5 Short Hindi Horror Stories 2021: घोस्ट ट्रेन, मनहूस कार | शरारती भूत

5 Short Hindi Horror Stories 2021
5 शोर्ट हिंदी हॉरर स्टोरीज 2021

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New Hindi Best Real Horror Ghost Stories Short 


 तोंगोगोरा का भूत | Tongogara Ka Bhoot


जिम्बाब्वे के चर्चित राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे अपने विरोधी तोंगोगोरा के भूत से बहुत बुरी तरह परेशान रहे। राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों के अनुसार रात को खाते समय वे एक थाली तोंगोगोरा के लिए भी लगवाते हैं और बाकायदा उसके लिए खाना भी परोसा जाता है। 


राष्ट्रपति के करीबी लोगों के अनुसार राष्ट्रपति मुगाबे, तोंगोगोरा के भूत को पिछले छह महीने से रोज देख रहे हैं। तोंगोगोरा 1980 में एक सड़क दुर्घटना में मारे गए थे। उस समय वे जिम्बाब्वे की राजनीति में काफी प्रभावशाली भूमिका निभाते थे और राष्ट्रपति चुनाव में भी उनके जीतने की पूरी आशा थी। 

मगर इस चुनाव में राष्ट्रपति पद पर जानू की जीत हुई और तोंगोगोरा एक कार दुर्घटना में मारे गए। तभी से यह शक जताया जा रहा था कि यह दुर्घटना दरअसल एक साजिश थी। 

मुगाबे ने बाद में यह स्पष्ट भी कर दिया था कि वे सदा से पूरी ताकत चाहते रहे हैं। तोंगोगोरा के राष्ट्रपति रहते वे प्रधानमंत्री बनकर भी सारी ताकतों को अपनी मुट्ठी में बंद नहीं कर सकते थे। 

जिम्बाब्वे की तीन चौथाई आबादी शोना समुदाय की है, जिसमें यह माना जाता है कि मरे हुए इंसान की आत्मा आसानी से किसी भी जिंदा इंसान से संपर्क कर सकती है, साथ ही उसके शरीर पर अधिकार भी कर सकती है। आमतौर पर वे इस आत्मा को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं और उसके आराम के लिए कई तरह की व्यवस्था भी कराते हैं। लेकिन साथ ही यह भी मान्यता है कि यदि ये आत्मा किसी से रुष्ट हो जाए तो उसका जीना मुश्किल कर देती है। 

मुगाबे ने इस मुसीबत को दूर करने के लिए ओझा-तांत्रिकों की सहायता मांगी है, साथ ही सरकारी मनोवैज्ञानिक ब्लैड रैनकोविक ने उन्हें चिंता से उबरने के लिए कुछ दवाएं लेने का परामर्श भी दिया है।

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शरारती भूत | Shararti Bhoot


मेलबर्न (आस्ट्रेलिया) के बाहरी क्षेत्र के बे-साइड उपनगरीय क्षेत्र में बना लूना पार्क आरम्भ से ही इस मशहूर नगर की विशेष पहचान बन चुका था। जानकारी के लिए बता दें कि यह एक मनोरंजक पार्क है और यहां का पुराना, खूबसूरत 'रोलर कोस्टर' इसका विशेष आकर्षण है। 


इसे 'घोस्ट ट्रेन' यानि प्रेत की गाड़ी भी कहा जाता है। पर अब यह एक गुजरी हुई बात हो चुकी है। प्रमाणिकता के अभाव में इसे कपोल-कल्पना भी मान लिया गया है। लेकिन 1900 के आरम्भ के कुछ महीनों में यहां एक भूत जोकर के भेष में प्रकट होकर मेहमानों के साथ चुहल करता था। 

ये शरारत-पसंद भूत था...कभी ट्रेन में सवार लोगों के बीच में बैठ जाता, तो कभी तरह-तरह की अठखेलियां करता। आरम्भ में तो लोगों को उसकी वास्तविकता का कोई विशेष पता नहीं चला, पर जब वहां आने वालों ने उसकी चर्चा प्रबंधकों से की तो प्रबंधकों ने ऐसे किसी भी जोकर की उपस्थिति से साफ इनकार कर दिया। 


अब लोगों को उस जोकर से भय लगने लगा, क्योंकि उसका स्पर्श को वे एक हवा के झोंके से ज्यादा महसूस नहीं कर सकते थे, पर एक जोकर-नुमा पारदर्शी छाया उन्हें भाति-भांति की मुद्राओं में अवश्य दिखती थी। लोगों की शिकायतें बढ़ीं तो प्रबंधक उसका उपाय सोच रहे थे कि अचानक प्रेत जोकर ने वहां आना बंद कर दिया।


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मनहूस कार | Manhush Car


दा-कदा बड़े शौक से खरीदी गई चीज भी आदमी को माफिक नहीं पड़ती। वह चीज खरीदते ही व्यक्ति के लिए आफंतों का दौर आरम्भ हो जाता है और कभी इतना भारी पड़ता है कि उसे अपनी जान तक गंवानी पड़ जाती है।

अभिनय-क्षेत्र में हॉलीवुड की उभरती नौजवान प्रतिभा जेम्स डीन के मामले में भी ऐसा ही हुआ। जेम्स अपनी किशोर अवस्था में ही अभिनय में अपनी विलक्षण प्रतिभा और सुनहरे भविष्य के संकेत देने लगा था, मगर वो सुनहरा भविष्य आने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।

उसकी मृत्यु का कारण बनी उसकी प्रिय कार पोर्शे । घटना 1955 की है। अभिनय क्षेत्र में जेम्स एक के बाद एक फिल्मों में अपनी श्रेष्ठता के झंडे गाड़ रहा था। हॉलीवुड सहित उसके प्रशंसक भी उसे भविष्य के 'नंबर-वन' अभिनेता के रूप में देखने लगे थे, अपनी कार-प्रियता के शौक के चलते उसने एक सैंकड-हैंड पोर्शे कार खरीदी थी। 

उस कार का पिछला इतिहास क्या था, ये तो किसी को ज्ञात नहीं, मगर जेम्स के पास आते ही उसका पुर्जा-पुर्जा अभिशप्त हो गया। सर्वप्रथम तो खुद जेम्स ही उस कार को चलाते हुए एक दुर्घटना का शिकार हुआ। दुर्घटना इतनी जबर्दस्त नहीं थी पर जेम्स सीट पर बैठा का बैठा ही रह गया। 

थोड़े दिनों तक कार जेम्स के घर पर ही खड़ी रही, फिर उसे एक कार-शौकीन जार्ज बेरिस ने खरीद लिया, मगर उसने कार को स्वयं इस्तेमाल करने के बजाय उसके पुर्जे-पुर्जे अलग-अलग करके बेच डालने का निर्णय लिया।

पोर्शे का इंजन एक डॉक्टर ने खरीदा, जो स्वयं एक शौकिया कार-रेसर थे। उन्होंने उस इंजन को अपनी कार में फिट करवा लिया, मगर एक मुकाबले के दौरान डॉक्टर कार को संभाल नहीं पाए और दुर्घटना में मारे गए। इसी प्रकार जिस व्यक्ति ने उसकी ड्राइव-शाफ्ट खरीदी थी, उसी मुकाबले में वो भी एक दुर्घटना में घायल हो गया। और तो और पोर्शे की बुरी तरह क्षतिग्रस्त बाडी और चेसिस को सड़क-सुरक्षा अभियान के अन्तर्गत एक बड़ी ट्रॉली पर रखकर जगह-जगह घुमाया गया, लेकिन विडंबना यह रही कि हर जगह कुछ न कुछ हादसा होता रहा। 

बहरहाल, जेम्स की पोर्शे और उसकी अभिशप्तता का अंत तब हुआ, जब कल-पुर्जो समेत उस कार के अस्थि-पंजर को ट्रेन द्वारा लास एंजेल्स वापस भेजा जा रहा था। मार्ग में पता नहीं कब, कहां से कैसे-वह कार ऐसी गायब हुई कि आज तक उसका कोई पता भी नहीं चल सका।


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हाथ की छाप | Hath Ki Chhap


न् 1860 और 1870 के दशकों की बात है। अमेरिका में मजदूर आंदोलन जोरों पर था। यह आंदोलन पेन्सिल्वानिया की कोयला खदानों की दयनीय और भयावह कार्य  स्थितियों को लेकर आरम्भ किया गया था। इस संघर्ष को ज्यादा प्रभावी रूप से चलाने के लिए कामगारों ने 'मौली भाग्वावर्स' नाम का एक गुप्त संगठन स्थापित किया। 

मगर स्थिति ऐसी बिगड़ी कि आंदोलन दंगों में बदल गया। कामगारों और यूनियन नेताओं की धरपकड़ आरम्भ हुई और करीब डेढ़ सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया। हड़ताल से निबटने के लिए मालिकों ने एक गुप्तचर संस्था 'पिंकरटन डिटेक्टिव एजेंसी' की सहायता ली, जिसके एजेंटों ने 'मौली भाग्वावर्स' में अपनी घुसपैठ बना ली। 

मजदूरों को भड़काने वालों के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए गए और मुकदमें चलाए गए। परिणामस्वरूप करीब दर्जनभर लोगों की मौत की सजा सुनाई गई। 1877 में 'येलो जैक' नाम के व्यक्ति को 'लहाई कोल एंड नेविगेशन कंपनी' के फोरमैन की हत्या के इल्जाम में मुख्य दोषी पाया गया और फांसी दे दी गई। 

उसके तीन अन्य साथियों को भी विभिन्न हत्याओं के इल्जामों में फांसी की सजा सुनाई गई। इनमें से दो तो खामोशी से फांसी पर चढ़ गए, मगर कोठरी नम्बर 17 में बंद उनका तीसरा साथी, एलेक्जेंडर कैंपबेल, आखिर तक यही चिल्लाता रहा कि वह निर्दोष है। 

जब उसे कोठरी से खींचकर फांसी के तख्ते पर ले जाने लगे, तो उसने फर्श की मिट्टी से कोठरी की दीवार पर अपने हाथ की छाप बना दी और चीख-चीखकर कहा, 'मेरा यह हाथ मेरी बेगुनाही के सबूत के तौर पर हमेशा के लिए यहां बना रहेगा।' 


फांसी के तख्ते पर पहुंचने तक वो बार-बार यही कहता रहा और फांसी पर लटकाए जाने के करीब 15 मिनट पश्चात् उसके प्राण निकले। कैंपबेल तो मर गया मगर अपने हाथ की छाप वहां छोड़ गया। कैंपबेल का यह हाथ अमेरिका में अन्याय का एक ज्वलंत सबूत बन गया। कई लोगों ने इसे तरह-तरह से मिटाने की कोशिश की, मगर कामयाब नहीं हुए। 


आखिरी बार इसे मिटाने की कोशिश की गई 1978 में । उस पर पेंट पोता गया मगर नया पेंट भी उस हाथ की छाप को छिपाने-मिटाने में सफल न हो सका। उसके पश्चात् ये कोठरी सदा-सदा के लिए बंद कर दी गई, लेकिन उसकी दीवार पर कैंपबेल का हाथ की छाप आज तक बना हुआ है।

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डायरी का रहस्य | Diary Ka Rahasya

स वक्त द्वितीय विश्व युद्ध पूरे जोरों पर था। 10 मई 1941 को जर्मन वायुसेना बमवर्षक विमानों ने लंदन पर बमों की भारी वर्षा की। इस हमले में लंदन का अत्यधिक प्रसिद्ध होटल अलेक्जेंड्रा पूरी तरह नष्ट हो गया। इस होटल में ठहरे मेहमानों के साथ इंग्लैंड के मशहूर प्रकाशक एंड्रयू वर्दी भी मारे गए। उस दिन की लंदन पर हुई यह सबसे भयानक बमवर्षा थी।


एंड्रयू वर्दी की मौत के पश्चात् उनके प्रकाशन संस्थान के संचालन की सारी जिम्मेदारी उनके पुत्र जेम्स वर्दी के कंधों पर आ पड़ी।

एक दिन कोई खास जानकारी पाने के लिए जेम्स अपने पिता की 1914 की डायरी देख रहा था। तब यह देखकर वह बहुत आश्चर्य में पड़ गया कि उस डायरी में 10 मई का पन्ना बिल्कुल खाली था, यहां तक कि उस पर 10 मई की तारीख भी नहीं छपी थी।


चूंकि यह डायरी खुद उन्हीं के प्रकाशन संस्थान ने अपने एजेंटों, पुस्तक-विक्रेताओं और ग्राहकों में वितरण के लिए छापी थी, अतः जेम्स को यह भय हुआ कि कहीं ऐसा न हुआ हो कि यह गलती सभी डायरियों में रह गई हो। जेम्स ने गोदाम में रखी बची हुई सारी डायरियों की जांच कराई। पता लगा कि किसी भी डायरी में 10 मई का पन्ना खाली नहीं था।


जिन लोगों को डायरियां भेजी गई थीं उन सभी को पत्र भेजे गए, लेकिन सभी ने स्वीकारा की सभी की डायरियां दुरुस्त थीं। किसी भी एजेंट या पुस्तक विक्रेता या ग्राहक ने इससे पहले भी डायरी के 10 मई के पन्ने के खाली होने की शिकायत नहीं की थी।

बस एंड्रयू वर्दी की डायरी में ही 10 मई 1941 का पन्ना खाली था। 10 मई 1941 यानि मृत्यु का दिन। यह रहस्य आज भी पहेली बना हुआ है कि आखिर एंड्रयू वर्दी की डायरी में ही 10 मई का पन्ना कोरा क्यों था?


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Team Hindi Horror Stories



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