बेवफाई की जानलेवा कहानी: तंत्र विद्या | Bewafai Ki Jaanleva kahani




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Tantra Vidya New Hindi Horror Story 2021


 बेवफाई की जानलेवा कहानी: तंत्र विद्या
 Bewafai Ki Jaanleva kahani: Tantr Vidya

भारी जायदाद, धन-दौलत सब कुछ था जगदीश के पास। बाप करोड़ों छोड़ कर गया था। जिसका ब्याज ही इतना आ जाता था कि उसे कुछ करने की आवश्यकता न थी।

वह शराब और औरतों का भोग तो अवश्य करता था, लेकिन केवल आवश्यकता की सीमा तक। यह नहीं कि अनाप-शनाप दौलत है तो उस के दम पर अय्याशी के साधन ढूंढता फिरे, जैसा कि आमतौर पर होता है।


उसे लगाव केवल तंत्र-मंत्र और पराशक्तियों के रहस्य खोजने में था। उसकी अपनी एक विशाल लाइब्रेरी थी। जिसमें इसी से संबंधित किताबें भरी पड़ी थीं। शैतान से सम्पदा और गुप्त ताकत पाने के उपाय बताने वाली, प्राचीन तंत्र विद्या से जुड़ीं, इन्द्रजाल आदि पुस्तकें वह ढूंढता रहता था। कौआ तंत्र, उल्लू तंत्र, आदमी अथवा जानवर कोई भी हो, उनका परकाया प्रवेश, गुप्त अथवा रहस्यमय ताकत वाले किसी भी स्त्री-पुरुष का पता लगने पर वह किसी भी कीमत पर उससे यह विद्या सीखने का प्रयास करता । वह रहस्यमय शक्ति देश-दुनिया के किस कोने में है, इसकी भी उसे परवाह न थी।


दिल्ली की झुग्गियां हों अथवा कामरूप (आसाम) के घने जंगल...जादुई शक्तियों की खोज में वह सभी स्थानों पर तांत्रिकों की चौखट पर सजदे कर चुका था।


उसके पास इसी विषय से जुड़ी हजारों पुस्तकें भी थीं, जिनमें जादू-टोना, भूत-प्रेत जैसे विषय होते थे। उसके दिमाग में सोते-जागते, खाते-पीते इसी से संबंधित ख्याल उमड़ते रहते थे।


जगदीश अपनी दौलत के बल पर चैन से जीवन गुजार सकता था, किन्तु दिमागी फितरत उसे ऐसा करने देती, तभी तो। वह सनकी आदमी के रूप में चर्चित हो उठा। क्योंकि उसकी हर सांस में एक ही दीवानापन बसा था-"आसमानी चमत्कार...तंत्र विद्या।"


यहां तक कि उसने हृदय रोग भी पाल लिया था। डाक्टरों ने उसे स्पष्ट चेता दिया था कि उसे किसी भी प्रकार के आघात से दूर रहना है। किसी भी प्रकार की टेंशन, ज्यादा भागदौड़ अथवा कैसा भी आघात वह झेलने की दशा में नहीं रहा था। ऐसी कोई भी स्थिति उसके लिए खतरनाक, क्या जानलेवा भी हो सकती थी।


अतः उसे किसी भी तनाव, गुस्से अथवा डर से बचना होगा।


डाक्टरों की चेतावनी ने जगदीश को अपने तक ही सीमित कर दिया। वह एकांतप्रिय बन गया। इस समय वह अपनी रहस्यमयी लाइब्रेरी में किताबों से भरी अलमारियों के बीच एक सोफे पर बैठा कुछ सोच रहा था कि दरवाजे पर किसी की दस्तक से वह झुंझला उठा।


उसने ऊपर की मंजिल का यह फ्लैट खरीदा था तो इसलिए कि स्वयं उसे तो नीचे जाने की बेकार में जरूरत क्या थी और इतनी सीढ़ियां चढ़कर कोई गैर भी आने से पहले सौ बार सोचे। वह किसी के साथ मित्रता नहीं रखता था। फालतू में समय बर्बाद करने वालों से वह चिढ़ता था। अगर ऐसा कोई शख्स उसके पास आ जाता था तो वह घंटों तक तनाव में रहता था, जबकि तनाव उसके लिए जानलेवा हो सकता था।


वह बड़बड़ाया-“साले जानवर, आ जाते हैं टेंशन पैदा करने!” फिर एक लम्बी सांस लेकर न चाहते हुए भी वह उठा। उठा क्या उठना पड़ा। फिर आगे बढ़कर उसने दरवाजा खोल दिया। लेकिन दरवाजे पर मौजूद शख्स को देखकर उसे धक्का सा लगा। उसका दिल बेचैन हो उठा।


एक बहुत आकर्षक लड़की उसके सामने खड़ी मुसकरा रही थी। उसने गुलाबी स्कर्ट और वाइट टॉप पहना हुआ था। वह कंधे पर बड़ा सा बैग लटकाये हुए थी। 

उसने मुसकराकर अभिवादन किया-"गुड मार्निंग जगदीश सर...।" अपनी सांसों पर काबू पाती हुई वह बोली-“सीढ़ियां चढ़ते हुए खत्म ही नहीं हो रही थीं। ऐसा लगता था, चांद पर पहुंच जाऊंगी..."


वह हैरान होकर उसका मुंह देखे जा रहा था।


“क्या बात है? मुझे देखकर ऐसी क्या परेशानी हो गयी, जो टेंशन में दिख रहे हो?” उत्साह भरे स्वर में वह बोली।


लेकिन जगदीश उस लड़की के स्वागत का कतई इच्छुक नहीं था। इसलिए उसने लड़की को अंदर आने के लिए नही बोला था।


दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। करीब एक मिनट बाद जैसे उसे कुछ याद आया और वह एकदम बोला-“तुम...तुम रीटा?"


ठंडी सांस भरती हुई रीटा बोली-“चलो पहचान तो लिया! लेकिन अब भी अंदर आने की इजाजत है या नहीं? यह स्थान ऐसा आकर्षक भी नहीं है कि खड़ी रहकर रात बिता दूं।”


हड़बड़ाता-सा जगदीश एक ओर हो गया। रीटा अंदर चली आई।


इसके बाद बिना किसी औपचारिकता के रीटा एक चेयर पर जा बैठी और कमरे के मूल्यवान सोफे आदि पर आंखें दौड़ाने लगी।


खूबसूरत भारी पर्दों से निगाह हटाती रीटा ने कहा-“क्या ठाठ हैं भई! अच्छा बताओ, कैसे हो?"


लेकिन सच्चाई यह थी कि उसके आने से वह ठीक नहीं था। बाहर का दरवाजा बन्द करके वह आकर रीटा को घूरने लगा।


जगदीश का हृदय वश से बाहर हो रहा था तथा उसके हाथ-पैर बेदम होने लगे थे। तीन साल पहले जिस रीटा को वह बीती हुई कहानी के रूप में भूल चुका था, वह आज अपने पूरे आकर्षण और भटकाने वाली छवि के साथ उसके सामने बैठी हुई थी।

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दूरस्थ क्षेत्रों में तंत्र-मंत्र के माहिरों की खोज में जिन दिनों जगदीश देश भर में घूम रहा था, तो उसे पता चला कि कामरूप में सत्रहवीं सदी में एक ऐसा कबीला बसता था जिसके सदस्य बरस में एक बार किसी भी जानवर के रूप में अपने को बदल लेते थे। इसके लिए केवल कुछ अनुष्ठान किये जाते थे।


उस तांत्रिक कबीले के शेष बचे लोगों को ढूंढते समय जगदीश की मुलाकात वहां के एक ईसाई दुकानदार की बेटी रीटा से हुई। बीस साल की स्मार्ट रीटा को देखकर उसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसके जवानी से भरपूर अंगों पर जगदीश जैसा खुश् मिजाज इन्सान भी पिघल उठा।


जाने क्या जादू किया जगदीश ने कि रीटा भी उसके प्यार में डूब गयी। उसके यौवन की तपिश में जगदीश जल उठा।


इश्क-विश्क के तरानों के साथ नवयौवना रीटा के मचलते यौवन का मकरन्द इस भवरे ने खूब चखा।


लेकिन तभी उसे ध्यान आया कि वह अपने जिस अभियान पर निकला था, उसे तो वह जवानी के खेल में भूल ही बैठा है। बस फिर क्या था, अवसर पा वह वहां से उड़न छू हो गया।


तीन साल बीतते-बीतते अब तो रीटा की परछाई भी उसके मन में कहीं बाकी न बची थी। लेकिन अब जब वह सब से दूर हो कर यहां तनहाई काट रहा था तो जाने कहां से उसे ढूंढती हुई वह यहां आ धमकी थी।


सप्ताह में एक बार जगदीश पास में ही स्थित एक डिपार्टमेंटल स्टोर को फोन कर देता था और उसकी आवश्यकता की सभी चीजें, जिनमें खाने-पीने की और अन्य वस्तुएं शामिल होती थीं, वहां से डिलीवरी बॉय दे जाता था। इसके अलावा उसे कहीं आना-जाना नहीं था।


मन के भाव छिपाता जगदीश बोला-"कुछ पीना पसन्द करोगी?" "तले काजू और सोडा के साथ व्हिस्की।” तुरंत ही रीटा बोल पड़ी।


दो गिलास बनाकर जगदीश ने एक में कम व्हिस्की डाली और एक में ज्यादा। फिर ज्यादा व्हिस्की का गिलास उसे थमाता हुआ बोला-“मैं तुम्हारे लिए काजू लाता हूं..."


कहकर वह किचेन की तरफ बढ़ा तो दिलफरेब मुसकराहट के साथ रीटा ने कहा-“थैंक यू।”


एक प्लेट में काजू लेकर वह जल्दी ही वापस आ गया। प्लेट मेज पर रखकर उसने गिलास से एक घूंट भरा तो उसे बदन में ताजगी सी आती महसूस हुई।


मुंह में काजू डालता हुआ वह शांत स्वर में बोला-“रीटा! तुम्हारे लिए मैं क्या कर सकता हूं?"


"आपको कुछ नहीं करना है, बल्कि इतनी दूर से आपके लिए कुछ करने तो मैं आयी हूं।"


"हमारे गांव में तुम काया परिवर्तन कर लेने वाले कमाल के लोगो को खोजन आये थे. तुम्हें ध्यान है।"


जगदीश ने रीटा के याद दिलाने पर स्वीकृति में सिर हिलाया। उसने सोचा, उस परकाया प्रवेश की विधा से रीटा का क्या लेना-देना है? फिर भी उसने कहा -"तुम ठीक कहती हो।"


"उस संबंध में मैंने जानकारी प्राप्त कर ली है। मैं समझती हूं कि आज भी तुम्हें काया परिवर्तन की विद्या में रुचि अवश्य होगी।" अपनी बात पर जोर देती रीटा ने गम्भीरता से कहा।

सुनकर जगदीश आश्चर्यचकित हो उठा।

हैरानी भरे स्वर में जगदीश ने कहा--"और इतनी दूर से मुझे ढूंढती हुई तुम यहां तक आ गयीं? केवल मेरा ज्ञान बढ़ाकर मेरी जिज्ञासा शांत करने की मंशा लेकर?"

“नहीं तो क्या तुम यह सोच रहे हो कि मैं तुमसे अपने साथ की गई बेवफाई का प्रतिशोध लेने आयी हूं?"


"अरे नहीं...नहीं। मैं ऐसा नहीं सोच रहा। तुम्हारा आभारी हूं। खैर! पूरी बात बताओ।" वह हड़बड़ाया।


"जब तुम वहां से चले आये तो उसके बाद तीन माह बीते होंगे कि...।" अपनी बात बीच में रोक रीटा ने इधर-उधर निगाह दौड़ाई। ऐसा लगा कि शायद उसे किसी चीज की आवश्यकता है।


“अच्छा, एक सिगरेट पिलाओ, मुझे बहुत तलब हो रही है।" रीटा ने बेचैनी भरे अंदाज में कहा तो जगदीश ने भी आस-पास नजर डाल कर खड़े होते हुए कहा।


"अभी लाता हूं। सिगरेट शायद लाइब्रेरी में है।"


ड्राइंग रूम और लाइब्रेरी के बीच काफी फासला था। हैरत में डूबा जगदीश कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा था।


विनय भरी मुद्रा में रीटा ने कहा- “प्लीज! तुम्हें परेशानी तो होगी। लेकिन मैं सिगरेट की जरूरत महसूस कर रही हूं।"


“अरे कुछ नहीं, मैं अभी आया..." कहता हुआ जगदीश तेज कदमों से लाइब्रेरी की तरफ लपका। उसके सीने में हल्का सा दर्द भी महसूस होने लगा।


लेकिन वह इतना उतावला था कि उसने इस हल्के दर्द पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसे तो अब यह जल्दी थी कि परकाया प्रवेश का रहस्य रीटा उसे जल्द-से-जल्द बता दे। उतावलापन में उसका उत्साह पूरे जोरों पर था।


कुछ दिन पहले से वह सिगरेट पीना बहुत कम कर चुका था। इसलिए वह सिगरेट का पैकेट ध्यान रखने की परवाह कम ही करता था। इसलिए वह सिगरेट का पैकेट जाने कहां रख भूला था। वह बुरी तरह अपने को कोस रहा था।


उसने सिगरेट की तलाश में लाइब्रेरी के कागजातों व किताबों के जमघट में सिगरेट ढूंढने का प्रयास किया।


अन्ततः मेज की दराज में सिगरेट का पैकेट उसे रखा मिल गया, जिसे उठाकर वह करीब-करीब दौड़ता हुआ ड्राईग रूम में आ पहुंचा।


लेकिन ड्राइंग रूम में तो कुछ और ही उसके इंतजार में था। देखते ही उसके हाथ से छूटकर सिगरेट का पैकेट नीचे जा पड़ा था। कमरे से रीटा जाने कहां चली गयी थी?


रीटा को जिस कुर्सी पर वह बैठा छोड़ गया था, वहां रीटा की गुलाबी स्कर्ट पड़ी थी और उसके ऊपर बैठा एक बड़ा मेंढक अपनी गोल आंखों से जगदीश की ओर देख रहा था।


कुर्सी के पास कालीन पर रीटा की ब्रेसरी और टॉप पड़े दिख रहे थे। एकदम उसे ख्याल आया, तो क्या रीटा मेंढक बन गयी है। यह विचार काँधते ही जगदीश को लगने लगा कि सारा ड्राइंग रूम तेजी से घूम रहा है। भय और आश्चर्य से एक जोरदार चीख उसके मुंह से निकली।


वह इस चमत्कार को झेल नहीं पाया और पलभर में उसके प्राण पखेरू उड गये। वह धड़ाम से फर्श पर जा गिरा।वह मर चुका था।


तभी बाथरूम का दरवाजा खोलकर रीटा ड्राइंग रूम में आयी और एक-एक कदम बढ़ाकर जगदीश के निकट आयी। एक जहरीली मुसकराहट उसके होठों पर खेल रही थी।


जगदीश के पास बैठकर वह झुकी। पहले उसने उसके सीने पर हाथ रखा। फिर कान लगाकर उसके दिल की धड़कन देखनी चाही।


आज जगदीश की धड़कनें उसके साथ बेवफाई कर गयी थीं। डाक्टर ने कह ही रखा था कि कोई झटका वह सह नहीं पायेगा और हुआ भी वही। उसकी धड़कनें तेज होती जा रही थीं, फिर उत्तेजना का ज्चार-जिसे वह झेल नहीं सका और उसका हार्ट फेल हो गया था।


मुसकराती हुई रीटा उठकर खड़ी हो गयी और चेयर से अपने कपड़े उठा कर वह उन्हें पहनने लगी।


उसे युवती से औरत बनाकर मुंह फेरने वाले को उसने बड़ी सीधी सी मौत दे दी थी।


रीटा ने कपड़े पहनकर अपना बैग उठाया और वह बड़ा हरा मेंढक उठाकर उस में रख लिया तथा टहलती हुई आराम से बाहर निकल गयी।


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