा महल के आस-पास टहल रही थी। इसी दौरान वह दक्षिणी हिस्से के पेड़ों के झुरमुट के पास पहुंच गयी, जहां पर भूत का निवास था।


यह सायंकाल का समय था। मंद गति से ठंडी हवा बह रही थी। तभी वृक्षों की ओर से कोयल का स्वर सुनायी दिया। कालरा कोयल देखने के लिए वहां तक जा पहुंची और पेड़ों के बीच चली गयी। लेकिन उनके बीच में बना एक वीरान व जीर्ण-शीर्ण दशा का कमरा देख वह आश्चर्य में पड़ गयी। उन्हें यहां आये एक साल से ज्यादा हो गया था। लेकिन इधर की तरफ कभी ध्यान ही नहीं गया था।


कालरा आगे बढ़ी और धीरे से कमरे का दरवाजा अन्दर की तरफ धकेला तो वह खुल गया। वहां उसे नीचे जातीं सीढ़ियां भी दिखीं। यह शायद नीचे तहखाने में जा रही थीं। कभी बहुत पुराने समय में शायद यह सीढ़ियां लकड़ी से बनायी गयी थीं। पहले तो कालरा कुछ हिचकी, लेकिन फिर उत्सुकता में वह सीढ़ियों पर उतरने लगी। जहां सीढ़ियां जाकर खत्म हुईं, वहां पर भी दरवाजा था।


कालरा ने उस दरवाजे को भी खोल डाला। वह अचानक चौंक गयी। क्योंकि सामने वही बूढ़ा कंकाल सिर नीचा किये बैठा था। उसका सिर घुटनों पर रखे दोनों हाथों पर टिका हुआ था। दरवाजा खुलने से हुई रोशनी से चौंकन्ना होकर उसने सीधा होते हुए देखा कि सामने भोली-भाली कालरा खड़ी अपनी नीली आंखों से उसे निहार रही थी।


जब तक वह कुछ बोल पाता कि कालरा उसे न उठने का संकेत करते हुए उसके समीप आकर घुटनों के बल बैठती हुई हमदर्दी से बोली-“तुम बहुत दुखी और अशक्त दिख रहे हो। हमारे बर्ताव से तुम्हें कष्ट हुआ हो तो मैं खेद व्यक्त करती हूं..." कालरा के अन्दाज में भय का नामो-निशान न था। हां, हमदर्दी अवश्य थी।


भूत उसके साहस और हमदर्दी से विचित्र स्थिति में फंसा महसूस करने लगा। फिर भी क्रोध दर्शाते हुए उसने कहा-“यह सही है कि तुमने मुझे परेशान किया है। लेकिन अभी कुछ दिन विश्राम करके मैं तुम सबसे बदला अवश्य लूंगा..." कोमल भाव से कालरा ने उसे समझाना चाहा-“तुम भी तो एक क्रूर इन्सान रहे हो। तुमने अपनी पत्नी का भी मर्डर कर दिया था।"


"तुमसे क्या मतलब है? वह मेरा निजी मामला था।" भूत पहले तो गरज उठा, लेकिन कालरा का भोलापन देख शांत होकर बोला- ''मेरी पत्नी अवल दर्जे की बद्तमीज और अक्खड़ स्वभाव की औरत थी। लेकिन जब उसकी दुष्चरित्रता का मुझे पता लगा तो मैंने उसे खत्म कर दिया।"


"अब क्यों बेचैन फिरते हो?"


"पत्नी की हत्या के बाद मेरे जीवन का कोई उद्देश्य तो रहा नहीं था। वैसे भी प्रत्येक स्त्री-पुरुष से मैं घृणा करने लगा था। सभी स्त्री-पुरुषों से मैंने बदला लेने का फैसला कर लिया था। फिर ग्लानिवश मैंने आत्महत्या कर ली। किंतु मेरी मुक्ति नहीं हो पायी और मैं भूत योनि में आ गया। भले ही मैं भूत बन गया हूं, लेकिन फिर भी उम्र तो अपनी जगह है। मैं बूढ़ा भी हो चुका हूं और इस जीवन से उकता गया हूं। इस हड्डियों के ढांचे को लादे हुए मैं परेशान हो गया हूं। खाना-पीना, सोना कुछ भी तो मेरे लिए सम्भव नहीं है।


अब तो मैं शांति चाहता हूं और शांति मेरी मुक्ति से ही सम्भव है। तुम्हारी लाइब्रेरी के दरवाजे पर लगी एक पट्टी पर वह राज लिखा है, जिससे मेरी मुक्ति सम्भव है। क्या तुमने उसे पढ़ा नहीं है...?" भूत के स्वर में जमाने भर का दर्द छुपा था।


"नहीं, मैंने तो उसे नहीं पढ़ा। वैसे भी उस पर सदियों का मैल चढ़ा हुआ है। अच्छा होगा कि तुम ही बता दो।"


भूत ने कहा-“उस पर मेरी मुक्ति का उपाय लिखा है। जिसके अनुसार एक सुनहरे केशों वाली, आकर्षक नीली आंखों वाली भोली युवती इस महल में तीन सदी बाद आयेगी, जो साहस और प्यार की अनूठी प्रतीक होगी। उसके आने के बाद इस वीरान महल का वीराना दूर होता जायेगा। यहां के सूखे वृक्ष नये पत्तों से सज उठेंगे। वह भोली युवती अपनी बातों से सब को प्रसन्न करेगी और महल में शांत वातावरण का सृजन होगा।"


"मैं महल में तुम सबको मारने जाता था क्योंकि यह मुझे किसी का रहना पसन्द नहीं। मैंने कभी तुम पर गौर नहीं किया। लेकिन अभी देखा है कि वह खूबसूरत युवती तुम ही हो। इसीलिए मैं जब भी तुम सब को मारने गया, मेरी सब शक्तियां दगा दे गयीं।"


भूत रोने लगा, उसकी आंखों से पानी बह निकला । तीन शताब्दी से अंगारे बरसाती आयीं उसकी आंखें शांत थीं। कालरा को उस पर और भी तरस आ रहा था। भूत उसके पैरों पर गिरकर गिड़गिड़ाने लगा- “मुझे मुक्ति प्रदान करो। प्रभु से मेरे लिए प्रार्थना करो। मैं इस जीवन से तंग हो चुका हूं। मैं मुक्ति का इच्छुक हूं। तुमने ठीक ही कहा है, मैं वास्तव में बहुत निर्दयी हूं। ईश्वर के बनाये मानवों पर मैंने बहुत अत्याचार किये हैं। उसका कठोर दंड भी मुझे निरुद्देश्य भटकने के रूप में मिल रहा है...।" भूत रो-रोकर पश्चाताप कर रहा था।


"जब मैंने एक मासूम बालक तक को मार डाला, वह भयानक रात मुझे आज तक याद है। वह एक नन्हां बालक था। वह खौफ भरी एक अंधियारी रात थी। डरावनी काली घटायें और भयानक बारिश के साथ तेज आंधी ने हालत खराब कर रखी थी। सर्दी भी हड्डियों तक को कंपाये दे रही थी। इसी महल के बड़े हाल में मैं एक कालगर्ल के साथ शराब में डूबा अय्याशी कर रहा था। मुझे बड़ा आनन्द मिल रहा था। शराब और शबाव का साथ और रंगीन मौसम। उस समय मेरे जैसे वहशी के लिए वह जन्नत का माहौल था। लेकिन ऐसे में खलल ने मुझे गुस्से से पागल बना दिया।


पड़ोसी का एक छोटा बच्चा जाने कैसे उसी वक्त माचिस मांगने आ गया। मुझे अपने मजे में खलल पड़ना अच्छा नहीं लगा और अनायास ही मेरे अन्दर जागे शैतान ने उस मासूम बालक को उठाकर पटक दिया...और एक चीख के साथ वह बच्चा वहीं मर गया। मेरा वह रूप देखकर मेरी रात की वह साथी डर के मारे जैसी लेटी थी, वैसी ही उठकर वहां से निकल भागी। मैंने आवाज देकर उसे रोकना चाहा। लेकिन उस पर डर सवार हो गया था और वह नहीं रुकी। तब मैं भी उसके पीछे दौड़ पड़ा...।" भूत का स्वर पश्चाताप से भारी हो रहा था


"महल के खुले दरवाजे से वह बाहर निकल गयी। मैं भी उसके पीछे था। बर्फ जैसी सर्द रात में मैं उसके पीछे दौड़ रहा था। वह सहायता के लिए चिल्ला रही थी। लेकिन आंधी-बारिश में कोई उसकी पुकार सुनने वाला न था। आखिर एक जगह ठोकर खाकर वह गिरी और मैंने वहीं उसे दबोच लिया। उसने मुझसे बचने को हाथ-पांव मारे। लेकिन वासना की आग में जलते हुए मैंने उससे आंधी-बारिश में सड़क पर ही अपनी तपिश बुझायी और फिर क्योंकि मेरा गुस्सा उसकी हरकत से और बढ़ गया था, इसलिए मैंने उसका गला दबा दिया। वह फड़फड़ा कर शांत हो गयी। वह मेरे जीवन के पहले कत्ल थे। इसके बाद मेरी शादी हो गयी और मैंने पत्नी को भी बेरहमी से मार डाला। मैं वास्तव में बड़ा निर्दयी हूं। मुझे जो सजा मिले...वह कम ही है।"


पश्चाताप की आग में जलते भूत के रोने का स्वर बड़ा अजीब और डरावना था। दया के बावजूद उससे कालरा भयभीत हो उठी तथा वापसी के लिए उठकर खड़ी हो गयी।


तभी भूत का स्वर गूंजा-“मत जाओ कालरा...प्लीज मत जाओ। इस नारकीय अस्तित्व से मुझे मुक्त कर दो...।" उसने लगभग हवा में तैर कर कालरा का रास्ता रोक लिया। उसने कालरा के दोनों हाथों को बड़ी खुशामद के साथ पकड़ लिया। कालरा वास्तव में घबरा गयी। उसके दिल से आवाज उभरी-भाग जा यहां से...चली जा कालरा...।'


किंतु उसके हाथ भूत के हाथों में थे और वह प्रार्थना के अंदाज में कुछ फुसफुसा रहा था। तभी कमरे में एक विचित्र और डरावना शोर सा होने लगा तथा सामने वाली दीवार दो हिस्सों में बंट गयी। भूत कालरा को लेकर उसके पार चला गया। दीवार फिर अपने स्थान पर पहले की तरह आ गयी।

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खाने का समय हो चला था। सब टेबल पर बैठ चुके थे। लेकिन अभी तक कालरा का कहीं पता न था। आखिर खाना सबने आधा-अधूरा छोड़ा, और पूरे महल में उसकी तलाश की गयी। लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिल सका। यहां तक कि पेड़ों के झुरमुटों में स्थित भूत का कमरा भी छान डाला गया। वहां पर सिवा सन्नाटे के कुछ भी न था।


केबिन ने अपने नौकरों के साथ कालरा की खोज में दूर तक का जंगल भी देख डाला। लेकिन सब बेकार । केबिन महल से सात मील दूर स्थित रेलवे स्टेशन भी गया। वहां के स्टेशन मास्टर से पूछा तो उसने भी किसी के वहां आने से इंकार किया। हार कर पुलिस स्टेशन को सूचित किया गया। अन्य सम्भावित स्थानों से भी पूछा गया। फिर भी कुछ हाथ न लगा।


सब परेशान थे कि आखिर कालरा गयी कहां? सबका ध्यान भूत की तरफ गया। वह भी एक साल से दिखाई नहीं दिया था। केबिन और रोलैंड मिलकर उसे बेचैनी से ढूंढ रहे थे। भूत का ध्यान आते ही दोनों व्याकुल हो गये। दोनों भूत का उपहास करते थे लेकिन आज वह रोने को हो रहे थे।


आधी रात होने पर कालरा की तलाश कल पर सोचकर वह सब अपने बिस्तरों में पहुंच गये। मिसेज केबिन बेटी की याद में रोने लगीं।


उसी समय केबिन के कमरे के बाहर जो घंटियां पहले दिन बजी थीं, वही आज भी बज  उठीं। लेकिन आज घंटियों की आवाज में मधुरता थी। हवा के तेज झौंके के साथ दरवाजा भी अपने आप खुलता चला गया। उन सबने देखा कि कालरा दरवाजे में खड़ी मुसकरा रही थी और उसके हाथों में एक खूबसूरत संदूकची भी थी, जिस पर लगे हीरे चमक रहे थे।


मिसेज केबिन एकदम उठीं और बेटी से जा लिपटीं। केबिन और रौलेंड भी उठ खड़े हुए। सबने एकदम उसके गायब होने का कारण पूछा तो उसने बताया कि इतने समय वह भूत के साथ थी।


सुनकर सब चौंक गये। केबिन ने साश्चर्य पूछा कि क्या वह भूत साल भर से यहीं था? हमने तो सोचा था कि वह यहां से भाग गया है।


"हां! वह यहीं था।" कालरा ने बताया-“वह तीन सौ साल से यहां पर उत्पात मचा रहा था। लेकिन अब भूत योनि से उसे मुक्ति मिल गयी है।


उसके हाथ में मौजूद राजघरानों सी मूल्यवान् संदूकची के बारे में उसने बताया कि यह भूत द्वारा उसे दिया गया उपहार है। संदूकची उसने मां को पकड़ा दी। खिलंदड़े रोलैंड ने उसे खोल डाला तो सबकी आंखें मानो चुंधिया गयीं। उसमें हीरे-जवाहरात ठसाठस भरे थे।


कालरा से जब अधिक पूछताछ का प्रयास किया गया तो उसने दृढ़ता से कह दिया कि वह इस विषय में और कुछ न बतायेगी। क्योंकि भूत ने उससे शपथ ले ली थी। यह जरूर है कि अब महल का अभिशाप खत्म हो गया है। भूत ने यह भी पूछा था कि हमारा वह कुछ बिगाड़ क्यों नहीं पाया...तो मैंने कहा कि हमारा आत्मबल और सबके लिए दया एवं प्यार इसका कारण रहा।


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