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 भूतों का मेला: Bhooton Ka Mela

भूतों का मेला: Bhooton Ka Mela

 भूतों का मेला
Bhooton Ka Mela

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Bhooton Ka Mela

हालांकि आज के वैज्ञानिक युग में भूत-प्रेतों के अस्तित्व को प्रायः नकार दिया जाता है मगर मध्य प्रदेश के दक्षिणी गांव में पिछले ढाई सौ वर्षों से प्रतिवर्ष ‘भूत-प्रेतों का मेला' तक लगता है। जाहिर है कि भूत हैं, इसीलिए विज्ञान उनकी वास्तविकता खोजने के भरसक प्रयास करता रहा है। आइए भूतों से जुड़े लोक विश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर एक नजर डालते हैं।


कहा जाता है, धरती पर वास्तविक जीवन में सबसे प्राचीन भूत यूनान में देखा गया था। आज से करीब दो हजार वर्ष पूर्व कथित भूत एंथीनेहोरस नामक व्यक्ति ने देखा था। हिंदू मान्यता है कि गायत्री मंत्र के जाप से भूतहा प्रभाव से बचा जा सकता है, और तो और हनुमान चालीसा' की चौपाई हैं-'भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै ।' अर्थ है कि जो महावीर श्री हनुमानजी का नाम लेता है, उसके पास भूत-प्रेत नहीं आते। यूं भी, हर धर्म थोड़ा या ज्यादा भूतों पर यकीन करता ही है। वैज्ञानिक इसे दिमाग और आंखों का भ्रम मानते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे रेगिस्तान में मृगतृष्णा धूप-छाया का खेल पानी का भ्रम पैदा करती है। ऐसा दिमागी तनाव या घबराहट का परिणाम भी हो सकता है।


प्रत्येक वर्ष जनवरी में मध्य प्रदेश के दक्षिणी भाग में भूत-प्रेतों का मेला' आयोजित किया जाता है। पौष पूर्णिमा से बसंत पंचमी के दौरान सालाना मेले का मकसद होता है भूत -प्रेत के शिकंजे में फंसे लोगों को मुक्ति दिलाई जाए। 

इसमें 5000 से अधिक ओझा, महंत, संत, फकीर और बाबा भोपाल से दक्षिण की तरफ 290 किलोमीटर दूर माल्जापुर गांव स्थित गुरु दीओजी संत मंदिर में जमा होते हैं। 

ओझा, 'सियाने; मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से हर वर्ष आते हैं। इस वर्ष अनूठे मेले के पहले ही दिन पौष पूर्णिमा पर भूत-प्रेतों से मुक्ति पाने आए 65,000 गांववासी और आखिरी दिन बसंत पंचमी पर पहुंचे एक लाख लोग। प्रायः भूत के शिकंजे में फंसे गांववासी अपने बालों को बिखेरे रहते हैं और रहस्यमय हरकतें करते हैं। 


ओझा इन पर 'पवित्र जल छिड़कते हैं, ताकि बला शांत हो जाए।यूं भी, माल्जापुर को ओझाओं का गांव कहते हैं। क्योंकि इस एक ही गांव में 200 ओझा रहते हैं और उन्हें झाड़-फूंक के जरिए आत्माएं निकालने की दक्षता प्राप्त है। 


प्रमुख ओझा चंदसिंह महंत का दावा है कि यहां पिछले ढाई सौ सालों से हर साल ‘भूत-प्रेत का मेला' लगातार लगता रहा है। महंत कहते हैं- 'मंदिर परिसर में खड़े केले के दो वृक्ष उन लाखों भूतों का निवास है, जिन्हें हम मानव जिस्म से बाहर निकाल फेंकते हैं। 


वह आगे कहते हैं- 'वास्तव में मंदिर के बीचोबीच चमत्कारी गुरु दिओजी संत की समाधि है। बताते हैं कि उनका जन्म सन् 1700 के आसपास हुआ था। वह राजस्थान के राजपूत थे। अल्पायु में ही उनमें आत्माओं की शक्ति का जबरदस्त अहसास जगा। फिर क्या था? आश्चर्यजनक करिश्मे करने लग गए। 

मरणासन्न दिओजी संत ने गांववासियों को बताया कि उनके शव को दफना दिया जाए और ऐन ग्यारह महीने पश्चात् उन्हें फिर खुदाई कर निकाल लिया जाए और जब संत की इच्छानुसार खुदाई की गई तो नीचे से शिशु का भ्रूण निकला। लोगों ने उसे दोबारा दफना दिया। कोई नहीं जानता कि भूत-प्रेतों के निराले मेले का आयोजन कब और क्यों आरम्भ हुआ?'


भूत-प्रेत से जुड़े ऐसे ही कई रहस्यों को जानने के लिए विश्वभर के भूत-प्रेत विशेषज्ञ ट्रांससिल्वेनिया (रोमानिया) में, मई 2003 में, तीसरे विश्व ड्रैकुला कांग्रेस' के दौरान माथा-पच्ची करते रहे। 


ब्रेम स्ट्रोकर के उपन्यास के खून चूसने वाले पिशाच यानी ड्रैकुला ने हॉलीवुड के फिल्म निर्माताओं को इतना प्रभावित किया कि इसी विषय पर दर्जनों भूतहा फिल्में बनीं और भिन्न-भिन्न भाषाओं में रूपांतरित भी हुई। उल्लेखनीय है कि ब्रेम स्ट्रोकर 15वीं सदी के क्रूरतम बालेशियन सम्राट ब्लैड टेप्स से प्रेरित हुए। 


सम्राट ब्लैड टेप्स का जन्म मध्य रोमानिया के मध्यकालीन ट्रांससिल्वानियाई शहर सिंघिसोमारा में हुआ था। इसी की करतूतों के आधार पर खौफनाक काउंट ड्रैकुला की रचना की गई। 'विश्व ड्रैकुला कांग्रेस' में भाग ले रहे ब्रिटेन के भूत क्लब के मुखिया एलन मर्डी का मानना है कि भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र की दुनिया में ड्रैकुला से भयानक डरावना कोई दूसरा पात्र नहीं है। 


उन्होंने अपनी अध्ययन रिपोर्ट ‘स्कपर्ड टू डेथ-द पॉवर आफ फीयर टू एंजाय एंड किले' में कहा है कि विलासितापूर्ण जिंदगी गुजारने वाले ड्रैकुला में एक अलग-थलग सेक्स अपील थी। उधर लॉस एंजिल्स के फिल्म विशेषज्ञ लॉकी हीस ने बताया- 'एमिली गेयर्ड' ड्रैकुला की जनक के रूप में जानी जाती है।


भूत-प्रेतों पर बनी विश्व की पहली फिल्म 1921 में ट्रांससिल्वेनिया में जन्मे एक हंगरियाई फिल्म निर्देशक ने बनाई थी। यह अनाम फिल्म 'नोसफरातु' से कुछ महीने पहले ही बनी थी और 'नोसफरातु' से ही भूत-प्रेतों पर फिल्में बनने का सिलसिला आरम्भ हो गया, जो आज तक सारे विश्व में चल रहा है।


एक और मजेदार बात है कि ब्रिटेन में जासूसों की तरह 'भूतों के शिकारी या 'घोस्ट बस्टर्स' एक पेशा है। लंदन के 'घोस्ट क्लब' की स्थापना 1862 में हुई थी। इसके नामी सदस्यों में चार्ल्स डिकन्स और आर्थर कानन डायल उल्लेखनीय हैं। 


इसी प्रकार वहां 1882 में, ‘आत्मा संबंधी अनुसंधान सोसायटी' कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा स्थापित की गई थी। इसके एक 75 वर्षीय सदस्य हैं, एनडीव ग्रीन, जो करीब 35 सालों से भूतों को पकड़ने में लगे हैं। पहले केमिस्ट, फिर पत्रकार, अध्यापक, लेखक और रेडियो, टी०वी०, कॉमट्रेटर रहे एनडीव ग्रीन एक उद्योग की तरह भूतों की बाल की खाल निकाल देते हैं। वह अकेले नहीं हैं, बाकायदा पूरा-का-पूरा दल है, जो एक्स फाइल्स की भांति काम करता है।


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