Kala Jadu Ki Story | काला जादू की स्टोरी: भयानक चीख

Kala-Jadu-Ki-Story-Bhayanak-Chikh-hindi-Kahani-Kale-black-magic

Kala Jadu Ki Story: Bhayanak Chikh
काला जादू की स्टोरी: भयानक चीख

बरायी वहीदा जागकर उठ बैठी।

रात आधी बीत चुकी थी। जाने वह कैसी भयानक चिल्लाहट थी कि सोते में सुनकर वहीदा की नींद खुल गयी। इस चीख ने जैसे उसके मस्तिष्क को सुन्न कर डाला। शरीर की सारी जान भी खत्म हो गयी थी।


बैठकर भी उसने सिर से रजाई उतारी नहीं थी। क्योंकि वह ऐसा साहस नहीं कर पाई थी कि कमरे में भी निगाह डाल सके और अनुमान लगा सके कि किधर से यह चीख आयी थी?


यह कोई संयोग नहीं था। वह बचपन से यह चीख सुनती आ रही थी। इस चीख के साथ संबंधित अनेक हादसे उसे आज भी जस-के-तस याद थे।


उसके कानों में जब कभी भी यह चीख की आवाज पड़ी, तभी किसी-न-किसी को प्राण गंवाने पड़े थे।


लेकिन!


आज यह चीख काफी लम्बे अरसे के बाद सुनी थी उसने। इससे संबद्ध कई किस्से उसने देखे थे और परिवार वालों तथा अन्य से इसके साथ जुड़े कई प्रकरण सुने भी थे।


कमरे में इस समय वहीदा के अलावा एक और भी शख्सियत थी और वह थी उसकी चचेरी बहन कामिया।


वहीदा ने उस चीख की आवाज को पहचान लिया था। यह आवाज कामिया की थी। वह ऐसे चीखी थी जैसे भूत देख लिया हो।


जान गयी थी वहीदा इस बात को कि आज रात उन दोनों में से किसी एक को तो दुनिया छोड़नी ही होगी।


वह चीख फिर से उसे सुनाई पड़ी। तब जैसे-तैसे हिम्मत करके वहीदा ने रजाई अपने सिर से उतार डाली।


कामिया कुछ समय के लिए वहीदा के यहां रहने के इरादे से आयी हुई थी। वहीदा को उसकी बुआ ने गोद लिया हुआ था। इसलिए वहीदा अपनी बुआ के घर पर ही रह रही थी।


यह आजादी तथा देश विभाजन से पहले की बात है। वहीदा की बुआ पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश के शहर ढाका की निवासी थी। पहले तो वहीदा और बुआ वहीं पर रहती थीं। लेकिन वहां के हालात बद से बद्तर होते चले गये तो वह दोनों पाकिस्तान में आकर रहने लगी थीं। यह अविभाजीत पाकिस्तान के समय की बात है। उस समय तक बांग्लादेश का निर्माण नहीं हुआ था।


आशंकित मन के साथ वहीदा ने कामिया के बिस्तर की ओर निगाह उठायी। भयंकर हाड़तोड़ सर्दी में कामिया बिस्तर पर पैर फैलाये बैठी थी। उसने दोनों हाथ से चेहरे को ढका हुआ था। कामिया को ऐसे बैठी देखकर वहीदा फिक्रमंद हो उठी। साहस कर उसने आवाज दी-"कामिया... ।"


लेकिन कामिया का उत्तर नहीं मिला।


खौफजदा होकर रजाई छोड़ वहीदा उठ खड़ी हुई तथा शॉल उठाकर ओढ़ते हुए उसकी तरफ बढ़ी।


उसी समय कमरे की खिड़की पर कुछ आवाज सी हुई। कमरे की यह खिड़की लॉन में खुलती थी। खिड़की के निकट लॉन में शहतूत का एक बहुत विशाल वृक्ष भी था। शहतूत की टहनियां खिड़की के शीशों से रगड़ खा रही थीं। इन टहनियों की परछाई लॉन में मौजूद बल्ब की कमजोर सी रोशनी के कारण भयानक से आकार में खिड़की के शीशों पर पड़ती थी।


टहनियां अभी भी हवा के झोंकों के साथ खिड़की के शीशों से खिलवाड़ कर रही थीं। लेकिन रात के इस प्रहर में उभरने वाली टहनियों की यह रगड़ भरी आवाज दिल में डर सा उपजा रही थी। जिस समय वह दस साल की छोटी बच्ची थी और बुआ के साथ ढाका में रहती थी, तब उसने यही आवाज सुनी थी।


बुआ की सबसे छोटी और आखिरी औलाद रईसा उस दिन वहीदा के साथ पास वाले बिस्तर पर बैठी हुई थी। रईसा ने भी उस दिन कामिया जैसी ही चीख मारी थी और सुबह होते-होते वह खत्म हो गयी थी।


रईसा की चीख से पहले भी दो और आवाजें सुनायी दी थीं। उन आवाजों के बाद बाहर तेज चीख की आवाज भी हुई थी। ऐसा लगा था कि रोती-बिलखती कोई औरत चीखती हुई दूर चली जा रही थी। रईसा उस दूर होती जा रही आवाज के साथ ही मर गयी थी। यह क्रम जाने कब से चला आ रहा था।


चांद की सत्ताइस तारीख को हर बरस सदा से यह आवाज होती रही है तथा इसके बाद कोई-न-कोई मरता आया है।


खिड़की पर जब टहनियों की रगड़ उभरने लगी तो वहीदा का रो-रोआं खड़ा हो गया। घबरा गयी। उसी समय"ठक...ठक।" कमरे के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी थी। दरवाजे पर दस्तक सुन वहीदा का दिल धड़क उठा था। सर्दी इतनी ज्यादा थी कि हाड़ कंपाये दे रही थी। लेकिन वहीदा का सारा शरीर पसीना-पसीना हो रहा था। किंतु फिर भी ठंड से उसके दांत किटकिटा रहे थे।


कामिया दरवाजे पर पड़ती दस्तक के बाद भी पूर्ववत बैठी हुई थी। उधर डर के कारण वहीदा का हाल बेहाल था। तभी कोई पुरुष बाहर से आवाज देने लगा- "बीबी. वहीदा बीबी।"


यह बुआ के मुलाजिम चांद की आवाज थी। वहीदा ने यह आवाज पहचान ली थी। चांद उसे ज्यादातर बीबी ही कहता था। जब कभी बुआ की शादी हुई थी, चांद तभी से उनके साथ रह रहा है। उस वक्त चांद करीबन बारह साल का रहा होगा।


बंगाल का यह बारह साल का लड़का इतना मेहनती व होशियार था कि उसकी चुस्ती-फुर्ती देख सब तारीफ कर उठते थे। अब वह एक पूरा जवान मर्द था, और बुआ के सब कामों के लिए भागा फिरता था।


बचपन से ही वहीदा को बड़ा तरस आता था चांद पर। इसीलिए अक्सर वह घर के कामों में भी मदद कर देती थी। उससे वह बातें भी करती रहती थी। अकेले होने पर चांद बहुत रोता था। 


“बीबी! इस भरी दुनिया में मेरा अपना कहने को कोई भी तो नहीं है...।" एक दिन आंखों में आंसू लिए चांद ने उससे कहा था।


इसीलिए वहीदा की कोशिश रहती थी कि वह उसके आस-पास बनी रहे। चांद उसकी शराफत का कायल था।


बाहर से चांद की आवाज सुनायी दी तो वहीदा को लगा कि मानो उसकी जान में जान आ गयी है।


जल्दी से आगे बढ़कर उसने दरवाजे की कुंडी खोल दी। कामिया ने चांद की आवाज सुनकर चेहरा ऊपर कर लिया था। उसका चेहरा डर से पूरी तरह जर्द दिखाई पड़ रहा था। आंखें भी वीरान सी हो रही थीं।


“कामिया, क्या बात है? कोई बुरा सपना दिखा है क्या तुम्हें?" हमदर्दी भरी आवाज में पूछती वहीदा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


कामिया ने इशारे से नकारते हुए गर्दन हिलायी। लेकिन भय से चौड़ी होती जा रहीं उसकी आंखें खिड़की पर ही थीं।


उसकी निगाहों का पीछा करती वहीदा और चांद की आंखें भी खिड़की पर जा टिकीं। शहतूत की भयावनी परछाईं शीशों पर पड़ रही थी।


एक नजर खिड़की की तरफ डालता हुआ चांद बोला- “ऐसा लगता है कामिया जी को इस दरख्त का साया डरा गया है...।"


कोई जवाब न देकर कामिया अभी भी लरज रही थी। वहीदा को वह डरी हुई नजर आ रही थी।


“कामिया बीवी के लिए मैं गरमागरम काफी बनाकर ला रहा हूं...।" कहता हुआ चांद वहां से निकल गया।


चांद काफी बेचैन था, वहीदा ने यह महसूस किया था।


थोड़ा वक्त ही लगा था कि कॉफी तैयार होकर आ गयी थी। चांद ने वहीदा और कामिया को एक-एक कप थमा दिया। दोनों लड़कियों ने कॉफी के चूंट भरते दिमागी तसल्ली देने वाले लहजे में चांद ने कहा-“बाहर मैं बाग की तरफ जा रहा हूं।


वैसे वहां कुछ भी नहीं है। एक बिल्ली जरूर थी...और उसे भगाकर आया हूं। ऐसा कीजिए कि आप अब सो जाइए।"

"क्या बात थी?" जब चांद वहां से चला गया तो उसके बाद वहीदा ने धीरे से पूछा।


“जाने कैसी भयानक चीख की आवाज सुनकर मेरी नींद टूट गयी थी। ऐसा लगा था कि मानो कोई औरत दर्द के मारे चिल्ला रही है। इसके बाद उसकी सिसकियां भी आ रही थीं। एकदम रजाई चेहरे से उठाकर नजर डाली कि कहीं तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया है। लेकिन तुम बेफिक्र नींद ले रही थीं। उसी समय मुझे दिखाई दी वह काली बिल्ली, जो खिड़की पर बैठी भयानक लाल आंखों से मेरी तरफ देखे जा रही थी। फिर वह वापस कूदकर चली गयी।


कामिया ने यह सब बताया तो वहीदा को याद कराने के लिए बहुत था कि सुबह होने तक उन दोनों में से एक इस दुनिया को छोड़कर जाने वाली है। इस बात पर उसे अब पूरा यकीन था।


मन-ही-मन में पछतावा करती वहीदा सोचने लगी कि मैंने कामिया को यहां पर न बुलाया होता हो ज्यादा बेहतर होता।


कुछ दिन के लिए बुआ करांची गयी हुई थी। वहीदा की शादी उन्होंने तय कर दी थी। यह शादी आगामी माह में होनी तय हुई थी। बुआ करांची अपनी भतीजी की शादी के लिए सामान खरीदने को गयी हुई और उन्हें उस दिन करांची से वापस आना था।

✥✥✥

आने वाली भयानक आवाजें कैसे प्रारभ हुईं, इस बारे में भी एक काफी पुरानी कहानी बताई जाती है।


अपनी जवानी में वहीदा की बुआ शवनम बड़ी खूबसूरत औरत थी और ढाका में वह जहां पर रहती थी, उस मौहल्ले के हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ रहते थे। शबनम के बराबर के मकान में एक हिन्दू लड़की थी। राजकुमारी। राजकुमारी के खूबसूरती का भी कोई जवाब नहीं था। उसका असली नाम तो राजकुमारी ही था, लेकिन चांद ने उसका नाम रोशनी रख दिया था। सब उसे रोशनी के नाम से ही पुकारने लगे थे। पड़ोस की यह हिन्दू लड़की राजकुमारी शबनम की बड़ी खास सहेली थी।


शबनम की खूबसूरती का जलवा दूर तक बिखरा था। राजकुमारी से उसकी पक्की दोस्ती थी ही। अक्सर वह राजकुमारी के साथ उसके मंगेतर सचिन के घर भी जाती रहती थी। वहां का माहौल बड़ा खुशगवार रहता था।


राजकुमारी को सचिन बहुत प्यार करता था। अपने भविष्य के लिए संजोयी अभिलाषाएं वह शबनम को भी बताता रहता था। राजकुमारी के लिए उसने दर्जनों जेवरात बनवा लिए थे।


राजकुमारी एक दिन शबनम को साथ लेकर जब सचिन के घर पहुंची तो वह अपने घर में अकेला ही मौजूद था। यूं भी उसके परिवार वाले बहुत खुली सोच वाले थे। जब भी वह दोनों वहां जाती थीं तो वह प्रसन्न होते थे और इज्जत भी पूरी देते थे। राजकुमारी के साथ यहां आकर शबनम इधर-उधर मजे से उठती-बैठती थी। उधर भावी पति-पत्नी आंखों-आंखों में प्यार का प्रदर्शन करते रहते थे। आने वाले जीवन का ख्याल करके हसीन सपनों का सृजन करते रहते थे। एक-दूसरे के दिलों की बात वह आंखों से ही जान लेते थे।


जब वह दोनों वहां पहुंची तो सचिन कोई पुस्तक पढ़ रहा था। उन्हें आया देख कर वह प्रसन्नता के साथ कहने लगा इस गीता में आज मैंने यह पढ़ा कि शरीर तो किसी वस्त्र की भांति है। लेकिन आत्मा एक वास्तविकता है। जब शरीर पुराना और बेकार हो जाता है तो आत्मा उसे छोड़ कर नया शरीर धारण कर लेती है। इससे तो यही हुआ राजकुमारी कि मृत्यु के पश्चात भी हम अलग नहीं होंगे। लेकिन तुम यह प्रयास अवश्य करना कि दूसरे जन्म में भी तुम इसी स्वरूप में रहना, जिससे तुम्हें पहचानने में मुझे कोई परेशानी न उठानी


"शरीर बदलने से कोई अन्तर नहीं पड़ता है। आत्मा स्वयं ही आत्मा को पहचान लेगी। लेकिन एक बात तुम भूल रहे हो कि हमारे कर्मों के फल के रूप में अगले जन्म में हमें जाने कौन सा शरीर प्राप्त होगा?" दिलकश मुसकान के साथ राजकुमारी ने कहा।


"देखो, दुनिया में सबसे बड़ी तपस्या प्यार है और यदि ईश्वर का विधान अटल है तो हम क्योंकि प्यार करते हैं। इसलिए तपस्या का सफल हमें जरूर प्राप्त होगा।


जन्म-जन्मांतर तक हम दोनों तो इसी रूप में ही पैदा होंगे। ईश्वर न करे कि हमसे ऐसा कोई पाप हो जाये कि मानव शरीर के स्थान पर हमें किसी पशु अथवा पखेरू के रूप में जन्म लेना पड़े।"


हंसते हुए शबनम बोली-“आमीन।"


प्यार के साथ सचिन ने राजकुमारी का हाथ थामकर शबनम को भी पीछे आने का संकेत करते हुए कहा-“चलो...कुछ दिखाता हूं।"


उन दोनों को लेकर वह भीतर के कमरे में पहुंचा। कमरे के कोने में एक तिजोरी धरी थी। सचिन ने तिजोरी में से मखमल मढ़े हुए लाल रंग के बड़े खूबसूरत डिब्बे निकाले और कह उठा खोलना जरा इसको...।" 

"तुमने फिर जेवर खरीदे?"

“कह तो ठीक रही हो तुम। तुम्हारे लिए मैं एक सोने का ताज व सतलड़ा हार भी खरीदकर लाया हूं। मेरा दिल कल से ही पुकार रहा है कि यह दोनों जेवर पहनाकर तुम्हें देखू। एक काम करो...तुम जल्दी से यह दोनों आभूषण पहन कर मुझे दिखाओ। जिससे मैं इन जेवरों के साथ तुम्हारे खूबसूरत शरीर को निहार सकू।"


राजकुमारी ने सचिन की बात सुनी और हंसते हुए बोली-“क्या कहते रहते हो तुम? यदि कोई आ गया तब... "


“अरे, दो-दो जोड़ी कर्णफूल पहनने का इरादा है क्या? अच्छा अपने जेवर पहनकर तू तो सचिन को दिखा और मैं भी तब तक कुछ जेवर पहन कर अपनी खूबसूरती के बारे में आइने से पूछ लेती हूं...।" मुंहफट शबनम ने अपनी सहेली राजकुमारी से कहा।


कान में झुमके, गले में हार, चम्पाकली, हाथों में अंगूठियां आदि डिब्बों से निकाल कर शबनम ने पहनना शुरू कर दिये।


तभी राजकुमारी के हाथ में टीका आ गया। तब मजाक-मजाक में उसने वह टीका चुपके से शबनम के माथे पर लगाना चाहा। इस कोशिश में शबनम के घने काले और लम्बे बाल बिखर गये। क्योंकि चुटिया खुल गयी थी।


उसी समय अपने बालों को झटकती हुई शबनम ने शराती ढंग से घूम कर राजकुमारी की तरफ मुसकरा कर देखा।


जाने वह कौन सा लम्हा था जब उसे देखकर राजकुमारी ने तारीफ की थी और सचिन का दिल तेजी से धड़क उठा।


प्रशंसात्मक भाव के साथ राजकुमारी ने शबनम को निहारा और अपने हाथ में पकड़ा सोने का मुकुट उसके सिर पर टिका दिया। सचिव ने देखा तो वह शबनम का ही होकर रह गया।


आसमान से जैसे कोई परी उतर आयी हो, शबनम ऐसी दिख रही थी। उसने सचिन की आंखों की भाषा पढ़ ली थी। लेकिन बजाये इसके कि वह दूरी बनाने की कोशिश करती, वह भी उसकी आंखों में डूब गयी। दोनों बिना कुछ बोले आंखों में जैसे सब कुछ कह गये।


शबनम ने यह भी ख्याल नहीं किया कि सचिन राजकुमारी का होने वाला पति है और राजकुमारी उसकी सबसे प्यारी सहेली है।


उन दोनों की आंखों-आंखों में होने वाली वार्ता राजकुमारी से छुप नहीं सकी। चुपचाप सब जेवर उतार कर उसने वहीं रखे और बाहर की तरफ चल पड़ी। अपनी हरकत छुपी न रहने का अंदाज शबनम को भी हो गया था। तुरंत ही जेवर उतार कर वह बोली-“रुक, मुझे अकेली छोड़ेगी क्या?"


राजकुमारी का दिल भर आया था। वह उदासी भरे स्वर में बोली-“अकेली तो मैं हो गयी हूं शबनम...।" चाहती तो अपनी भूल शबनम उसी वक्त सुधार लेती। किन्तु ऐसा कुछ भी उसने नहीं किया। सचिन भी बचपन के प्यार को भुला बैठा। दोनों एक-दूसरे को प्यार भरी नजरों से देखते रहे।


राजकुमारी ने उस दिन के बाद सचिन और शबनम से वास्ता ही खत्म कर लिया। उन दोनों ने भी इस बात की कोई परवाह नहीं की। अब सचिन ने शबनम के घर आना जाना बढ़ा दिया। चतुराई से काम लेते हुए उसने शबनम के बड़े भाई को भी दोस्त बना लिया। कुछ दिन बाद जब उसके भाई की शादी हुई तो उसमें भी सचिन ने पूरे जोश के साथ शिरकत की। शबनम का शबाब भी गजब ढा रहा था। शादी से राजकुमारी ने पूरी तरह दूरी बनाये रखी।


समय गुजरता गया और सचिन का शबनम के साथ प्यार गहरा होता गया। दोनों के संबंधों की चर्चा फैल गयी थी। घर से बाहर तक मानो तूफान खड़ा हो गया। तब सचिन ने भी स्पष्ट कर दिया कि चाहे भले ही उसे मुसलमान बनना पड़े, लेकिन वह शादी शबनम के साथ ही करेगा।


खूब हाय-तौबा मची। आखिर दोनों की शादी तय कर दी गयी।


लेकिन ऐन उन दोनों की शादी वाले दिन ही राजकुमारी ने जान दे दी। तब उन दोनों की शादी चालीस दिन के लिए आगे खिसका दी गयी।


जैसे-तैसे चालीस दिन पूरे हो गये। तय तारीख से ठीक एक दिन पहले, जब जोर-शोर से दोनों घरों में शादी की तैयारियां चल रही थीं। रात के दो बजे थे कि जाने कहां से एक औरत के चीखने की आवाज सुनी गयी। बड़ा दर्द था उस चीख में। इसके बाद सिसकियों की आवाजे आने लगीं।


यह चीख सुनकर आस-पास के सभी लोग दहल उठे थे। प्रातः होने पर जब सचिन को जगाने की कोशिश की गयी तो वह मुर्दा पड़ा हुआ था। डाक्टरों ने देख परख कर हार्ट अटैक से मौत होना बताया।


लेकिन सचिन की मां ने कहा कि यह हार्ट अटैक नहीं है, बल्कि राजकुमारी की आत्मा का कहर है।


बिलखते हुए उसने सबके सामने कहा-“राजकुमारी की मौत होने के अगले दिन से ही एक काले रंग की बिल्ली उनके घर में रहने लगी थी। उस बिल्ली को देखकर मां बड़ी डर उठती थी। उसने कई बार बेटे को समझाना भी चाहा था कि वह अपना फैसला बदल दे और शबनम से शादी न करे। लेकिन वह नहीं माना और जिसका डर था, वही होकर रहा।


हैरत वाली बात यह कि सचिन के मरने के बाद वह बिल्ली कभी नहीं दिखी। उधर इस मामले से शबनम के खानदान की बड़ी बदनामी हुई।


अपने भाई के साथ वह मौहल्ला छोड़कर शबनम धान मंडी इलाके में आ गयी। उसका भाई एक ठीक सी नौकरी भी करता था। वह न तो कोई रईस था और न किसी प्रकार गरीब था।


शबनम के भाई ने एक बरस बाद उसकी शादी अपने एक गहरे दोस्त के साथ कर दी।


धान मंडी आबादी अभी बसनी ही शुरू हुई थी। जहां घने जंगल भी थे। शबनम के भाई के दो बेटे भी हो गये थे।


उस दिन चांद की सत्ताइसवीं तारीख थी। तब शबनम का निकाह हुआ था। शबनम की विदाई हो चुकी थी, घर के लोग व मेहमान अभी सो भी नहीं पाये थे कि कहीं से किसी औरत की दर्दभरी चीख और फिर सिसकियां आने लगीं। एक काली बिल्ली खिड़की के शीशे पर पंजे मारती दिखाई दी। चन्द लम्हों के लिए बुलन्द हुई वह चीख और सिसकी फिर बन्द हो गयी।


अगली सुबह घर में हाहाकार मचा था। शबनम के भाई का बड़ा बेटा चारपाई पर मरा पड़ा था। 


शबनम भी अपनी शादी का साल पूरा होते-होते एक बच्चे की मां बन गयी थी। धीरे-धीरे वह बच्चा एक साल का हो गया। बच्चे की सालगिरह पर नाते-रिश्तेदार भी आये हुए। आज चांद की सत्ताइसवीं तारीख थी। हंसी-खुशी के माहौल में सब सो गये।


आधी रात के समय अचानक सबकी नींद खुल गयी। जंगल की तरफ से आयी जानी-पहचानी चीख से सब लोग जाग उठे थे। डर से मानो सबकी सांस रुक रही थी।


शबनम की सास ने अपने पोते को गोद में समेट लिया। सबकी नींद उड़ चुकी थी। सुबह तक सब जागते रहे। लेकिन घर में तब रोना-पीटना शुरू हो गया, जब शबनम के भाई का बेटा मरा हुआ मिला।


शबनम के भाई के दोनों बच्चे दो साल में अल्लाह को प्यारे हो गये थे। जिनकी मां यह सदमा सहन नहीं कर पायी थी। उसकी तबियत खराब रहने लगी और उसका दिमागी संतुलन भी खराब हो गया।


बड़े से बड़े डाक्टर को दिखाकर उसका इलाज कराया गया। लेकिन फायदा नहीं हुआ। पीर-सयानों की भी हाजिरी लगायी गयी। उन सबने बताया कि वह जल्द ही ठीक हो जायेगी और उसे बच्चा भी होगा तथा बड़ी उम्र पायेगा।


इसके दो साल बाद शबनम की भाभी को बेटी पैदा हुई। जिसका नाम मुमताज रखा गया।


मुमताज अभी साल भर की ही हुई थी, फिर चांद की सत्ताइस तारीख आ पहुंची और मुमताज को उसकी अम्मी बेसहारा छोड़ चल बसी। इससे उसके अब्बू को बड़ा सदमा पहुंचा था।


अपनी बेटी को साथ लेकर मुमताज के अब्बू खुलना चले गये। बेटी की जान की सलामती के लिए उसे जाने कितने ताबीज पहनाये गये थे।


शबनम के भाई को पक्का यकीन हो चुका था कि वह घर-परिवार पर किसी बुरी रूह के इंतकाम का निशाना बन गया है। वह बुरी रूह एक काली बिल्ली के रूप में घूम रही है।


क्योंकि जब उसकी बीवी का इंतकाल हुआ था तो उस दिन भी चांद की सत्ताइसवीं तारीख को वह काली बिल्ली दिखाई दी थी।


यहां रहते उन्हें तीन साल हो गये थे। उधर इस दौरान शबनम के तीन बच्चे हो चुके थे और सही-सलामत थे।


एक दिन रात के ठीक दो बजे शबनम लरज कर जाग पड़ी, क्योंकि उसने वही भयानक चीख और उसके बाद दर्द भरी सिसकियां सुनी थीं। इन चीख और सिसकियों के बाद बड़ी दहशत छा जाती थी। सबको पता था कि इस चीख और फिर सिसकियों की आवाज के बाद क्या होता है? तय था कि परिवार में सुबह होते ही कोई भी सदस्य सबसे दूर चला जायेगा।


शबनम ज्यादा ही खौफजदा हो उठी थी। अपने तीनों बच्चों को उसने पहलू में दुबका लिया। रात भर जागकर वह नमाज में झुकी रही।


दिन निकला। तीनों बच्चे तो सलामत रहे, लेकिन शबनम का शौहर उनसे दूर हो चुका था।


पति के मरने के बाद उस घर को शबनम ने छोड़ दिया। वह रहने के लिए केलाबागान में आ गयी थी। यहां नये घर में उसने सबसे पहले कुरान पढ़वाई, नियाज करायी और सदका भी दिया।


पहले ठिकाने पर जहां अच्छी खासी रौनक थी तो नये घर के इलाके में एकदम वीरानी सी पसरी थी। शाम होते-होते वहां पर जाने कैसी उदासी का माहौल हो जाता था। शबनम की आमदनी का जरिया उसका धानमंडी का घर था, जहां से उसे हर महीने का किराया मिलता रहता था।


विधवा होने पर शबनम को उसका भाई मदद देता रहता था। इसके बावजूद भी घर का किराया, तीनों बच्चों का खर्चा ऐसा था कि गुजारा मुश्किल से ही चल पाता था। एक पुराने जानकार ने एक दिन शबनम को पटसन के एक कारखाने में नौकरी दिलवा दी। जिससे उसने राहत महसूस की।


लेकिन अब यह परेशानी आ खड़ी हुई कि उसके दो बेटे और एक बेटी को उसके काम पर जाने के बाद कौन सम्भालेगा?


शबनम और उसका भाई बैठे इसी पर माथा-पच्ची कर रहे थे कि तभी बाहर दरवाजे को किसी ने खटखटाया और एक करीब बारह साल का बंगाली लड़का सहमा हुआ सा भीतर आ गया। चांद नाम बताया था उसने अपना।


शबनम को उससे मिलकर बड़ी तसल्ली सी हुई। सामने आते ही चांद की आंखों में आंसू भर आये "बड़ी उम्मीद लेकर आपके पास आया हूं। इस जहान में मेरा कोई नहीं है। जाने कितने दरों पर दस्तक दी, लेकिन कोई आसरा देने को तैयार नहीं है। न पेट भरने को दाना है, न सोने का ठिकाना ही। बस सिर छिपाने को जगह दे दें और दो जून खाना चाहिए। मुझे अपनी पनाह में ले लें। इस अहसान के बदले आपके घर का काम, सब बच्चों की देखभाल का काम करता रहूंगा। मेरी उम्मीद न तोड़ देना... ।"


जिस परेशानी से उस समय शबनम जूझ रही थी, चांद के रूप में अल्लाह ने उसका निदान भेज दिया था। उसके मन में कुछ पलों के लिए एक अलग सा अहसास भी जागा था। लेकिन उस अहसास को शबनम ने महज वहम मानकर उड़ा दिया।


बस दो दिन में ही चांद सबका चहेता बन गया था। घर की देखभाल व बच्चों का ख्याल वह मेहनत से करने लगा। शबनम बेफिक्र काम पर जाने लगी।


लेकिन जाने क्या बात थी कि चांद की आखिरी तारीखों में चांद परेशान सा दिखने लगता था। बाहर भीतर वह चकराता रहता था। शबनम ने एक दिन इस बारे में उससे पूछ भी लिया था कि आखिर क्या बात है?


"कुछ नहीं...बस अंधेरे से डरता हूं। अंधेरी रातें बड़ी डरावनी होती हैं ना...।" साधारण अन्दाज में चांद ने जवाब दिया। अंधेर भरी एक ऐसी ही रात में चांद को उसने सामान लेने बाजार भेजा था।


शाम से ही खामोशी पसरी थी। वैसे भी शबनम घर में अकेली थी। काफी देर हो गयी थी और चांद वापस नहीं आया था।


शबनम के शौहर का इंतकाल हुए तीन बरस जा चुके थे। उस दिन जैसा खौफ फैला था, करीब-करीब आज भी कुछ बिलकुल वैसा ही माहौल था। अकेले में शबनम का जी डरता था। पेड़ का कोई पत्ता भी अगर खड़खड़ की आवाज करता था तो वह डर से दहल रही थी। चांद घर में होता था तो ढांढस रहता था।


आधी से ज्यादा रात बीत गयी थी और चांद का सुनगुमान भी नहीं था। आखिर उसने दरवाजा बंद कर लिया और बच्चों के साथ लेट गयी।


बांग्लादेश तथा पूर्वी पाकिस्तान में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बड़े-बड़े पेड़ और खेत दिख जाते हैं। आम पेड़ों की तरह जगह-जगह नारियल के पेड़ भी मौजूद होते हैं । यहां जितना ज्यादा पानी है, उतने ही जंगल व हरियाली है।


एक-एक करके सब बच्चे सो गये थे। खिड़की के मैले शीशों पर पेड़ की परछाईं नृत्य कर रही थी। तगड़ी ठंड की वजह से पसरी खामोशी... । शबनम के घर के पिछवाड़े एक घने जंगल सरीखा बड़ा बाग भी था। उस बाग में दूर-दूर तक नारियल और केले के दरख्त लगाये गये थे। एक तो अकेली होने का अहसास और फिर तेज अंधड़ का शोर. इन सबसे शबनम का मन घबरा रहा था। वह डर रही थी।


अचानक ऐसी आवाज कानों में पड़ी कि जैसे खिड़की के शीशे को कोई जानवर खरोंच रहा है। धड़कते दिल से वहां निगाह डाली तो शबनम घबरा गयी।


वहां एक काली बिल्ली लाल-लाल आंखों से शबनम को बड़े खा जाने वाले ढंग से देखे जा रही थी। शबनम ने जो बिल्ली अपने शौहर के इंतकाल के वक्त देखी थी, यह भी बिलकुल वैसी ही थी।


उसका दिखना यानी किसी का दुनिया से जाना।


लरज उठी शबनम । फिर भी हिम्मत करके वह उठी और उसे धमकाते हुए खिड़की की तरफ चली।


यह देख बिल्ली वहां से कूद कर गायब हो गयी। लेकिन उसके फौरन बाद ही जानी पहचानी वही भयानक चीख गूंज उठी और दर्द से गुजरती किसी औरत की सिसकियों की तेज आवाज भी आने लगी।


मौहल्ले के हर शख्स ने खामोशी में गूंजी वह मनहूस चीख सुनी थी। उस चीख के बारे में सबको शबनम ने बता तो रखा था। लेकिन यहां पर रहते हुए उसे दो साल हो गये। लेकिन अभी तक ऐसा कोई हादसा यहां पेश नहीं आया था। मौहल्ले वालों ने भी इसीलिए कोई खास गौर नहीं किया था। लेकिन जब यहां के लोगों ने भी उसे सुना तो चुपके से दरवाजे अच्छी तरह बंद कर सो गये।


चीख कानों में पड़ते ही खौफजदा शबनम होश खोकर गिर पड़ी थी। सुबह उसे झंझोड़ते हुए चांद ने उठाया था।


"रात तुम कहां रह गये थे चांद?" कहती हुई शबनम पलंग पर सोये हुए बच्चों की ओर झपटी। घबरायी शबनम ने अपनी बेटी सोहा को झंझोड़ते हुए आवाज देकर जगाया"सोहा सोहा।"


गहरी नींद में गाफिल सोहा आंखें मलती हुई जाग कर बैठ गयी। अब शबनम उससे हटकर अपने बेटों की तरफ लपकी और उन्हें भी जगाना चाहा तो वह हिले भी नहीं। दोनों उससे बहुत दूर जा चुके थे।


बेटों की लाशें देखकर शबनम जोरों से रोने लगी। आवाज सुनकर मुहल्ले भर के लोग वहां आ पहुंचे। डाक्टरों को भी बुलाया गया। चांद हर बात के लिए दौड़ रहा था। शबनम की हालत पागलों जैसी हो चुकी थी। कई दिन उसे अपना भी होशोहवास नहीं रहा था।


यह खबर पाकर शबनम का भाई भी अपनी बेटी को लेकर वहीं आ पहुंचा। दो महीने वह यहीं बना रहा। अब उसे सूझ नहीं रहा था कि क्या करे! उधर नौकरी और यहां पर बहन-भांजी। वहां ऐसी जगह नहीं थी कि बहन-भांजी को भी साथ रख सके। सोहा और अपनी बेटी वहीदा की पढ़ाई का वहां इंतजाम भी मुश्किल था। वह उन दोनों को पढ़ाने की भी तमन्ना रखता था।


भयानक चीख का खौफ सारे मुहल्ले में पसर गया था। शबनम तो हवा की सरसराहट से भी कांप उठती थी।


समय के साथ सब सामान्य होने लगा। वहीदा और सोहा आपस में खूब हिलमिल चुकी थीं। आखिर शबनम और बच्ची की पढ़ाई का ख्याल करते हुए उसके भाई ने फैसला किया कि वहीदा भी अब यहीं रहेगी।


"देखो शबनम, जो लिखा है, वह तो होकर रहना है। मौत के आगे हम सभी मजबूर हैं। मैं नहीं जानता कि काली बिल्ली और वह भयानक चीख तथा सिसकियां क्या हैं? फिर भी मैं कोशिश करूंगा कि किसी पीर फकीर से इस बावत बातचीत कर मालूम करूं कि आखिर यह मनहूस आवाज आखिर हमारे ही पीछे क्यों पड़ी है? कहीं और यह क्यों नहीं आती? जरूर यह कोई बुरी रूह है।” भाई ने कहा।


गमजदा हुआ चांद भी उस वक्त वहीं पर बैठा हुआ था, जब दोनों भाई-बहन बात कर रहे थे।


कुछ दिन वहां पर रहकर भाई वापस चला गया।


अब्बू के जाने के बाद वहीदा वहीं पर रह गयी। उसकी उमर तब रही होगी कोई सात बरस । वहां रहने वाले चांद की उमर कोई पन्द्रह बरस थी। चांद को काम करते देख वहीदा को तरस आता था कि वह इतना काम करता था। 

इतनी छोटी बच्ची काम अपने आप ही कर लेती थी। कपड़ों को सहेज कर रखना, जूते दीवार के सहारे रख देना, खाने व चाय के बर्तन बावर्चीखाने में ठीक से लगाना। ऐसे सब काम वह करती फिरती थी। सोहा के सोने या कहीं पड़ोस में चले जाने पर वह चांद के पास जा पूछती


"मैं आपका हाथ बंटा दूं चांद भाई...।" पहले पहल तो चांद उससे कटा-कटा सा रस्मी वास्ता रखने तक ही रहा। लेकिन जब वहीदा पूछती ही रहती थी कि उसने चाय पी या नहीं। खाना खाया या नहीं बल्कि अपने हिस्से का खाना भी उसे दे देती थी। यह सब देखकर चांद का रवैया बदलने लगा।


वहीदा के लिए वह आहिस्ता-आहिस्ता सहज होता गया। उससे वह बातें भी करने लगा था। वह उससे कहती रहती थी..."नारियल तोड़िए चांद भाई...।" "नारियल की मिठाई बनाइए चांद भाई...।" "चांद भाई, आपको थकान हो गयी होगी...अब सो जाइए।"


चांद उसकी बात सुनकर मुसकराता रहता था और उसकी हर फरमाइश को पूरा करने में लगा रहता था।


“आप कैसे कपड़े पहनेगें चांद भाई?" ईद पर वहीदा ने पूछा।


"तुम्हारे लिए मैं कपड़े और चूड़ियां दिलाऊंगा, कपड़े बच्चे पहनते हैं...।” उसे कुछ देर देखने के बाद चांद ने कहा।


सुनकर वहीदा खुश हो उठी और यह बात उसने सोहा को भी बतायी तो वह आंखें सिकोड़कर बोली-"चांद मुझे तो भाता नहीं है।..."


तब वहीदा ने कहा-“उससे तुम ही ठीक बर्ताव नहीं करतीं।"


चांद एक दिन बातों-बातों में बोला कि वहीदा तो कोई राजकुमारी सी दिखती है। जैसे ही राजकुमारी शब्द शबनम के कानों में पड़ा तो वह एकदम खौफजदा हो उठी। एकदम उसने चांद से कहा कि यह नाम मुसलमानी नहीं है। तब चांद ने कुछ ऐसे अन्दाज में उसे देखा कि शबनम की आंखें झुक गयीं।


वक्त बीत रहा था।


“अच्छा बताओ, सबसे ज्यादा तुम्हें कौन पसन्द है?” बातों-बातों में एक दिन चांद ने वहीदा से सवाल किया।


"आप और सोहा...।" उसने तपाक से जवाब दिया था। सहज भाव से चांद ने पूछा-“दोनों में ज्यादा किसे?" "सच में तो बस तुम।" "फिर सोहा को कैसे कहा?"


“अपने अब्बू के पास तो मैं अकेली थी ही। सोहा के बिना फिर यहां भी मैं अकेली रह जाऊंगी। वह भी मेरी प्यारी सहेली है।"


“तुम सीधी सच्ची और मासूम बच्ची हो। मैं समझता हूं कि तुम किसी से कैसे फरेब नहीं करोगी। मैं बस तुम्हें ही प्यार करता हूं।"


मानो सब कुछ समझ गयी हो, इस अन्दाज में वहीदा ने सिर हिलाया। जब कि उसके कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था। “अच्छा मुझे काम भी करना है। चलो यहां से टलो।" एक मीठी झिड़की देते चांद ने कहा।


ऐसे किसी मौके पर भी वहीदा वहीं पर डटी रहती थी और उसके कामों में दखल देती रहती थी।

“जाकर खेलो। देखो...तुमने सारा काम बिगाड़ दिया है।" उदासी भरे लहजे में चांद ने कहा।


चांद की भर आयीं आंखों को वह देखती ही रह गयी। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया था।


आज फिर चांद का दिमाग तनाव से भरा था। वह अंदर-बाहर चक्कर काट रहा था। शबनम का दिल भी बैठा जा रहा था। वह थोड़े-थोड़े वक्त के बाद आसमान को देख रही थी। चांद शाम के वक्त घर से बाहर निकलने लगा तो जल्दी से शबनम ने कहा-“आज चांद की सत्ताइसवीं तारीख है। घर में ही रहो चांद। डर लग रहा है...


बाहर जाते चांद ने शबनम की तरफ जाने कैसी निगाह डाली। फिर वह बोला "फिक्र न करें। कुछ नहीं होना है। मुमताज भी यहीं है। मुमताज और सोहा को साथ-साथ बिठाये रखें।"


शबनम को एहसास हुआ कि आज शायद वहीदा का नम्बर न आ जाये। उसने वहीदा को गोद में छुपा लिया और रात भर आयतें पढ़ती रही।


रात चैन से बीत गयी। बल्कि सभी रातें ऐसे ही जाने लगीं।


धीरे-धीरे पन्द्रह साल गुजर गये थे। इस दौरान वह भयानक चीख कभी भी नहीं सुनाई दी। सोहा और वहीदा बी.ए. कर चुकी थीं। सोहा ने तो आगे पढ़ने से तौबा कर ली। लेकिन वहीदा यूनिवर्सिटी चली गयी।


इकराम नामक एक युवक से वहीदा के ताल्लुकात बनते चले गये। वह बड़ा जहीन लड़का था। वह दोनों एक-दूसरे के इतने पास आते चले गये कि उन्होंने शादी का फैसला भी कर डाला।


आज तक भी चांद उसी घर में मौजूद था। बल्कि एक समझदार मर्द हो चुका था। अभी भी उसकी वहीदा से वैसी ही समझ चली आ रही थी। वहीदा उसे अपने दिल की हर बात बता देती थी और चांद भी उसे जरूरी बात पर ही मशवरा देता था।


ऐसे तो वह हर बात सोहा को भी नहीं बताती थी। इकराम के बारे में सुनकर चांद पहले तो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने पूछा-“वह तुम्हें वाकई चाहता है?"


उसने हां में गर्दन हिलायी। "धोखा तो नहीं देगा?" "अरे, नहीं।" उसकी आवाज में विश्वास भरा था। “अपने बारे में क्या कहती हो?" वहीदा सब बातें भूलकर हैरानी से उसे देखने लगी। क्योंकि चांद की आवाज में उदासी और आंखों में ऐसी ही वहशत दिख रही थी।


"आपने भी किसी से धोखा खाया है चांद भाई?" वहीदा ने पूछा। “अभी कुछ नहीं बताऊंगा।" "भला क्यों?" “क्योंकि अभी मुनासिब वक्त नहीं है। अभी तो इकराम को परख कर देखूगा मैं। इसके बाद तुम्हें बताऊंगा कि वह इस लायक है कि या नहीं...और फिर आगे जैसे तुम्हारी मर्जी होगी तुम जानो।"


चांद अभी तक इकराम से मिल भी नहीं पाया था कि सोहा ने शबनम को सब कुछ बता डाला।


पता करने पर इकराम और वहीदा के बीच जाति का फर्क निकला। शबनम ने फौरन अपने भाई को बुला भेजा। इकराम के अपने से नीची जात का होने की बात अपने भाई से ज्यादा शबनम उठा रही थी।


शबनम ने वहीदा को डांटा तथा इकराम को बुरा-भला कहने लगी। उनके हर कोसने पर चांद भी उनकी तरफ नफरत से देखता था।


इकराम से शादी पर वहीदा ने जोर दिया तो अब्बू और बुआ दोनों उसके आड़े आ गये। सोहा भी वहीदा के खिलाफ हो गयी।


यह बात जब इकराम के बाप ने जानी तो कह दिया कि ऐसी शादियां तो बेशर्म लोग करते हैं। यहां तक कि उनके खिलाफ जाकर शादी करने पर उन्होंने जान तक ले लेने की धमकी भी दे डाली।


वहीदा दिन भर पड़ी रोती रहती। रात भी ऐसे ही गुजरती थी। खाना-पीना भी उसने त्याग दिया था। चांद उसे हिम्मत देता-“देखो, कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। कुछ परेशानियों के बाद जिंदगी बढ़िया गुजरेगी।"


"इकराम से शादी करने के एवज में आखिर मुझे क्या खोना होगा, चांद भाई?" वहीदा ने दुखी स्वर में पूछा।


“तू तो सिर से पैर तक मुहब्बत का एक बुत है, तेरी शादी इकराम से ही होनी है। उसके साथ मुहब्बत का तुझे ठीक सिला मिलेगा। तेरे दिल में पल रही पाक मुहब्बत तुझे जीवन की नियामतें बख्शेगी। बचपन से बड़ी मासूम पाया है मैंने तुझे। मैं कैसा बेचैन हूं, तुझे शायद बता नहीं पाऊंगा। मैं तेरी मुहब्बत में लम्बे वक्त से इंतजार कर रहा था। उसी का कायल होकर मैंने बहुत इंतजार किया है। खैर...तेरा भला ही होगा।" वहीदा को उसने भरोसा दिया।


अक्सर चांद की उदासी और समझ में न आने वाली उसकी बातों से वहीदा परेशान हो जाती थी।


इकराम और वहीदा दोनों के अब्बू में तकरार शुरू हो गयी थी। कैसे भी मामला सुलझ नहीं रहा था।


एक रात अचानक सोहा जोर से चिल्लाई तो वहीदा उठ बैठी। वह चीखें तो बीती बात हो चुकी थीं।


इस बारे में वहीदा के अब्बू का कहना था कि एक पहुंचे हुए बुजुर्ग से उन्होंने ताबीज पढ़वाया था और उस ताबीज की बरकत से हमेशा के लिए उस आफत से छुटकारा मिल गया था।


लेकिन आज सोहा की चीख गूंजी तो बीती भूली याद ताजा हो गयी। वह अपने दोनों हाथों में चेहरा छुपाये बैठी थी। वहीदा ने पास जाकर सोहा को झकझोर दिया। डरी-डरी सोहा खिड़की की तरफ देख रही थी। वहीदा ने भी वहां नजर डाली तो उसे। काली बिल्ली लाल आंखों से देखती दिखी, जिसे वह बचपन में देख चुकी थी।


"यह बिल्ली वह नहीं है। यह तो बचपन की घटना का कारण है। जिसकी याद वह इस बिल्ली को देख डर गयी है।" वहीदा ने उसे समझाना चाहा।


लेकिन...।


उसी समय दिल हिलाने वाली वही पहचानी हुई चीख हुई और फिर सिसकियों में गूंजने लगी। बिल्ली खिड़की से गायब हो गयी थी। सिसकियां धीरे-धीरे बन्द हो गयीं। माहौल भयावना था। चेहरा हाथों में लिए सोहा पीछे लुढ़क गयी।


उस मनहूस दर्दभरी चीख और सिसकी से भी भयानक ढंग से वहीदा चीखने लगी। उसके शरीर में जैसे जान नहीं रही थी। उसकी चीख-पुकार सुन दूर-दूर तक लोग घरों में और रजाई खींचकर दुबक गये वहीदा की चीख-पुकार पर बदहवास अब्बू व शबनम भी कमरे में भागे चले आये।


पीछे को लुढ़की सोहा पर नजर पड़ते ही शबनम भी बेहोश हो गयी। उसकी यही दौलत तो बची थी और उस मनहूस चीख ने उसे भी अपने पास बुला लिया। वहीदा पहले ही हिम्मत छोड़ बैठी थी। उसके अब्बू भी जर्द चेहरा हो गये।


दिन निकला तो सोहा का कफन-दफन किया गया।


वहीदा के अब्बू ने अजमेर शरीफ की जियारत का फैसला किया। लेकिन रास्ते में नाव डूबने से वह भी हमेशा के लिए चले गये।


दुनिया में वहीदा के एक ही तो सरपरस्त थे अब्बू। वह भी चले गये। यह खबर मिली तो वह मानो अंधेरे में खोती चली गयी। दुनिया में अब वह बिलकुल अकेली रह गयी थी।


चांद की ही यह हिम्मत थी कि वह वहीदा को हिम्मत बंधाता रहता था। जिस से उसे सहारा मिलता था।


छः माह बीतते-बीतते इस हादसे के बाद एक और हादसा हो गया। इकराम के वालिद के इंतकाल की भी खबर आ गयी। उन्हें हार्टफेल हो गया था। यह सब सुना तो शबनम ने बिलकुल खामोशी अख्तियार कर ली। पलभर के लिए भी वह वहीदा को अकेली नहीं रहने देती थी।


“आपको क्या हो गया है चांद भाई?" फीकी मुसकान होठों पर लिए चांद ने वहीदा की शिकायत के जवाब में कहा


“यह मारे-मारे फिरने के थोड़े से दिन और हैं। इसके बाद हो सकता है कि मुझे भी सुकून आ जाये।"


“खोई चाहत मिल गयी है क्या भाई जान?" 

“खोये हुए फिर नहीं मिल पाते हैं वहीदा... "


"चांद, पता नहीं कि आजकल तुम कहां चले जाते हो? यहां वहीदा तन्हा हो जाती है। अगर इसे भी कुछ हो गया तो शिकवा भरी चेतावनी थी शबनम की आवाज में।


“वहीदा को कुछ नहीं होगा। समझीं आप?" चांद की आंखों में जाने कैसा गुस्सा झलक उठा था, जब उसने जवाब दिया।

उसके इस अंदाज से जहां वहीदा ठगी सी रह गयी थी, तो शबनम भी कुछ डर सी गयी।

✥✥✥


पड़ोस में रहने वाले एक बुजुर्गवार ने एक दिन शबनम को समझाया “तुम बता रही थीं कि पश्चिमी पाकिस्तान में क्वेटा में तुम्हारा कोई रिश्तेदार रहता है। अगर ठीक समझो तो बेटी, तुम वहीदा को वहीं ले जाओ। खुदा न करे कि वहीदा भी किसी रोज तुम्हारे पीछे पड़ी उस बला की शिकार होकर तुमसे दूर चली जाये..."


उस बुजुर्ग की सलाह मानते हुए शबनम क्वेटा जाने के लिए तैयार हो रही थी तो उसकी तैयारी का कारण जानकर पहले तो चांद परेशान सा हो गया। फिर उसने एक पता बताते हुए कहा था-"अगर वहां कोई भी दिक्कत महसूस करें तो वहां के इकरामुल हक को मेरा नाम बता देना। आपको कोई परेशानी नहीं होगी।"


उन रिश्तेदारों के यहां पहुंचने पर इन दोनों को देखकर वह बड़े खुश हुए। लेकिन क्वेटा आकर वहीदा का दिल खुश नहीं था।


बार-बार चांद के कहे अल्फाज याद आ रहे थे-चलते समय उसने कहा था "इकराम वहां जरूर पहुंचेगा। शादी के लिए तैयार रहना। यहां के हालात जाने कैसे होते जा रहे हैं कि रहने का इरादा मेरा भी नहीं है। तुम्हारा जाना निहायत जरूरी है। कहते हैं कि समुद्र पार काले जादू का असर भी हो तो वह नहीं रहता। याद रखो, कि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं जीने की सोच भी नहीं सकता। अब तुम बुआ की ही नहीं, बल्कि मेरी भी आखिरी खजाना हो...।"


लेकिन अपने आने पर उसने कुछ नहीं बताया था। 


रिश्तेदारी में कुछ समय रहने के बाद शबनम को ख्याल आया-'अब सभी मनहूस असरात खत्म हो गये हैं। क्योंकि हम समुद्र पार आ गये हैं।'


इस ख्याल के बाद शबनम वहीदा को साथ लेकर चांद की बतायी जगह पर पहुंची और ढूंढकर इकरामुल हक को चांद का हवाला देकर अपने आने का मकसद बताया। हक ने चांद का नाम सुनकर आंखें ऊपर की तो वह एकटक शबनम को देखता ही रह गया। इतने दुख उठाने और पैंतालीस की होने के बाद भी शबनम का हुस्न आज भी गजब का आकर्षण रखता था।


तभी जाने क्या सोच उसने आंखें हटा लीं और बताया कि उसका आदमी एक-दो दिन में ही उन्हें एक मकान की चाबी पहुंचा देगा।


अपने रिश्तेदारों का पता लिखवा कर वह वापस लौट आयी

इकरामुल हक ने अपने वायदे को निबाहते हुए तीसरे दिन ही एक बढ़िया मकान उन्हें किराये पर दिला दिया था।


अपने बेचे दोनों पुराने मकानों की रकम आज भी शबनम के पास मौजदू थी। लेकिन वह उस रकम से वहीदा की शादी करने की ख्वाहिशमंद थी। शबनम के रिश्तेदारों की बेटी थी, कामिया। क्योंकि वह शादी की तैयारियों में वहीदा को मदद करना चाहती थी। अब शबनम को भी इकराम व वहीदा की शादी पर ऐतराज नहीं रहा था। वैसे भी दोनों के अब्बू अब इस दुनिया में नहीं रहे थे। यह भी उसकी रजामंदी का एक कारण था।


वहीदा की शादी की तैयारी में शबनम पूरे मन से लगी थी। वह अपने आपसे बात भी कर रही थी-"मैं अब बड़ा अच्छा महसूस कर रही हूं... "


चांद के होते वह मन में कुछ उलझन सी मानती थी।


जबकि वहीदा का मानना था कि सचिन अथवा राजकुमारी के परिवार वालों ने उसकी बुआ शबनम पर काला जादू कराया हुआ था। और वह अभी तक उसकी सजा भुगतते आ रहे थे। अब समुन्दर पार करते ही काला जादू अपना असर खो चुका था।


शबनम कुछ दिन बाद करांची चली गयी। वहीदा के साथ अब कामिया रह रही थी। इकराम का उसे खत मिला था। उसने लिखा था कि वह हमेशा के लिए दो माह बाद क्वेटा आ रहा है।

✥✥✥

शबनम और चांद आज वापस आ रहे थे।


दोपहर से कामिया अपने घर जाने की रट लगाये थी। लेकिन शबनम के वापस आने तक वहीदा ने उसे रोक लिया था।


चांद तो कुछ समय में ही आ भी गया। उसके दिल दिमाग पर छायी बेचैनी साफ-साफ दिखाई दे रही थी।


इकराम के बारे में चांद, वहीदा के साथ बातें तो खूब कर रहा था। लेकिन वहां होकर भी शायद वह वहां पर नहीं था।


शबनम का फोन आ चुका था कि वह शाम तक पहुंचेगी।


इसके फौरन बाद चांद जाने किस जरूरी काम के लिए वहां से चला गया। वहीदा घर के कामों में लग गयी।


दोपहर बीती। शाम गयी और रात भी आ पहुंची। लेकिन चांद अभी तक वापस नहीं आया था और न शबनम की वापसी ही हो सकी थी। अकेली होने के कारण वहीदा ने कामिया का बिस्तर अपने साथ ही लगा लिया था।


अभी भी कामिया घर वापस आने की रट लगाये हुए थी। उसके कालेज में क्योंकि एक विशेष कार्यक्रम था, जिसमें उसे भाग लेना था। इसके लिए उसे तैयारी भी करनी थी।


अब उसे रोकने की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हुई तो वहीदा ने अपना एक नया और कीमती सूट उसे पकड़ाते हुए कहा-“यहीं से इसे पहन कर स्कूल जा सकती हो...।" इस पर वह मान गयी।


तकरीबन नौ बजे रात को खबर मिली कि ट्रेन लेट हो गयी है। इसलिए शबनम सुबह तक आ पायेगी।


एक-दूसरी से बातें करते-करते दोनों को न जाने कब नींद आ गयी थी। तभी कामिया की भयानक चीख से वहीदा जाग कर उठ बैठी थी। जाने क्या हालत हुई होती कि चांद के वापस आ जाने से उन दोनों का धीरज बंध गया। इसके बाद आंखों-आंखों में ही दिन निकल आया।


'समंदर पार आकर भी वह मनहूस शै हमारा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है-जिसे डरावनी और भयंकर काली बिल्ली की शक्ल में देखती आयी है...।' वहीदा सोच रही थी।


दिन निकलते-निकलते शबनम आ पहुंची थी।


कालिज फंक्शन में तो कामिया क्या जा पाती, वह तो एक सौ चार बुखार में जल रही थी। शबनम से वहीदा ने सब बात बता दी। यह भी कि चांद न आ जाता तो शायद वह दोनों ही मर ही गयी होतीं। 


"चांद......चांद कैसे आ गया है?" 

“उसके आने से हमारा एकाकीपन तो दूर होगा ही, दूसरे काम में भी आसानी रहेगी।" वहीदा ने कहा।


उसी समय चाय लेकर चांद अन्दर आ गया और चाय रखकर वहां से निकल गया। पीछे-पीछे वहीदा भी निकल आयी तथा पुकारा-“चांद भाई...।"


चांद ने घूमकर उसकी तरफ देखा तो उसकी आंखों में सुर्खी थी। "जब से आये हो, कुछ खफा-खफा से हो...क्या बात है?"


“ऐसा तो कुछ नहीं। वैसे मैं सदा के लिए कल वापस जा रहा हूं। मुझे खुशी है, लेकिन तुमसे दूर होने का गम रहेगा।"


"कहां जाने की बात कर रहे हो?"


“अभी तो मुझे कई काम निपटाने हैं... । फिलहाल चलता हूं। कल शाम तक लौटुंगा, तभी जान जाओगी।"


वहीदा चांद की बात सुनकर शबनम के पास वापस आ पहुंची। कामिया को उसके घर पहुंचाकर आने और बुआ द्वारा लाये गये सामानों को देखने से फुर्सत ही न मिल सकी थी कि चांद का कहा हुआ बुआ को बता पाती।


वहीदा को चांद का व्यवहार आज बड़ा ही अजीब सा महसूस हुआ था। उसका बर्ताव बार-बार उसे चुभ सा रहा था।


"चांद ताबेदार है। सब कामों में भी लगा रहता है। फिर भी उसके रहते मेरी रूह उलझन में फंसी रहती है...।" शबनम कहती रहती थी


कामिया के चले जाने के बाद वहीदा व शबनम सोने के लिए बिस्तर पर पहुंचीं तो रात के नौ बज चुके थे। लेकिन एक अजीब सी खामोशी का अहसास हो रहा था। हवा के जोर से शहतूत के पेड़ झुके जा रहे थे। पूरे इलाके में घुप्प अंधेरा पसरा था। जंगल का माहौल अधिक होने के कारण हवा का जोरदार झक्कड़ चल रहा था और झींगुरों की आवाज जाने कैसा खौफ पैदा किये दे रही थी।


बिस्तर पर पड़ी-पड़ी वहीदा आसमान की तरफ देख रही थी कि जैसे कुछ याद आ गया हो। वह एकदम बोली


"बुआ, आज चांद की क्या तारीख है?"


“आज तो सत्ताइसवीं तारीख है। लेकिन चांद कहां गया...?" हिसाब लगाकर बताती शबनम ने फौरन पूछा।

“वह तो कल तक के लिए कहीं गया है.... ।" वह फक पड़ गयी।


जीरो पावर के बल्ब के हल्के प्रकाश में खिड़की के शीशों पर शहतूत की परछाइयां जाने कैसी-कैसी आकृतियां बना रही थीं!


आधी रात हो गयी थी।


तभी खिड़की पर आवाज हुई। भयभीत वहीदा ने उधर ही निगाह उठायी। अपनी सुर्ख आंखों के साथ भयानक अंदाज में काली बिल्ली वहां बैठी उनकी तरफ घूर रही थी। पत्थर की मूर्ति सी शबनम भी उसे ही देखे जा रही थी।


फिर बिल्ली खिड़की से कूद गयी तथा फौरन वही जानी-पहचानी दिल दहलाने वाली भयानक चीख गूंज उठी थी। रात की खामोशी में यह चीख कंपकपा देने वाली थी। यह चीख मृत्यु की थी।


जल्दी से वहीदा ने बुआ के सीने से लगकर सुकून पाना चाहा। लेकिन उसे अपने पांव ऐसे लगे, जैसे एक-एक मन के हो गये हैं। अपने स्थान से वह हिल भी नहीं पा रही थी। भयानक चीख दूर होती जा रही थी। खामोशी बढ़ती गयी और वह किसी बुत के समान बैठी हुई थी। 

पड़े-पड़े वह डर से होश गंवा बैठी।

जाने कैसा शोर सुनकर सुबह वहीदा की आंखें खुली तो उसने देखा कि चांद उसके ऊपर झुका कह रहा था


"उठो वहीदा..."


वहीदा की आंखें खुली तो उसे सहारा देते हुए चांद ने उठाया तथा फिर कॉफी भी पिलाई। जितनी वहीदा बेचैन दिखाई दे रही थी, उतना ही चांद शांत नजर आ रहा था। उसकी आंखों में आज न कोई वहशत थी और न बेचैनी।


घर के बाहर इकट्ठी भीड़ की तरफ वहीदा का ध्यान गया तो परेशान होकर उसने बुआ के बिस्तर की तरफ गौर किया, जो खाली पड़ा था।


“वह बला कल रात भी आयी थी चांद भाई...।" बेचैनी में डूबते-उतराते हुए वहीदा ने उसे बताया।


जवाब में चांद चुप रहा। 

तब वहीदा ने पूछा-“बुआ किधर है?"


"बला ले गयी...।" संतोष के साथ चांद बोला। 


चिल्ला-चिल्ला कर वहीदा ने रोना शुरू कर दिया।


“अब तक यह बस तुम्हारी मुहब्बत के कारण ही जिन्दा थीं...।" चांद ने इस प्रकार कहा कि वैसे कोई बात ही न हो।


वहीदा ने जैसे चांद की बात नहीं सुनी थी। वह बाहर की ओर लपकी।


बरामदे में रखे शबनम के जनाजे पर वहीदा पछाड़ खाकर गिरी और दहाड़े मारने लगी। सब उसे सम्भाल रहे थे।


जनाजे के बाद मौहल्ले वाले और रिश्तेदार तक चले गये। कामिया के खानदान वाले वहीदा से अपने साथ चलने के लिए जा रहे थे। वह जिद पर भी आ गये, तब चांद ने उन्हें समझाया


“देखिए! मैं यहां पर हूं। आप परेशान न हों। कल मैं वापस जाऊंगा तो इसे आपके यहां पहुंचा दूंगा। आज एकदम घर खाली छोड़ना भी तो अच्छा नहीं... । दो महीने बाद इकराम आ जायेगा तो दोनों की शादी करा दें। इसे कुछ समझाना है और हिसाब-किताब भी बताना है। चाहें तो कोई एक रुक जाये... ।"


रुकने की बात पर मानो सब को सांप सूंघ गया था। सब खिसक गये। डर के मारे कामिया तो आयी ही नहीं थी। भयानक आवाज सुनकर घबराये मौहल्ले वाले भी जा चुके थे। कामिया की अम्मी वहीदा को ले जाने की जिद तो कर रही थीं, लेकिन जिद में खास दम नहीं था। शायद उनके मन में डर था कि उसकी वजह से उनके घर कोई मुसीबत न टपक पड़े। वह तो तब था कि उन्होंने यही एक मौत देखी थी और सारी सच्चाई जान गयी होती तो शायद वह शबनम के जनाजे के लिए भी नहीं आतीं। रुकने के नाम तो वह साफ कन्नी काट गयी थीं। वही पर यह सब साफ महसूस कर रही थी।


सबके वापस चले जाने के बाद जब गमजदा वहीदा भीतर बैठी थी तो चांद भी उसके पास कुर्सी खींच कर आ बैठा।


गम में डूबी वहीदा बड़बड़ायी-“अब मेरा नम्बर है...।" 


प्यार भरी आवाज में चांद बोला-“तुम्हारे साथ यह न होगा... 1"


वहीदा की रुलाई फिर फूट पड़ी-“हमारे खानदान पर किसी ने काला जादू करा दिया है। हम सोचते थे कि समंदर पार आने के बार उसका असर खत्म हो जायेगा। लेकिन यहां भी वह आफत मौजूद है। वह जब भी दिखती है...तो खानदान का कोई न कोई अल्ला को प्यार हो जाता है। अब वह दो दिन से चक्कर काट रही है... कामिया पता नहीं कैसे बच गयी थी। अब बस...परिवार की आखिरी मेम्बर मैं ही बची हूं..."


"कामिया को नहीं मरना था।"


चांद ने जिस अंदाज में यह अलफाज कहे, सुनकर हैरान हो उठी वहीदा। उसे डर भी लगा, कई बार चांद की शख्सियत उसे उलझा देती थी। फिर इसे वह अपना भरम भी मान लेती थी।


लेकिन उसके मन में आज यकीन पक्का हो गया कि इन सब वारदातों से चांद का कोई-न-कोई वास्ता जरूर है।


इसके अलावा जब भी वह बला टूटी तो हर बार चांद घर से बाहर ही होता था।


मन-ही-मन में घबरा उठी थी वहीदा। सामने बैठा चांद अभी तक उसे ही देख रहा था।


वह पूछ बैठा-"क्या बात है?"


"तुम्हारे ही बारे में सोच रही हूं। तुम्हारी शख्सियत के बारे में जानकर वह आफत इधर अब फटकेगी भी नहीं,., ।"


"कैसे कह सकते हो?"

"क्योंकि उस बला का इन्तकाम खत्म हुआ। तुम्हारी पाक मुहब्बत ने लम्बा फासला कर दिया था... ।"


“मैं इकराम को चाहती हूं... ।” घबराकर वह बोली।


“तुम इकराम की ही बनोगी। मेरी बेटी जैसी हो तुम। घबराओ नहीं। एक बात और...वह एक महीने में ही यहां पर आ जायेगा। उसके यहां पहुंचने तक तुम अकेली न रहोगी। लो पकड़ो...।" अपनी बात पूरी करते-करते चांद ने एक पोटली उसके हाथ में थमा दी।


हैरानगी से वहीदा ने पूछा- “क्या है?" 


प्यार से चांद ने कहा- “खोलो तो...।"

पोटली खोलते ही उसमें से चमचमाते जेवरात बाहर आ गये थे। इनमें छोटा सा एक ताज और जड़ाऊ टीका सबसे खास थे। कुछ


दीवानगी के अंदाज में चांद ने कहा-“अच्छा...जरा इन्हें पहन कर तो दिखाओ...।"


वहीदा जानती थी कि चांद एक पाक तबियत शख्स है। वह खुद भी उससे लगाव रखती आयी थी। लेकिन इस समय जाने उसका मन कैसा हो रहा था। उसे डर सा लग रहा हो।


“अच्छा, बस टीका पहनकर दिखा दो।” चांद ने इसरार किया। वहीदा ने ऐसा ही किया तो वह खुश हो उठा। फिर बोला- "वहीदा, तुम्हारी कोई कितनी भी तारीफ करे, लेकिन दूसरे के हक पर नीयत मत डालना। जैसा तुम्हारी बुआ ने किया था। इकराम तुम्हें जान से ज्यादा रखेगा।"


चांद की बात से वहीदा का दिल धड़क उठा। उसने राजकुमारी, शबनम और सचिन का वाकया सुना हुआ था। चांद ने जो कुछ कहा, उससे वहीदा को सब याद आ गया।


"शबनम और सचिन दोनों ही बेवफा और जालिम थे। शबनम ने मुझे धोखा दिया। उसने मेरी मुहब्बत मुझसे छीन ली। उसके हुस्न में पागल सचिन ने उससे शादी के लिए दो दिन पहले मुझे कैद कर लिया। मैंने उससे बार-बार प्यार की दुहाई दी। रोई-चिल्लाई। लेकिन उस कसाई को रहम नहीं आया। उसने मुझे जान से मार दिया और मेरी मौत को बड़ी सफाई से आत्महत्या सिद्ध करके चिता के हवाले करा दिया...। मैंने उन्हें बर्बाद करने की ठान ली थी। एक-एक करके मैं सबको मार भी रही थी ....कि तभी तुम आ गयीं। तुम इतनी साफ मन की हो कि बस पूछो मत। वरना ये कहानी कभी की खत्म हो गयी होती है। तभी तुम इकराम से प्यार करने लगी... । तुमने मुझे साफ मन से बता भी दिया था और प्यार की दीवानगी मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूं...।" चांद के मुंह से आवाज आ रही थी।


सिर झुकाये ध्यान से चांद की बातों को सुन रही वहीदा को जाने क्या ध्यान आया कि वह हड़बड़ा गयी।


क्योंकि चांद के गले से निकल रही आवाज अब किसी मर्द की मतलब कि चांद की नहीं थी,  वह तो दर्द में डूबी एक दिलकश आवाज थी। वह भी किसी औरत की!


सामने की तरफ निगाह उठाई तो हैरत के मारे अपनी जगह से वह उछल कर खड़ी हो गयी।


क्योंकि उसके सामने इस समय चांद नहीं था, बल्कि कोई खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी। वहीदा फौरन जान गयी कि यह राजकुमारी है।


लेकिन पलक झपकते ही कुर्सी से राजकुमारी गायब भी हो गयी थी। वह अकेली थी अब । वहीदा ने कमरे में चारों तरफ देखा।

'यह जो कुछ हुआ, सपना था या फिर हकीकत थी?' हैरान परेशान वहीदा सोचने लगी।


उसी वक्त सामने पड़े जेवरात पर वहीदा की निगाह पड़ी तो उसने अपने माथे पर हाथ लगाया तो वहां टीका मौजूद था।


माथे पर से टीका उतार कर वहीदा ने उन जेवरातों में रख दिया। फिर बड़े प्यार और इज्जत के साथ उन्हें बांध कर आलमारी में रख दिया और चांद को आवाज देने लगी।


लेकिन दूर-दूर तक खामोशी छायी थी...और कुछ भी नहीं था। तब वह कमरे में वापस आ बैठी।


थोड़ी ही देर बीती होगी कि उन्हें ये मकान दिलाने वाला इकरामुल हक आ पहुंचा। एक औरत और छोटा बच्चा वह साथ में लिए था। वहीदासे बोला-“इनके पास मकान का इन्तजाम नहीं है। इसलिए इन्हें एक महीने अपने पास रख लीजिए...।"


'तुम अकेली न रहोगी...।' वहीदा के कानों में उसी समय चांद की आवाज ने सरगोशी की।


चौंक कर उसने इधर-उधर निगाह डाली। लेकिन चांद वहां नहीं था। उसने उन दोनों को रहने की खुशी से हामी भर दी।


बात-की-बात में एक महीना खत्म हो गया और इकराम आ पहुंचा। दोनों की शादी भी हो गयी। उसी रात कमरे की खिड़की पर वहीदा ने फिर वही काली बिल्ली देखी। लेकिन आज उसकी आंखें जल नहीं रही थीं। बल्कि बिलकुल शांत नजर आ रही थीं। वहीदा के देखते-देखते वह वापस कूद गयी।


दिल धड़क उठा डर के मारे वहीदा का। उसे लगा वह मनहूस चीज आई...और अब आई।


लेकिन...। कुछ नहीं हुआ। वहीदा ने जीवन में फिर वह चीख या कोई सिसकी कभी भी नहीं सुनी।


🕀🕀🕀🕀🕀

👻💀🕱💀☠

.....

..... Kala Jadu Ki Story: Bhayanak Chikh .....

Team Hindi Horror Stories

No comments:

Powered by Blogger.