Pishach Ki Kahani: पैशाचिक मशीन [ पहला भाग ] [Part-1]

Pichas Ki Kahani: Paishachik Machine
पिशाच की कहानी: पैशाचिक मशीन (01)

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शेष कहानी जानने के लिए पैशाचिक मशीन भाग 2 को  इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ें |

[भाग-1
Part-1]

बहुत सिगार पीता था जोसेफ और उसका सिगार भी बहुत घटिया किस्म का था। सिगार पीने की उसे ऐसी लत थी कि उसके मुंह से, उसके कपड़ों तक से भी उस घटिया सिगार की गंध आती थी।


उसका अपना कबाड़खाने का गोदाम था जिसके बाहर उसने एक खोखे में अपना ऑफिस बनाया हुआ था। वह इस समय क्रेटिना कार के जंग खाये वजनी ढांचे के सहारे खड़ा हुआ था। उसने जमकर बीयर पी हुई थी और आधे घण्टे से वहां खड़ा हुआ घटिया सिगार पीये जा रहा था।


जहां वह खड़ा हुआ था, उस स्थान से उसका पूरा कबाड़ का गोदाम उसकी निगाहों की पहुंच में था। यही गोदाम उसके भरण-पोषण का साधन था। इस समय वह ऑपरेटर को देख रहा था, जो क्रेन को चला रहा था। क्रेन का भारी वजन वाला पंजा एक पिचकी हुई आस्टिन कार की छत को दबा रहा था और थोड़े ही प्रयास से कार की छत इस प्रकार नीचे जा मिली मानो कोई गत्ते का डिब्बा पिचक गया हो।


केवल एक हफ्ता पहले ही इस कार की मालकिन स्टीयरिंग संभाले कार ड्राइव कर रही थी। उसे शायद किसी खास मीटिंग में भाग लेने जाना था। उसे शराब और कबाब का ख्याल बेचैन किए हुए था, लेकिन उसे सपने में भी ख्याल नहीं होगा कि उसकी कार के आगे जाता हुआ भारी ट्रक सड़क पर बिखरे तेल पर अपना संतुलन खोने वाला है, जिससे टकरा कर उसकी यह खूबसूरत आस्टिन कार बर्बाद होने वाली है।


लेकिन यह दुर्घटना हुई और बर्बाद आस्टिन वहाँ से उठाकर जोसेफ के कबाड़खाने के बाहर स्थित उस हिस्से में पहुँचा दी गई, जहां उसे समाप्त किया जाना था और कुछ देर में ही वह कार धातु की एक मोटी चौकोर चादर में परिवर्तित हो गई थी।


सिगार मुंह से निकालकर जोसेफ ने उसे इस अंदाज में मसला मानो क्रेन के पंजे ने कार कुचल दी हो।


जोसेफ जाने किन ख्यालों में खोया हुआ था कि एक अजनबी आवाज को सुनकर हड़बड़ा गया। कोई पूछ रहा था-"क्या यह गोदाम आप ही का है?"


जोसेफ ने देखा, उसके सामने तीखे नैन-नक्श वाला लम्बे कद का आदमी खड़ा पूछ रहा था। सर पर एक चौड़े किनारों वाला हैट पहने उस आदमी के शरीर पर शानदार सूट सज रहा था। जोसेफ नाराज होकर बोला-"यह क्या ढंग है, इस तरह चुपचाप आकर बोलने का?" "मैं कुछ टूटे हिस्सों की तलाश में हूं...।"

"ऐसे हिस्से तो यहाँ बहुत पड़े हैं मिस्टर । असली बात बताओ, तुम क्या चाहते हो?" वह नाराजगी के भाव से कहा।


"आप कहें तो मैं घूम-फिर के देख लू ।'


"ये कोई किताबों की दुकान समा रखी है क्या?" जले भुने अंदाज में जोसेफ ने पूछा।


"आप बहुत व्यवसायिक व्यक्ति हैं।" उस सामने वाले ने कहा तो जोसेफ की उसकी बात से चिढ़ सी हुई। उसे अहसास हुआ जैसे वह उसकी हंसी उड़ा रहा हो।


"यदि आप व्यापारिक मानसिकता के ही हैं, तो ठीक है। मैं उन्नीस सौ चालीस मॉडल की फोर्ड कार्टीना का ट्रांसमिशन ढूंढ रहा हूं।"


कपड़े से हाथ पौछता हुआ जोसफ बोला-' "मेरे पास चालू स्थिति में ऐसा कोई भी ट्रांसमिशन नहीं है।"


जोसेफ ने नोटिस किया कि आगंतुक की आँखें बीच-बीच में सुर्ख हो उठती हैं, और वह ऐसा लग रहा था जैसे कोई बिन बुलाये किसी समारोह में घुस जाता है।


आगंतुक ने लापरवाही से कहा कि ट्रांसमिशन चालू हालत में होना आवश्यक नहीं है।


यार्ड के पिछले हिस्से से क्रशर की गड़गड़ाहट आ रही थी। जोसेफ ने समझ लिया कि फौलादी ढांचा पिचकना प्रारंभ हो गया है।


"समझिए कि ट्रांसमिशन की चालू या ठप्प कंडीशन होनी कोई आवश्यक नहीं है, लेकिन यह जरूर आवश्यक है कि ट्रांसमिशन उन्नीस सौ चालीस फोर्ड कार्टीना कार का हो।" आगंतुक की आवाज गूंजी थी और धूप की परछाई के अनुसार उसकी आँखों का रंग परिवर्तित हो रहा था। उधर क्रशर और लोहे की आवाजें जोरों पर थीं।


आगंतुक ने कहा-"आवश्यक यह है कि ट्रांसमिशन ऐसी कार का हो जो किसी एक्सीडेंट के कारण कबाड़खाने में आई हो और उस एक्सीडेंट में कोई मौत भी हुई हो, भले ही मरने वाला स्त्री हो या पुरुष। इससे कोई अंतर नहीं पड़ेगा। मैं समझता हूं कि आने वाली शाम तक या कल तक मुझे तुम ऐसा ट्रांसमिशन किसी भी प्रकार दिला दोगे, जो मेरी, अपेक्षा पर खरा उतरता हो। समझ गए ?"


असमंजस भी भाव से जोसफ खड़ा उसके मुंह को देख रहा था। 

"समझ में आया?" 

"हाँ...समझा।" 

"तो ठीक है, कल मिलेंगे।"


उसके भयानक लग रहे चेहरे की तरफ जोसेफ निगाह नहीं उठाना चाहता था। उसे डर लगा कि ऐसा ना करने पर इस अजनबी के खतरनाक दांत उसकी गर्दन चबा डालेंगे।


अजनबी आराम के साथ पीछे मुड़ा और कबाड़खाने के गेट की तरफ से होता हुआ वापस चला गया। उसे देखकर जोसफ का कुत्ता टॉमी भोका तो था, लेकिन हल्की आवाज में और उसमें दम नहीं था। जोसफ ने कुते पर नजर डाली, वह शेड के जंगले में ही था।


कुत्ते से निगाह हटाकर जोसेफ ने अजनबी की तरफ दौड़ाई तो वह हैरान रह गया कि वह उसे कहीं दिखाई नहीं दे रहा था और मानो पलक झपकते ही गायब हो गया था। जबकि गोदाम के दरवाजे तक पहुंचने में कुछ मिनट तो लगते ही थे, खिड़की खोलकर जोसेफ ने झांका तो यहां से वह स्थान नजर आ रहा था, जहां वह आगंतुक के साथ कुछ समय पहले खड़ा हुआ बहस कर रहा था। 

अचानक उसे याद आया कि वापस जाते हुए अजनबी ने उसकी जेब में कुछ डाला था। उसने जेब में हाथ डालकर बाहर निकाला तो उसमें सौ डालर के ढेरों नोट बंधे हुए थे। वह आश्चर्य से उछल पड़ा-'अरे...एक कबाड़ा ट्रांसमिशन के लिए इतने डालर...?'


लेकिन अगले ही पल सब बात भूलकर जोसेफ एक ही बात मन में दोहरा रहा था-'उन्नीस सौ चालीस मॉडल की फोर्ड कोर्टीना कार, जो किसी एक्सीडेंट के कारण यहां आई हो...लेकिन उससे मौत भी हुई हो...मरने वाला आदमी हो या औरत... ।

🚫🚫🚫

रात होते ही जोसेफ शराबखाने में किसी लैंडलॉर्ड के अन्दाज में बैठा हुआ था।


उसने कड़कड़ाते डालर निकालकर खर्च करने शुरू किए तो यह रकम दो सौ डॉलर पर जा पहुंची, जो शराब पर बहाने के हिसाब से भारी रकम थी। उसने जमकर शराबखाने में तो पी ही, घर के लिए भी खरीदकर साथ ले ली। दोपहर से वह जिस भय के साये में घिरा हुआ था, शराब ने वो भी दूर कर दिया था।


जोसेफ ने अनुमान लगाया कि वह कोई सनकी आदमी था और इस प्रकार की वस्तुएं एकत्र करने का उसे शौक था, जो किसी भी प्रकार यादगार हो सकती हैं।


वह पहले भी कबाड़ हो चुकी वस्तु के ऊंचे दामों पर बिकने की खबरें अनेक बार सुन चुका था। होगा, उसे क्या! वह उसे कोई खिसका हुआ आदमी लग रहा था। भले ही आधा था या पूरा । उसे जिस चीज की आवश्यकता थी, उसके सही होने की भी कोई इच्छा नहीं की थी, और फिर भी उसकी कीमत से कुछ भी नहीं तो सौ गुना अधिक रकम एडवांस ही दे गया था।


जोसेफ को याद था, कोर्टीना कार का एक मुड़ा-तुड़ा ढांचा उसके कबाड़खाने में पड़ा हुआ है, जिसका ट्रांसमिशन खराब, बल्कि कबाड़ ही था। इस कार से सड़क पर दो युवक बड़े खतरनाक ढंग से घायल हुए थे और उसमें से एक घटना स्थल पर ही प्राण गवां बैठा था। जोसेफ की आदत थी कि वह वाहन का जो भी कबाड़ खरीदता था, उसके विषय में जानकारी अवश्य ले लेता था और उसकी यही आदत बड़ा फायदा करा रही थी।


अगले रोज जोसेफ का नशा ढीला पड़ने पर अजनबी के विषय में रात को बनाई उसकी राय कमजोर पड़ने लगी तथा वह फिर से चिन्ताग्रस्त हो उठा था।


कोर्टीना कार से जिस समय ट्रांसमिशन खोला जा रहा था, तो जोसेफ कुछ उलझन सी अनुभव कर रहा था, तभी जॉन ने उससे पूछ भी लिया था कि आखिर यह फालतू का वक्त बर्बाद क्यों किया जा रहा है तो जोसेफ की उलझन और ज्यादा बढ़ गई थी।

तीसरा पहर बीतने के साथ-साथ अजनबी के आने का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा था, जोसेफ का मूड खराब होने लगा था।


सेफ से निकाली स्कॉच की बोतल चार बजे तक खाली हो गयी थी। टॉमी टेबिल के नीचे दुबका हुआ था। उसे भी अपने स्वामी की बेचैनी का आभास हो गया था। अचानक वह उठकर खड़ा हो गया। पांच बजकर एक मिनट हुआ था कि उसने थूथन हवा में उठाकर कुछ सूंघा और हल्के से गुर्राता हुआ वहां से उठकर बाहर निकल गया।


जोसेफ को यह आभास हो गया था कि कल वाला अजनबी आज, कल के स्थान पर ही खड़ा हुआ आफिस की ओर ही निगाह उठाये देख रहा होगा और हाथ सीने से बांध रखे होंगे। यह अनुमान तो उसने तब ही लगा लिया था, जबकि खिड़की के बाहर झांका तक न था।


वह उठकर बाहर की ओर बढ़ा। वह आगंतुक के चेहरे की ओर निगाह उठाने से बच रहा था। उस भयानक चेहरे वाले आगंतुक की काली भौंहों के नीचे अलाव की तरह अंगारे बरसाती सी आंखें उसकी धूर्तता दर्शा रही थीं।


अभी दोनों के मध्य करीब बारह फुट की दूरी बाकी थी कि वह जोसेफ से पहले ही ठहर गया। वह उस मशीन से टेक लगाकर खड़ा हो गया, जिसके ढांचे में ट्रांसमिशन धरा हुआ था।


"यह वही ट्रांसमिशन है?" अजनबी की आवाज भेड़िये सी भयानक थी। 

"हां..." "वैरीगुड! मैं यही चाहता था।" जोसेफ चुपचाप, लेकिन बेचैन खड़ा रहा।


"अभी तुम यह ट्रांसमिशन इसी यार्ड में कहीं सुरक्षित रख लो। मैं ऐसा चाहता हूं..." अजनबी इस प्रकार प्रसन्न हो उठा मानो किसी बिल्ली ने शिकार पकड़ लिया हो।

"ओ.के."

"इसके लिए भी तुम्हें कीमत अदा की जायेगी।" अजनबी ने फिर से ट्रांसमिशन का निरीक्षण करते हुए दोहराया।

चेहरे पर आया पसीना पोंछते हुए जोसेफ ने दृष्टि घुमाकर दूसरी ओर देखते हुए जोसेफ ने पूछा-“इसे कब तक रखेंगे?"

"अभी मेरी आवश्यकता की कुछ और वस्तुएं मिलनी बाकी हैं, और यह भी सम्भव है कि वह भी तुम्हारे पास ही मिल जायें। बस तभी तक...।"


जोसेफ का भय से दिल बैठा जा रहा था। वह मन-ही-मन में चाह रहा था कि यह यहां से दफा हो और जान छूटे। फिर उसने भरे मन के साथ उससे पूछा-“कौन सी वस्तुएं?"


"मोरिस कार का रोटर एक्सल, जिसमें नुकसान न हुआ हो। जिसके लिए दुर्घटना में मरना-जीना आवश्यक नहीं। लेकिन ड्राइवर के पैर टूट-टाट गये हों यानि कि वह जख्मी हो गया हो। वह कार उन्नीस सौ इकहत्तर माडल की होनी चाहिए।" आगंतुक ने भारी आवाज में बोला।


वहां से जाते समय वह जोसेफ को फिर पांच सौ डालर थमा गया। वह पांच मिनट बाद ही अपने आफिस की तरफ बढ़ रहा था। उसे ऐसा लगा मानो फिर से उसे कंपकपी छुट रही है। 

डर के मारे उसने यह भी देखने का प्रयास नहीं किया कि अजनबी चलकर जा रहा है या हवा में विलीन हो रहा है। आज उसने एक बोतल लाकर आफिस की मेज पर और चार बोतलें कांच की सेफ में रखी थीं।


अजनबी हर दिन तय समय पर अपने परिचित अन्दाज में आने लगा और न चाहकर भी जोसेफ को उसके सामना करना पड़ता था। अजनबी कबाड़ में नयी चीजों के बारे में जानकारी प्राप्त करता रहता था।

जोसेफ निरन्तर धनी होता जा रहा था। लेकिन विचित्र स्थिति थी, वह इस धन से प्रसन्नता अनुभव नहीं कर रहा था। प्रत्येक दिन वह विचार करता कि शायद आज का सौदा अन्तिम होगा। किंतु हर बार नयी फरमाइश आ जाती थी।


वह बहुत परेशान और आशंकित था। उसने अपना डर शराब में भुलाना चाहा और नशे में अजनबी से छुटकारा पाने के अनेक उपायों पर विचार भी किया। उदाहरणतः आने वाले के हाथ-पांव तोड़ देने की धौंस। अथवा उस पर अपना कुत्ता छोड़कर डराना और आइन्दा यहां दिखाई न देने की चेतावनी देना।


कुत्ते वाला फार्मूला उसे फ्लॉप लगा, क्योंकि उसके सामने टॉमी एक बिल्ली की तरह खौफजदा दिखता था। यह भी एक परेशानी थी। दूसरा उपाय भी सूझ रहा था कि इस मामले में पुलिस की सहायता प्राप्त करे अथवा बदमाशों को धन देकर आगंतुक की अच्छी प्रकार धुलाई करा डाले।


अजनबी की मांगों में अजीब-अजीब सी चीजें बढ़ती जा रही थीं। एक फोकस वैगन कार के अगले पहिये, भले ही किसी भी दशा के हों, लेकिन दुर्घटना में दो मौत अवश्य हुई हों। एक डोरसन का पेट्रोल टैंक जो दुर्घटना में नष्ट होने से बच गया हो। लेकिन इसमें किसी बालक की मृत्यु निश्चित रूप से हुई हो। 

किसी इम्पाला कार की पीछे वाली सीट चाहिए। जिसमें यात्रा कर रहे यात्री की दुर्घटना में मौत हो गयी हो। इसी प्रकार की विचित्र शर्ते होती थीं। लेकिन क्या मजाल कि जोसेफ इस बारे में वह उस अजनबी से कोई पूछताछ भी कर सके। उधर उस अजनबी की मांगें आये दिन हैरान करने वाली और बेतुकी होती चली जा रही थीं। जबकि उसकी यह मांगें पूरी कर उन्हें दिलाना अब जोसेफ के लिए दुष्कर होता जा रहा था। वह उससे इतना भयभीत रहने लगा कि अब उसे इस प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य कबाड़ियों से भी प्रयास करने पड़ रहे थे।


किसी समय उसके मित्र रहे लोग उसमें आजकल केवल धन के लिए रुचि रख रहे थे। वह उसको इस प्रकार की निगाहों से आंकने लगे थे कि मानो वह कोई पागल या सनकी हो। लेकिन यह अवश्य था कि चाहे जिस प्रकार, वह उसकी फरमाइशों की अभी तक पूर्ति करता आ रहा था। 

लेकिन इस बार तो हद ही हो गयी जब वह अजनबी एक विचित्र फरमाइश लेकर आया। उसने जोसेफ से शर्त रखी-इस बार वह ऐसी किसी कार की विण्डस्क्रीन चाहता है जिसके ड्राइवर की दुर्घटना में आंखें चली गई हों। इस बार न कार मेक की शर्त थी, न मॉडल की। केवल पूरा जोर ड्राइवर की आंखों के जाने पर था।

जोसेफ ने समझ लिया इस बार वह अजनबी की फरमाइश पूरी नहीं कर सकेगा। वह ऐसी विण्ड स्क्रीन ढूंढकर नहीं दे सकेगा। यह लगभग असम्भव सा ही है। और हुआ भी यही।

अगले दिन जब वह विचित्र आदमी आया तो जोसेफ ने उसकी मांग पूरी करने में असमर्थता व्यक्त कर दी। जबकि इंकार करने पर उसे खेद भी हुआ। इस बात पर अजनबी ने नाराजगी भरे अंदाज में उसे घूरा था। ऐसा लगा जैसे आंखों से ही उसे भस्म कर देना चाहता हो।

लेकिन अचानक वह मुस्कुरा उठा, जिससे ऐसा लगा मानो कोई वर्षों पुराना मुर्दा मुस्कुराया हो। तब बेचैनी में जोसेफ ने कल रात तक किसी भी तरह उसकी फरमाइश पूरी करने का वचन दे डाला।

अजबनी ने उसकी मुट्ठी में तीन सौ डॉलर थमाये और यह जा वह जा। उसके जाने के बाद जोसेफ ने अपने कबाड़ गोदाम पर एक उदासी भरी मुस्कान डाली। गोदाम में भरा हुआ सामान उसे व्यर्थ लग रहा था। अपने ऑफिस की तरफ बढ़ते हुए उसे अनुभव हो रहा था मानो उसके हाथ में थमे डॉलर फिसल कर जमीन पर जा गिरे हों और फड़फड़ा रहे हों।

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बहुत जमकर शराब पीने के बावजूद जोसेफ का अगला दिन बहुत परेशानी भरा रहा। वह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर उसे इस बात का कैसे पता चलेगा कि दुर्घटना में केवल ड्राईवर की आंखें गई थीं। कबाड़ खरीदने वाले कोई इस प्रकार की जांच तो करते नहीं हैं, इसका पता तो केवल पुलिस को ही हो सकता है। फिर भी उसने प्रयास बहुत किया।

 जोसेफ को उस समय बड़ी अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा जब उसके एक परिचित कबाड़ी ने उसकी यह विचित्र मांग सुनते ही कह दिया था कि आइन्दा वह इस प्रकार की खरीदारी करने के लिए कभी उसके पास न आये।


इस समय दिन के साढ़े तीन बजे थे और वह शराब से उस अपमान को भुलाने का प्रयास कर रहा था। नशा चढ़ना प्रारम्भ हो गया था। वैसे भी जोसेफ जानता था कि अपने प्लान को पूरा करने के लिए उसे नशे की कितनी आवश्यकता थी, जो उसने अपनी परेशानी सुलझाने के लिए बनाया था। 

यदि वह अजनबी के भय में डूबा रहता तो अपने इस प्लान पर अमल करना असम्भव था। अब उसके पास अन्य कोई रास्ता भी न था।

सर्वप्रथम उसने कबाड़खाने का जल्दी से निरीक्षण कर, एक सीडॉन कार की विण्डस्क्रीन खोज कर निकाली तथा उसने जॉन को आवाज देकर बुलाते हुए समझाया कि वह उसे बड़ी सतर्कता से बाहर निकाले। नौकर के चेहरे पर नाराजगी साफ दिख रही थी जिसे उसने नजरअंदाज कर दिया।

उसने सोचा कि इसे बुरा लगता है तो लगे! शायद यह मुझे नशे में समझ रहा है।

नौकर ने कहा- “बुरा ना मानें तो एक बात बतायें।"

जोसेफ ने केवल उसकी बात के जवाब में सिर हिलाया, जिसका अर्थ हां या ना में कुछ भी हो सकता था। 

“यह कबाड़ जमा करने का उद्देश्य आखिर क्या है?"

झल्लाकर जोसेफ ने कहा- “तुम्हें अपने काम से काम रखना चाहिए। जिसके लिए तुम्हें वेतन दिया जाता है।"


"तुम तो शुरू से ही खंडूस किस्म के रहे हो । मुझे क्योंकि काम चाहिए था इसलिए मैं आज तक खामोश रहा । लेकिन अब ऐसा काम नहीं चाहिए। आज से अपना काम-धाम स्वयं देखो और मेरी तरफ से भाड़ में जाओ!" भड़ककर नौकर ने भी जवाब दिया।

यह एक बहुत बद्तमीजी भरा जवाब था। जिस पर शायद बदले में थप्पड़ लगा देना था। 

जॉन ने भड़ककर कहा-“मैं तो जा रहा हूं लेकिन जाते-जाते तुम्हें एक सलाह मुफ्त दे रहा हूं जोसेफ, होश में रहो।"


प्रश्नवाचक दृष्टि से जोसेफ ने उसकी तरफ देखा।

बुरा सा मुंह बनाकर अजनबी द्वारा जमा कराये गए सामान पर एक नजर डालते हुए जॉन दरवाजे की तरफ बढ़ता हुआ बड़बड़ाया-“तुम्हारे दिमाग के पेंच ढीले हो गए हैं... | किसी मस्तिष्क विशेषज्ञ के पास जाकर अपना ठीक से चैकअप कराओ।"


परेशान जोसेफ मन में सोचने लगा, 'तुमने यदि वह खतरनाक आंखें देखी होती तो तुम्हारी हवा टाइट हो गई होती...और मेरी जगह होते तो शायद तुम इतनी बकवास ना करते।' यह सब बातें वह अपने नौकर से कहना तो चाहता था, लेकिन उसके मुंह से केवल इतना ही निकल सका "साला हराम का बच्चा!"


कोई भी जवाब ना देते हुए जॉन वहां से निकल गया। 

जोसेफ ने ऑफिस जाकर बोतल और गिलास संभाल लिया। तभी सदैव गुर्राने वाले उसके टॉमी ने पूंछ दबाकर कू-कू शुरू कर दी, यानी कि अजनबी के आने का समय हो चुका था।

वह अजनबी अपने निश्चित स्थान पर आकर खड़ा हो गया था और उसकी लम्बी परछाई कबाड़खाने में फैल गई।

जोसेफ एक विशेष निश्चय के साथ खड़ा हुआ था तो उसके हाथ मानो कुछ करने के लिए तन चुके थे। झटके से खड़े होने पर कुर्सी पीछे को पलट गई। कुत्ता चाऊं-चाऊं करता हुआ रैंग कर बेंच की ओर बढ़ा। जोसेफ ने अपने काम की चीज उठाई और पीठ पर बैल्ट के साथ फंसा ली।


इसके बाद वह उस अजनबी तक मानो नींद की अवस्था में चलकर गया हो। महसूस हो रहा था कि मानो वह चलते हुए भी पहुंच  नहीं पा रहा। जोसेफ अजनबी को देखकर समझ नहीं पा रहा था कि वह मुस्कुरा रहा है या दांत पीस रहा है। किन्तु उसकी इच्छा यह जरूर थी कि वह अजनबी उसके मन की बात ना भांप ले।


जोसेफ और अजनबी आमने-सामने आये तो अजनबी ने उससे पूछा-"क्या मेरी इच्छित वस्तु मिली?"


"मिल गई है। उधर रखी है...।" कहते हुए जोसेफ ने सोचा-'कहीं यह समझ ना जाये। मैंने इतनी पी हुई है, फिर भी डर बन्द नहीं हो पा रहा...।'


“गुड! मैं भी देख लेता हूं।" 

“आओ!'' कहते हुए जोसेफ ने उसे अपने पीछे आने का इशारा किया।


अजनबी ने घूमकर कबाड़े के ढेर पर निगाह डाली। ट्रांसमिशन के साथ विण्ड स्क्रीन खड़ी हुई थी। अजनबी को उसमें हल्की सी परछाई दिखाई दे रही थी, झुककर उसने छूकर देखा।

अजनबी झुका तो जोसेफ भी उसके पीछे बढ़कर आया, लेकिन तभी उसने जोर की फुफकार सुनी।

यह ऐसी फुफकार थी जो काटने से पहले किसी सांप ने छोड़ी हो। सीधा होने से पहले अज़नबी से सिर ऊपर किया तो उसके होठों पर एक भयानक मुस्कान नाच रही थी और आंखों से मानो लपटें निकल रही थीं। 

वह बोला-"लेकिन यह मेरी चीज नहीं है!"

अभी अजनबी कुछ कहने ही वाला था कि जोसेफ का हाथ बड़ी फुर्ती से अपनी पीठ की तरफ गया, जहां से छुपाया गया लोहे का भारी हथा निकाल कर लाया। जब तक अजनबी संभल पाता, उसके हथौड़े जैसे वार से अजनबी की खोपड़ी किसी तरबूज की तरह फट गई थी।


हथा अजनबी के भेजे में जा घुसा था। दर्द से उसके होंठ सुकड़े, पुतलियां ऊपर चढ़ गईं और वह धम्म से नीचे जा गिरा। कुछ देर हाथ-पैर पटककर वह शान्त हो गया।


अजनबी पर वार करके मानो जोसेफ भी पत्थर का बन गया था और फटी-फटी आंखों से सामने पड़े अजनबी को घूरे जा रहा था। वह विश्वास नहीं कर पा रहा था कि इतनी सरलता से उसने यह काम कर दिया है। केवल एक वार से उसने इस आफत से छुटकारा पा लिया है!


तभी वह झटके के साथ आगे की ओर झुकता चला गया तथा एक हिचकी के साथ उसने उल्टी कर दी। सारी शराब उसके पेट से बाहर निकल आई थी। ऐसा कई बार हुआ और यहां तक कि उसका पेट बिल्कुल साफ हो गया।


अजनबी जमीन पर औंधे मुंह पड़ा हुआ था। और उसकी गर्दन इस प्रकार मुड़ी हुई थी मानो उसकी आंखें जोसेफ को घूर रही हों और वह उसकी इन्हीं आंखों से घबराता था। उसने वहां पड़ी एक प्लास्टिक बोरी उठाकर लाश पर ढक दी थी। इस समय जोसेफ इस प्रकार सफेद पड़ गया था मानो उसके शरीर में खून की एक बूंद ना रही हो। इसके बाद उसने किसी प्रकार लाश को किसी बोरी में बांध दिया और इस काम से निवृत होकर बेचैनी से उसने अपने ऑफिस की तरफ निगाह उठाई।

वहां बाजार में चौकीदारी करने वाला किसी भी समय आन वाला था। समय बहुत कम था। एक तरफ से बोरी पकड़कर उसे घसीटते हुए वह कवाड, गोदाम की पार करने लगा। वह सूरज छिपने का इन्तजार कर रहा था। इस समय जोसफ कार्टीना के ढांचे के निकट था।


नीले आसमान पर काले बादलों की बैकग्राउण्ड में पुरानी मशीनों और कारों के ढांचे परछाई की तरह नजर आ रहे थे। सारा माहौल एक डरावने कब्रिस्तान जैसा हो रहा था।


फोर्ड का दरवाजा खोलते समय उसके कहकहे जोरदार आवाज में गूंजे। ऑफिम में बैठा हुआ टॉमी भी गुर्ग कर जोर से पौंका।

अब जोसेफ को अपने हाथों से कुछ करना था। जब उसने ड्राइविंग सीट पर लाश का बोरा डाला तो उसे बड़ी नफरत का अनुभव हुआ। उसे गुस्से में गये नौकर के वापस आने की चिन्ता थी। आवश्यकता से अधिक शक्ति के साथ उसने कार का गेट भड़ाक से बन्द कर दिया। उसके माथे पर पसीना झिलमिला रहा था। पल भर में ही वह क्रेन को ड्राइव कर रहा था। 

चाबी इग्नीशन में घुमाते ही इंजन धर-धर करके जाग उठा और जिस कार में अजनवी की लाश रखी हुई थी, क्रेन के पंजे ने उधर झुकना प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे नीचे आता क्रेन का भारी पंजा उस कार पर जा टिका और उसकी पुरानी कार को पिचकाने लगा। अब पंजे ने उस पर अपनी पकड़ बढ़ा दी। 

धुंधले शाम में ये ऐसा दृश्य था मानो किसी बड़े बाज ने अपने छोटे से शिकार को दबोच लिया हो और उसे लेकर अपने ठिकाने की ओर उड़ गया हो। उधर पिचकी कार को हजम करने के लिए क्रशर का मुंह भी खुल गया था। कार को क्रेन धीरे-धीरे नीचे ला रही थी, कुछ समय तक शिकार पंजे में फंसा रहा और फिर टूट कर क्रशर में जा समाया।


कुछ ही देर बाद जोसेफ ने क्रशर का कंट्रोल सम्भाल लिया था। जबकि डर के मारे फटी-फटी आंखों से वह चारों ओर देख रहा था और माथे पर पसीना जोरों से बह रहा था। अचानक उसने क्रशर चालू कर दिया। जिससे लोहे के दबकर पिचकने की प्रक्रिया से वह परेशान हो उठा।


घबराकर उसने क्रशर की ओर से पीछा हट गया। उसकी आवाज से बचने के लिए कानों को हथेलियों से कसकर ढक लिया। वह मना रहा था कि अजनबी की लाश का मन में ख्याल भी न रहे। उस समय लाश कार के ढांचे के साथ पिसने की प्रक्रिया में थी। वैसे तो यह काम जल्द निपटने वाला था, किन्तु क्रशर ने कार का ढांचा धातु की चादर में परिवर्तित करना प्रारम्भ किया तो उसकी तेज आवाज की विचित्र सी गूंज सुनाई दे रही थी। इस आवाज के साथ किसी की चीखें भी गूंजती लग रही थीं।


जोसेफ ने अपने कान और जोरों से भींचते हुए सोचा- 'मैंने उसे मार डाला. ..बिलकुल मर चुका है वह...फिर यह चीखें...उफ!'


आहिस्ता-आहिस्ता लोहे की आवाजें और चीख बन्द हो गयी। अब तो केवल क्रशर की भिनभिनाहट की शेष थी। उसने उस कन्वेयर बेल्ट को चालू कर दिया, जिसके द्वारा ढली लोहे की चादर बाहर निकलती है।


शेष कहानी जानने के लिए पैशाचिक मशीन भाग 2 को  इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ें |

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..... Pishach Ki Kahani: Paishachik Machine [ Ends Here ] .....

Team Hindi Horror Stories




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