Misr Ki Mummy Ki Darawani Kahani: बत्तीस सौ साल | ममी की कहानी


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Misr Ki Mummy Horror Story Hindi Kahani

Misr Ki Mummy Ki Darawani Kahani: Battis Sau Saal
मिस्र की ममी की डरावनी कहानी: बत्तीस सौ साल 

ह कहानी ईसा से भी तेरह सौ सत्तावन साल पहले की है, जब मिस्र पर शहंशाह अखनातन का राज था।


धार्मिक चर्चा करते-करते बाप-बेटी में बहस प्रारम्भ हो गयी और दोनों ही अपनी-अपनी बात पर अड़ गये।


जब शहजादी अपने तर्क से टस-से-मस नहीं हुई तो शहंशाह के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा और उसने तय कर लिया कि शहजादी अब स्वर्ग नहीं जायेगी। भले ही इसके लिए उसे कोई भी रास्ता अपनाना पड़े।


लेकिन इसके लिए उसका बदनसीब होना आवश्यक था। उसे बदनसीब बनाने की शहंशाह की सारी कोशिशें बेकार जा रही थीं। ईश्वर भला अपने पुतलों को बदनसीब कैसे मान ले! वैसे भी इन्सान के प्रयासों से कुछ होने वाला नहीं है।


शहंशाह अखनातन ने शाही धर्मगुरु को बुलाकर पूछा-“शहजादी बदनसीब कैसे बनेगी? जिससे उसे नर्क ही मिले!"


लेकिन कोई भी धर्मगुरु ऐसा नहीं था, जो यह उपाय बता सके कि शहजादी नर्क में किस प्रकार जा सकती है!"


यह जलील पिता शहंशाह अखनातन था। अखनातन मिस के प्रसिद्ध शहंशाह तूतेन खामन का ससुर था। जब सारी कोशिशें निष्फल चली गयीं तो उसे ध्यान आया मिस्र के दर्शन का। जिसमें स्पष्ट वर्णित था कि नापाक और बेआबरू औरत के लिए स्वर्ग में जगह नहीं होती है।


तब उसने शाही धर्मगुरुओं को खुद आदेश दिया कि वह शहजादी के साथ मिलकर उसका बलात्कार करें। जिससे वह बेआबरु और नापाक हो जाये।


आदेश की देर थी कि भूखे भेड़ियों की तरह वह धर्म के कथित ठेकेदार इस अमानवीय कृत्य पर तुल गये और सबने उसके साथ सामूहिक कुकर्म कर उसकी जान ले ली। इसके बाद शहजादी का दायां हाथ काटकर उसे ममी के रूप में संरक्षित कर दिया गया।


हाथ कटी शहजादी का शव बादशाही घाटी में ले जाकर वहां के कब्रिस्तान में दफना दिया गया। इसके बाद कई पीढ़ियों को पार करता हुआ शहजादी का वह हाथ शेख शहजन के पास आ गया।


शेख को एक दिन अचानक मलेरिया ने शिकार बना लिया। उसका बुखार बार-बार उतर भी जाता था और फिर से कंपकपी के साथ चढ़ जाता था। मलेरिया बुखार में होता भी यही है।


बुखार से कभी उसका बदन जलने लगता था और कभी वह सर्दी के मारे कांपने लगता था। चिकित्सा करा-करा कर वह थक गया था।


आखिर उसने अपनी चिकित्सा विख्यात तांत्रिक और मनोविशेषज्ञ काउंट हावर्ड से करानी शुरू की।


कुछ दिन की चिकित्सा से ही काउंट ने उसे एकदम स्वस्थ कर डाला था। शेख ने फिर उपहार में उसे स्वर्ण निर्मित पेटी में संरक्षित शहजादी का हाथ दे दिया। इसके साथ उसने शहजादी की मार्मिक कहानी काउंट को बतायी थी। यह वाकया सन् अठारह सौ अस्सी का था।


तांत्रिक काउंट ने ममी बनाया गया वह हाथ लंदन के राष्ट्रीय संग्रहालय को भेंट करना चाहा। लेकिन संग्रहालय में ऐसे भंग अंग रखने की प्रथा न थी। इसलिए इसे स्वीकारने को वहां के प्रबंधक तैयार न हुए।


तब पीढ़ियों पुराना वह हाथ काउंट ने अपने निवास की एक आलमारी मे रख दिया था। काउंट हावर्ड ने अक्तूबर 1922 में कुछ आवश्यक कागजात तलाश करते हुए उस अलमारी को खोला। स्वर्ण जड़ित पेटी देखकर उसे ख्याल आया“क्या वास्तव में इसमें किसी शहजादी का कटा हुआ हाथ है? देख तो लूं...।"


अलमारी के अंदर रखी वह पेटी काउंट ने निकाल ली। लेकिन पेटी खोलते ही उस की हैरानी और भय का ठिकाना नहीं रहा।


उस हाथ की खाल बदरंग और सिकुड़ी हुई थी। था भी तो वह बत्तीस सौ वर्ष पुराना। लेकिन अगले ही पल बेरंग और झुरींदार खाल ताजा रूप में परिवर्तित होने लगी। इसके बाद उस त्वचा पर सुनहरे रंग के आकर्षक और बड़े कोमल रोयें नजर आने लगे थे।


डर के कारण तांत्रिक काउंट के मुंह से चीख निकल गयी। जिसे सुनकर दौड़ती हुई उसकी पत्नी वहां पर आ पहुंची।


उसने पति से पूछा-“क्या हुआ?"


जब तक वह कोई जबाव देता, कि उसकी पत्नी को सुनहरी पेटी में सुरक्षित रखा गया हाथ नजर आ गया।हैरत और डर के मिले-जुले भावों के साथ उसने पूछा-“यह क्या है?" तब काउंट ने उसे सब कह सुनाया।


भय से कांपती उसकी पत्नी हैरानी से कह उठी-“इतना पुराना हाथ ? लेकिन यह तो बिलकुल जीवित इंसान का हाथ दिखाई दे रहा है... इसमें तो पूरी तरह जीवन के लक्षण नजर आते हैं... ।"


निर्जीव हाथ को सजीव होते देख चुका काउंट क्या बताता? स्वयं उसकी दशा भी पत्नी सरीखी ही थी।


काउंट पत्नी से परामर्श मांगने वाले भाव से बोला-“शाही सम्मान के साथ इस हाथ का अंतिम संस्कार कर दें तो सही रहेगा... “आपका कहना उचित है।"


ईसाई धर्मावलम्बियों में 31 दिसम्बर संत दिवस माना जाता है। इसलिए उस हाथ के अंतिम संस्कार के लिए तांत्रिक काउंट ने वही दिन नियत कर लिया था। यह सन् 1922 का वाकया है


काउंट हावर्ड ने नियत तिथि को वह हाथ अग्नि के हवाले कर दिया तथा मिस्र के ग्रंथों को पढ़ने लगा। बाद में जैसे ही उसने पुस्तक बंद की तो धड़...धड़...भड़ा....भड़ाम। जोरदार धमाकों ने कमरा हिलाकर रख दिया। और वहां हो रहा प्रकाश भी स्वयं ही गुल हो गया।


हवा के भयानक झकोरे कमरे के अंदर घूमने लगे तथा जाने कैसी अजीब सी आवाजें गूंजने लगीं।


पति-पत्नी इस स्थिति से घबरा उठे। लेकिन तभी तेज आवाज हुई–'भड़ाक ऽऽऽ।' और वहां का दरवाजा अपने आप खुल गया।


काउंट और उसकी पत्नी ने अपनी जगह से खड़े होने की कोशिश की तो वह दोनों लड़खड़ाते हुए धरती पर जा पड़े। वह बुखार के मरीज की तरह कंपकपा रहे थे। हवाएं चक्रवात बनी हुई थीं।


उसी समय पेटी से निकले हाथ को काउंट ने जिस आतिशदान में अग्नि के हवाले किया था, वह फिर से दहक उठा।


तब काउंट की निगाह आतिशदान की तरफ गयी।


वहां निगाह पड़ते ही वह हैरानी से उछल पड़ा। उसकी घबराहट बढ़ गयी। अपने शरीर पर शाही पोशाक धारण किये लम्बे कद की एक बहुत खूबसूरत युवती उस आतिशदान में जल रही आग के पास खड़ी हुई थी। उसके कंधे से झूलते कीमती शाल का एक सिरा फर्श पर टिका था। सोने का बना एक दमकता सांप उसके माथे पर चमक रहा था। लेकिन उसका दायां हाथ गायब था।


तभी उस खूबसूरत युवती ने अपना हाथ आगे किया और आग में डाला गया हाथ निकालकर वहां से गायब हो गयी।


दूसरे दिन काउंट हावर्ड ने यह पूरा हादसा अपने बचपन के एक दोस्त लार्ड इर्विन को लिख कर भेज दिया। इर्विन उत्खनन तथा पुरातन वास्तु-कौशल का प्रसिद्ध ज्ञाता था।


जब यह पत्र प्राप्त हुआ तो लार्ड इर्विन ने मिस्र की यात्रा पर जाने का कार्यक्रम निश्चित कर लिया।


फिर एक दिन लार्ड इर्विन मिस्र में पहुंच ही गया। वह हावर्ड द्वारा बतायी शहजादी की कब्र खुदवाने का विचार लेकर वहां गया था।


जब इर्विन ने इस उत्खनन कार्य के लिए श्रमिकों को एकत्र किया तो उनमें से एक ने समझाना चाहा--

"देखिए! वैसे तो आपकी मर्जी है। लेकिन समझाना हमारा फर्ज है...कि शाही कब्र और मकबरों में खतरनाक रूहें होती हैं। इसलिए उन्हें न छेड़ें तो ज्यादा अच्छा होगा।


लेकिन उसने मजदूरों की सलाह को अंधविश्वास ठहराते हुए हवा में उड़ा दिया। उसने उनकी छुट्टी कर दी तथा अन्य मजदूरों को बुलवा लिया। उन्हें लेकर वह खनन स्थल पर पहुंच गया। वह सरकार से इस कार्य की आज्ञा ले चुका था।


घाटी में इर्विन ने खुदाई शुरू करा दी। इस दौरान कई कक्ष सामने आये। वे सब खाली थे, लेकिन एक कक्ष ऐसा भी मिला, जिसके दरवाजे अच्छी तरह से बंद थे। शायद इसमें कुछ था।


मजदूरों से उसने इस कक्ष का दरवाजा खोलकर अंदर चलने के लिए कहा। किंतु जाने क्यों वह अन्दर जाने के नाम पर ठिठक गये।


तब खुद इर्विन और उसके साथियों ने ही यह कार्य किया।


अन्दर जाने पर इर्विन को वहां पर एक सुनहरे रंग का संरक्षित ताबूत मिला जिस पर खूबसूरत नक्काशी की गयी थी। उस कमरे की साज-सज्जा भी प्राचीन सभ्यता के अनुरूप और उच्च-कोटि की थी। उस सुनहरे ताबूत का ढक्कन खोलने पर लार्ड इर्विन को उसके भीतर किसी शहंशाह का शव रखा हुआ मिला। यह शहंशाह तूतेन खामन की ममी थी। ममी हर प्रकार से ठीक-ठाक थी। देखने से आभास हो रहा था कि जैसे उसकी मौत अभी-अभी हुई है। स्वर्ण निर्मित एक चमगादड़ शहंशाह की ममी के सीने पर रखा हुआ था। यह चमगादड़ काफी बड़े साइज का था। जिसमें बहुमूल्य हीरे सजाये गये थे।


चमगादड़ को छूते ही इर्विन ने एक खौफ सा महसूस किया। उस कमरे में किया गया प्रकाश भी उसी समय गायब हो गया और लगा कि बल्ब के तार ही रंगीन चमक रहे थे।


इसके साथ ही बहुत ठंडी तथा बहुत तेज आंधी सी चलने लगी। सारा कमरा बर्फ सा सर्द हो गया था। हवा के तेज झोंके तो गूंज ही रहे थे, किसी बड़े पक्षी के पंखों की फड़फड़ाहट भी शोर कर रही थी। कुछ पल बाद उड़ते हुए अनेक चमगादड़ वहां पर आ पहुंचे और इर्विन के सिर पर चक्कर काटने लगे।


खौफ से इर्विन फक्क पड़ गया, लेकिन लालच फिर भी उसके दिल में भरा था। इसलिए आगे बढ़कर उसने ममी की पट्टियों पर हीरे-जवाहरात से निर्मित खड़ा हुआ चमगादड़ खींच लिया। ऐसा करते ही उसे घुटन का ज्यादा आभास हुआ और वहां से भाग जाने की इच्छा होने लगी थी तथा उसकी सांसें भी फूल ने लगी।


भयभीत इर्विन वहां से दौड़ चला तथा जल्दी ही मकबरे के दहशतनाक वातावरण से खुले वातावरण में आ पहुंचा।उसके साथी वहां प्रतीक्षा में खड़े थे। इर्विन ने मुट्ठी में वह कीमती चमगादड़ दबाया हुआ था। तभी वह बेहोश होकर धरती पर जा पड़ा।


तुरन्त चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए इर्विन के साथी वहां से उसे उठाकर होटल पहुंच गये और वहां डाक्टर बुलवाया। चिकित्सा सुविधा के बाद उसकी चेतना लौटी।


»


भय के बादल उसकी आंखों में नजर आ रहे थे और चेहरा बिल्कुल सर्द दिखाई पड़ रहा था। साथी भी उसकी दशा देखकर चिन्तित हो गये। 

उसके एक साथी ने सवाल किया-"तुम इतने डरे हुए हो इर्विन...क्या बात है?" स्वयं को संभालने का पूरा प्रयास करता हुआ इर्विन बोला- "बात तो कुछ भी नहीं है, लेकिन हम आज ही यहां से वापस जायेंगे...।"


"हमने तो तुम्हें पहले ही समझाया था कि मकबरों के खनन से परहेज रखो, लेकिन तुम्हारी ही समझ में नहीं आया था। शताब्दियों पुराने प्रेतग्रस्त मकबरों की खुदाई उचित नहीं है मेरे दोस्त। अतीन्द्रिय शक्ति सम्पन्न रूहों की कहानी में कोई तो सच्चाई अवश्य है। मैंने यह भी सुन रखा है कि लाश को कफन से निकालना बहुत बड़ा गुनाह होता है और एक प्रकार से दुर्भाग्य को निमन्त्रित करना है। कब्र के स्थान पर उत्कीर्ण लिखाई को पढ़ने और छूने के नतीजे भी बड़े विनाशकारी होते हैं।” इर्विन के दूसरे साथी ने कहा-जो स्वयं भी भयभीत दिखाई दे रहा था। उसने इर्विन के डरे हुए चेहरे पर निगाहें टिकायी हुई थीं... ।


“मैं इन मकबरों की आज के बाद कभी भी खुदाई नहीं करूंगा... यह शपथ लेता हूं।"


अपने मित्र के सामने इर्विन ने शपथ तो ले ली, लेकिन शहंशाह की ममी के सीने से खींचा गया रहस्यमय कीमती चमगादड़ उसने वापस कब्र में नहीं पहुंचाया।


वह चमगादड़ उसने सबकी निगाहों से छुपाकर अपने सामान में इस प्रकार रख लिया कि कोई जान न पाये तथा अपने दल के किसी सदस्य को उसने इस विषय में कुछ बताया भी नहीं।


लकसर क्षेत्र में लार्ड इर्विन तम्बू गाड़कर रात को जिस समय आराम कर रहा था, तो उसी समय एक रहस्यमय शोर के कारण उसकी नींद खुल गई।


बिस्तर से उठकर उसने तम्बू से बाहर देखा, जहां बहुत तेज चीखों के साथ डरावना शोर मचाता हुआ एक विशाल चमगादड़ उसे दिखाई दिया। जाने क्यूं इस चमगादड़ को देखकर वह मन में खौफजदा हो उठा था।


उस चमगादड़ को भगाने का इर्विन ने लाख यत्न किया, लेकिन वह तम्बू के आस पास मंडराता ही रहा। कई बार तो अपनी भयानक चमकती आंखों से इर्विन को घूरते हुए उस रहस्यमय चमगादड़ ने इर्विन पर हमला भी कर दिया था। इर्विन ने जीवन में पहली बार इतना भयानक चमगादड़ देखा था।


उसके साथी नींद में गाफिल होकर सो रहे थे।


सारी रात घबराया हुआ इर्विन ऐसे ही जागता और बाहर मंडराते चमगादड़ की दिल हिलाने वाली तेज चीखें सुनता रहा। चमगादड़ के भयंकर ढंग से पंख फड़फड़ाने की आवाजें जाने किस समय बंद हुईं। तुरन्त ही उसने उठकर सतर्कतापूर्वक तम्बू के बाहर झांका और देखा कि तम्बू से दूर जाता वह विशाल चमगादड़ नील घाटी को पार करके लकसर की तरफ बढ़ा जा रहा है।


थोड़ी देर में ही सुबह होने वाली थी। जाने कैसी अन्जांनी आशंका उसने महसूस की कि वह अपने सोये हुए साथियों के तम्बू में जा पहुंचा।


उसने अपने सब साथियों पर निगाह डाली। लेकिन एक साथी का जर्द चेहरा देखकर जब उसे जगाना चाहा तो वह चीख पड़ा। उसकी चीखें निकल गईं, क्योंकि वह मरा हुआ पड़ा था।


उसके चिल्लाने की आवाज़ से बाकी सारे साथी भी जागकर बैठ गये। कुछ देर में ही वह जान चुके थे कि उनका एक साथी दुनिया छोड़ चुका है। इर्विन के दिल में बार-बार ख्याल आ रहा था कि उसके साथ जो भी बुरा हो रहा है, उस कीमती चमगादड़ के कारण ही हो रहा है। लेकिन फिर भी उसने इस बात को अपने मन का वहम ही जाना।


दूसरी रात फिर वही सब होने लगा। आज वह अपने साथियों के साथ ही एक तम्बू में सोया हुआ था कि चमगादड़ की मनहूस फड़फड़ाहट की आवाज सुनकर उनकी नींद खुल गई। चिरपरिचित डरावने स्वर से इर्विन के प्राण सूख गये थे। उसे लगा कि आज फिर किसी की बारी है।


जल्दी से उठकर उसने अपने साथियों पर निगाह डाली तो एक के माथे पर पसीने बूंदें झिलमिला रही थीं और चेहरे पर डर की परछाई स्पष्ट दिख रही थी। वह सोच में पड़ गया वह चमगादड़ क्या सोते हुए किसी इन्सान की भी सोच पर छाया डालने में समर्थ है?


कुछ देर बार चमगादड़ वहां से चला गया था। इर्विन ने फिर से अपने साथी पर निगाह डाली। वह शांति से सोया हुआ था। इससे इर्विन ने शांति महसूस की कुछ देर बाद उसे भी नींद आ गयी। लेकिन वह सपने में तूतन खामेन मकबरे में पहुंच गया था। लेकिन मकबरे के भीतर शब्दों में न समा सकने वाला अंधेरा फैला हुआ था। पता नहीं कि उस अंधेरे में डूबे मकबरे में वह स्वयं कितने समय कैद रहा! लेकिन अचानक गूंजी किसी की चीख ने उसकी नींद तोड़ दी। इर्विन उठ बैठा। उसने अपने साथियों पर निगाह डाली तो वे नींद में पसीने-पसीने था। वह साथी, ईश्वर को प्यारा हो चुका था।


घबराकर लार्ड इर्विन ने वहां से अपना बोरिया-बिस्तर बांध लिया और दूसरे स्थान पर आ गया। फिर भी दुर्भाग्य उससे चिपका ही रहा।


क्योंकि एक-एक कर उसके साथी दुनिया छोड़ रहे थे और वह स्वयं भयानक सपनों में छटपटाता रहता था।


अब ले-देकर उसका एक ही साथी बचा था। रात के समय सोते हुए वह सपनों में एक विशाल कक्ष में जा पहुंचा था। फिर एक के बाद एक कई कक्ष पार करके वह गिरजाघर जैसे स्थान पर पहुंच गया था। यहां से होकर वह ऐसे स्थान पर आ गया, जहां पर पत्थर से निर्मित मिस्र के लोगों की प्रतिमायें रखी थीं। इसके बाद वह नील के पुरातन मकबरों के हैरतनाक कक्षों से निकलने लगा। उसकी चाल बहुत तीव्र थी। एक अनोखी खुशबू ने उसे प्रफुल्ल कर दिया था। अब वह जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, उसकी प्रफुल्लता बढ़ती ही चली जा रही थी


बड़े-बड़े हॉल कक्षों के बाद बहुत बड़ा एक पत्थर का बरांडा मिला तो वह उसे भी पार कर गया। लेकिन यह क्या...अब वह स्थान छोटा होकर सिकुड़ने लगा था। यह देखकर वह खौफजदा हो उठा। वह बरांडा पार करने लगा तो अंत में वह एक छोटे कमरे में आ गया। कमरा चारों ओर से बंद था। अचानक वह भी छोटा होने लगा। कमरा क्षण-प्रतिक्षण आकार में घटता जा रहा था। जिसकी छत, दीवारें और फर्श सब उसे घेरते हुए छोटे होते जा रहे थे। इर्विन का सारा शरीर पसीने से सराबोर हो रहा था। भयभीत होकर वह अपने बचाव के लिए हर तरफ निगाह दौड़ाने लगा।


अचानक उसने अनुभव किया कि जैसे कोई पक्षी उसके सीने पर सवार हो गया है तथा उसका दम घुटने लगा है। भयभीत इर्विन चीख मारता हुआ जाकर उठ बैठा वह पसीना-पसीना हो रहा था।


जागते ही उसकी निगाह सामने खिड़की पर गयी तो घबराकर वह फिर से चिल्ला उठा था।


क्योंकि खिड़की की राह एक विशाल चमगादड़ अंदर घुस आया तथा उसके ऊपर चकरा कर फिर वापस चला गया।


घबराया इर्विन एकदम उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। अपने साथ उसे अपने साथी का भी ख्याल था।


चमगादड़ के कमरे से बाहर निकल जाने के बाद इर्विन ने खिड़की को ठीक से बंद करने के विषय में विचार किया। लेकिन ऐसा करने के लिए वह खिड़की के पास गया तो वह चमगादड़ खिड़की पर चिपका, कान खड़े किये हुए और अपनी चमकीली खौफनाक आंखों से उसे ही घूर रहा था।


फिर वहां से हटकर वह चमगादड़ पुनः कमरे में घुस आया तथा डरावने ढंग से पंख फड़फड़ाता हुआ वह चक्कर काटने लगा।


कुछ देर बाद वह खिड़की की राह ही वापस उड़ता चला गया। अजीब सी आशंका से ग्रस्त इर्विन अपने साथी की ओर लपका तथा उसे पुकरारा। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।


बिस्तर पर अधलेटा सा वह इस प्रकार पड़ा हुआ था, जैसे उसने कोई खतरनाक शै अचानक देखी हो और फिर उठने का प्रयास किया हो। लेकिन उसका यह प्रयास व्यर्थ गया हो। उसकी खुली आंखों में भय समाया था।


इस मित्र की मौत का इर्विन को बड़ा धक्का पहुंचा था। क्योंकि यह उसका बड़ा हितैषी और हर स्थिति का साथी था। इसी ने उसे भयंकर परिणामों की जानकारी देकर इस खुदाई से भी रोकना चाहा था।


इर्विन को अनुमान लगाने में देर नहीं लगी कि जब वह डरावने सपने के कारण जागा था तो उसी समय उस विशाल भयानक चमगादड़ ने इसकी जान ले ली थी फिर भी कुछ आशा संजोकर उसने डाक्टर को बुलवाया तो जांच-परख कर वह बोला कि इसका हार्ट अटैक से निधन हुआ है। डाक्टर ने यही शब्द इर्विन के अन्य । साथियों के मरने पर भी कहे थे।


उदास इर्विन ने यह स्थान भी छोड़ दिया। उस मनहूस चमगादड़ से बचने के लिए अब वह इस देश से उस देश भटक रहा था। लेकिन वह जहां पर भी जाता, चमगादड़ वहीं जा पहुंचता था।


जबकि बार-बार इर्विन का दिल उसे सचेत कर रहा था कि हीरे-जवाहरात से सज्जित चमगादड़ उसके लिए मनहूस है। इसलिए अच्छा हो कि इसे वापस रख आओ।


लेकिन अपने मन की आवाज को वह बार-बार उपेक्षित कर रहा था। वह भयंकर ख्वाब उसे अभी भी आ-आकर सता रहे थे। ख्वाबों के दौरान वह उसी मकबरे में जा पहुंचता और घुटन व खौफ में फंस जाता था। इसके बाद उसे अपनी सांस घुटने का आभास होता और उसकी नींद खुल जाती थी। जागने के बाद हमेशा उसे वह चमगादड़ खिड़की पर बैठा, खड़े कान और चमकीली आंखों के साथ घूरता दिखता था। इस रहस्यमय और डरावने पक्षी के विषय में उसे विश्वास हो गया था कि यकीनन वह पक्षी अवश्य ही प्रेतलोक से आया हुआ है। लेकिन फिर भी मकबरे से लाया चमगादड़ वह लौटाने को तैयार नहीं था।


प्रत्येक रात यही होता था। इसी डर के कारण सोने से भी अब उसे डर लगने लगा था। बिस्तर पर जाने से बचता फिरता था।


जब चमगादड़ के भयानक सपने के कारण वह घबराकर उठता था तो गला सूख चुका और सूजा गला पाता था। चैकअप कराने पर डाक्टर का एक ही जवाब होता था कि किसी जहरीले कीट ने काटा होगा।


एक दिन जब लार्ड इर्विन एक होटल में रुका और रात को सोया तो वह मनहूस विशाल चमगादड़ वहां पर भी आ पहुंचा और अपनी कर्कश जोरदार चीखों से होटल को दहलाकर रख दिया।


दिन निकलने पर जब उसकी देर तक नींद नहीं खुली तो वेटर ने जाकर उसे जगाना चाहा। लेकिन वह तो मरा पड़ा था। तुरन्त होटल प्रबंधन ने डाक्टर को बुलाया। उसने भी आकर हार्ट अटैक से उसका मरना घोषित कर दिया।


वेटर का कहना था कि उसने साहब के कमरे के दरवाजे-खिड़की अच्छी तरह बंद कराये थे। लेकिन सुबह सब खुले हुए मिले। इस पर वह हैरानी भी जता रहा था।


भले ही चमगादड़ कितना भी मनहूस या भयंकर था, फिर भी उसने इर्विन को अपनी भूल सुधारने का लगातार मौका दिया। पहले उसने एक-एक कर उसके साथियों की जान ली थी, और जब वह फिर भी नहीं चेता तो सबसे बाद में उसका अंत किया।


सारी चेतावनियों के बाद भी जब उसने वह कीमती चमगादड़ नहीं लौटाया, तो उसे जान गंवानी पड़ी थी।


लार्ड इर्विन शहजादी की कब्र खोद कर असलियत जानने आया था...और शहजादी अपना कटा हाथ वापस लाने के लिए बत्तीस सौ बरस आगे की यात्रा कर चुकी थी।


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